धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ, मराठी भाषा के मुद्दे पर आंदोलन से लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध तक, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की एकजुटता महाराष्ट्र की राजनीति में एक अलग तस्वीर पेश करती है. महाविकास आघाड़ी और विपक्षी गठबंधन INDIA में अपनी भूमिका निभाने वाले उद्धव, जनहित के मुद्दों पर अक्सर अपने चचेरे भाई राज के साथ खड़े नजर आते हैं. क्या यह सिर्फ मुद्दों पर एकजुटता है या जनता के बीच अपनी राजनीतिक मौजूदगी मजबूत करने की नई रणनीति?
महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के रिश्ते लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं. दोनों एक ही राजनीतिक परिवार से आते हैं, दोनों की राजनीति में मराठी अस्मिता का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन दोनों की राहें वर्षों तक अलग-अलग रहीं. हालांकि, जब मुद्दा जनभावनाओं से जुड़ता है और सड़कों पर आंदोलन की स्थिति बनती है, तब दोनों भाइयों की नजदीकी एक बार फिर दिखाई देने लगती है.
इसका राजनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के साथ महाविकास आघाड़ी का हिस्सा है. राष्ट्रीय स्तर पर भी उद्धव विपक्षी INDIA गठबंधन के साथ हैं. इसके बावजूद, महाराष्ट्र में कुछ बड़े जन आंदोलनों के दौरान उनकी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के साथ खड़ी दिखाई देती है. यह एकजुटता गठबंधन की पारंपरिक राजनीति से आगे जाकर जनता के बीच अपनी अलग पहचान बनाने का अवसर देती है.
धर्मेंद्र प्रधान प्रकरण: छात्र आंदोलन से मिली सियासी ताकत
जुलाई 2026 में नीट परीक्षा में कथित प्रश्नपत्र लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर देशभर में युवाओं का आंदोलन तेज हुआ. इस आंदोलन का नेतृत्व ‘कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) ने किया. आंदोलनकारियों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग की. लगातार विरोध के बीच 25 जुलाई को प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.
इस आंदोलन के दौरान उद्धव ठाकरे ने भी छात्रों के समर्थन में आवाज उठाई और प्रधान के इस्तीफे की मांग की. उन्होंने विपक्षी दलों से भी छात्रों के आंदोलन का समर्थन करने की अपील की. प्रधान के इस्तीफे के बाद उद्धव और राज ठाकरे की संयुक्त रैली का कार्यक्रम भी सामने आया. 26 जुलाई को मुंबई के शिवाजी पार्क में युवाओं की मौजूदगी के बीच उद्धव ने छात्र आंदोलन को लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण बताया.
इस घटनाक्रम का राजनीतिक संदेश महत्वपूर्ण था. आंदोलन की शुरुआत किसी पारंपरिक राजनीतिक गठबंधन ने नहीं की थी, बल्कि युवाओं ने परीक्षा व्यवस्था और सरकार की जवाबदेही को मुद्दा बनाया था. उद्धव और राज का इस आंदोलन के समर्थन में सामने आना युवाओं से संवाद स्थापित करने का अवसर बना. हालांकि, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का श्रेय केवल दोनों ठाकरे भाइयों को देना उचित नहीं होगा, क्योंकि इसके पीछे देशव्यापी छात्र आंदोलन और अन्य प्रदर्शनकारियों की भूमिका भी थी.
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन: एक बार फिर साथ आए ठाकरे भाई
अक्टूबर 2026 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विपक्षी दलों का विरोध तेज हुआ. उद्धव और राज ठाकरे ने 4 अक्टूबर को मुंबई में संयुक्त रूप से ‘विराट गर्जना मोर्चा' का नेतृत्व किया. इस प्रदर्शन में दोनों ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और महाराष्ट्र में एसआईआर प्रक्रिया रद्द करने की मांग की. राज ठाकरे ने इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनों की जगह मतपत्रों से चुनाव कराने की मांग भी उठाई.
