- पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने SIR के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है
- ममता बनर्जी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने की योजना बना रही हैं
- महाभियोग प्रस्ताव संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए लाया जा सकता
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बीच तनातनी बढ़ती जा रही है. बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के खिलाफ ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट चली गई हैं. दो दिन पहले ही ममता बनर्जी ने दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मुलाकात की थी. इस मुलाकात के बाद ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगाते हुए ममता बनर्जी ने कहा था उन्होंने आजतक ऐसा अहंकारी और झूठा चुनाव आयुक्त नहीं देखा है.
इतना ही नहीं, अब तो ममता बनर्जी SIR के मुद्दे पर ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए महाभियोग लाने की बात कह रही हैं. बताया जा रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को लेकर ममता बनर्जी विपक्षी पार्टियों से संपर