इस आंदोलन की एक खास बात यह रही कि इसमें कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) सहित विपक्षी दलों को भी शामिल होने का निमंत्रण दिया गया. शुरुआती स्तर पर मोर्चे की घोषणा को लेकर विपक्षी सहयोगियों के साथ समन्वय पर सवाल उठे थे, लेकिन बाद में इसे व्यापक विपक्षी भागीदारी वाला प्रदर्शन बनाने की कोशिश की गई.
यहां उद्धव की रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू दिखाई देता है. वह एक तरफ महाविकास आघाड़ी और राष्ट्रीय स्तर पर INDIA गठबंधन के साथ हैं, वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र के राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर राज ठाकरे के साथ सीधे जनता के बीच पहुंचने का विकल्प भी खुला रखते हैं.
बिना पार्टी के झंडे के राजनीति: प्रतीकात्मकता या रणनीति?
ठाकरे बंधुओं के संयुक्त आंदोलन में पार्टी के झंडों के बजाय तिरंगे को प्रमुखता दिए जाने को भी राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा गया. यह प्रदर्शन को केवल शिवसेना (यूबीटी) या मनसे के कार्यक्रम के बजाय एक व्यापक नागरिक मुद्दे के रूप में पेश करने की कोशिश थी.
ऐसे आंदोलनों में प्रतीकों का महत्व बढ़ जाता है. पार्टी के झंडे किसी खास राजनीतिक संगठन के समर्थकों को आकर्षित करते हैं, जबकि तिरंगा, संविधान और लोकतांत्रिक अधिकार जैसे प्रतीक आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार देने का प्रयास करते हैं. इससे उन युवाओं और नागरिकों के लिए भी जुड़ना आसान हो सकता है, जो किसी राजनीतिक दल के सदस्य या समर्थक नहीं हैं.
लेकिन पार्टी के झंडे नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि आंदोलन पूरी तरह गैर-राजनीतिक हो जाता है. नेतृत्व राजनीतिक दलों के हाथ में हो, मांगें किसी संवैधानिक पदाधिकारी के इस्तीफे से जुड़ी हों और आंदोलन का इस्तेमाल सरकार को घेरने के लिए किया जा रहा हो, तो उसकी राजनीतिक प्रकृति बनी रहती है. अंतर इतना है कि उसका संदेश पार्टी की सीमाओं से बाहर पहुंचाने की कोशिश की जाती है.
युवाओं के बीच जगह बनाने की चुनौती
महाराष्ट्र की राजनीति में युवाओं का समर्थन हासिल करना उद्धव और राज दोनों के लिए महत्वपूर्ण है. उद्धव ठाकरे को अपनी पार्टी के संगठन और पारंपरिक शिवसैनिक आधार के साथ-साथ नए मतदाताओं के बीच भी अपनी जगह मजबूत करनी है. वहीं राज ठाकरे की मनसे के सामने भी अपने राजनीतिक प्रभाव को व्यापक जनसमर्थन में बदलने की चुनौती है.
हाल के दिनों में राज ठाकरे का पुणे में महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (एमपीएससी) के अभ्यर्थियों के आंदोलन में पहुंचना भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है. उन्होंने युवाओं की भर्ती संबंधी मांगों का समर्थन किया और कहा कि महाराष्ट्र के युवाओं को रोजगार दिलाने के लिए वह किसी के भी पास जाने को तैयार हैं. इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर छात्रों की मांगें उठाईं.
इन घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि दोनों भाई उन मुद्दों पर सक्रियता दिखा रहे हैं, जिनका सीधा संबंध युवाओं के भविष्य, रोजगार, शिक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था से है. हालांकि, इन आंदोलनों में युवाओं की भागीदारी को दोनों दलों के लिए स्थायी समर्थन मान लेना जल्दबाजी होगी. आंदोलन में शामिल होने और चुनाव में किसी दल को वोट देने के बीच अंतर होता है.
कांग्रेस और शरद पवार की पार्टी के साथ रिश्तों पर क्या असर?
उद्धव ठाकरे के लिए यह संतुलन आसान नहीं है. उनकी पार्टी महाराष्ट्र में कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन में है. वहीं राज ठाकरे की मनसे स्वतंत्र राजनीतिक पहचान रखती है. दोनों भाइयों की संयुक्त सक्रियता मराठी अस्मिता और स्थानीय मुद्दों पर उन्हें एक साझा मंच देती है, लेकिन इससे गठबंधन की राजनीति में नए सवाल भी पैदा होते हैं.
उदाहरण के लिए, ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 4 अक्टूबर के मोर्चे की घोषणा के समय विपक्षी सहयोगियों के साथ पहले से पर्याप्त चर्चा नहीं होने को लेकर सवाल उठे. बाद में ठाकरे बंधुओं ने कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को साथ आने का निमंत्रण दिया. यह घटनाक्रम दिखाता है कि उद्धव के सामने दो लक्ष्य हैं, विपक्षी गठबंधन की एकता बनाए रखना और महाराष्ट्र में राज ठाकरे के साथ अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहुंच बढ़ाना.
यह जरूरी नहीं कि दोनों लक्ष्य हमेशा एक-दूसरे के विरोध में हों. जनहित के किसी मुद्दे पर व्यापक एकजुटता विपक्ष को ताकत दे सकती है. लेकिन यदि आंदोलन का नेतृत्व और राजनीतिक लाभ किसी एक जोड़ी या दल तक सीमित दिखाई दे, तो गठबंधन के भीतर असहजता भी पैदा हो सकती है.
आगे की राजनीति के लिए क्या संकेत?
उद्धव और राज ठाकरे की एकजुटता को फिलहाल किसी स्थायी राजनीतिक गठबंधन या भविष्य के चुनावी समझौते का प्रमाण नहीं माना जा सकता. दोनों की विचारधारा, संगठनात्मक प्राथमिकताओं और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में अंतर बना हुआ है. फिर भी, भाषा, युवाओं के अधिकार, रोजगार और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर साथ आना उनके बीच सहयोग की संभावनाओं को जीवित रखता है.
धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ छात्र आंदोलन और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध, दोनों घटनाक्रम एक व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हैं—जब कोई मुद्दा युवाओं या आम नागरिकों के बीच व्यापक समर्थन हासिल करता है, तब राजनीतिक दलों के लिए उससे दूरी बनाए रखना मुश्किल हो जाता है. ऐसे समय में आंदोलन के साथ खड़े होकर नेता अपनी प्रासंगिकता बढ़ाने और जनता से सीधे जुड़ने की कोशिश करते हैं.
उद्धव ठाकरे के लिए राज ठाकरे के साथ मंच साझा करना इसी राजनीतिक जरूरत का एक विकल्प दिखाई देता है. इससे उन्हें महाविकास आघाड़ी और INDIA गठबंधन की सीमाओं से बाहर जाकर महाराष्ट्र में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का अवसर मिलता है. राज ठाकरे को भी अपने मराठी अस्मिता के एजेंडे से आगे युवाओं और व्यापक नागरिक मुद्दों पर प्रभाव बढ़ाने का मंच मिलता है.
लेकिन इस रणनीति की असली परीक्षा आंदोलन के दौरान जुटी भीड़ से नहीं, बल्कि उसके बाद होगी. क्या दोनों भाई युवाओं के मुद्दों पर लगातार साथ बने रहेंगे? क्या यह एकजुटता चुनावी राजनीति में भी दिखाई देगी? और क्या वे अपने साझा आंदोलनों से मिले जनसमर्थन को स्थायी राजनीतिक आधार में बदल पाएंगे? फिलहाल इतना स्पष्ट है कि महाराष्ट्र में जनआंदोलन ठाकरे बंधुओं के लिए एक साझा राजनीतिक मंच तैयार कर रहे हैं. यह मंच गठबंधन की राजनीति से अलग पहचान बनाने का अवसर तो देता है, लेकिन इसे दीर्घकालिक राजनीतिक ताकत में बदलना अभी उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है.
यह भी पढ़ें- उद्धव ठाकरे नाराज, अखिलेश भी नहीं आएंगे; राष्ट्रपति भवन मार्च से पहले इंडिया गठबंधन में क्या हो रहा?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं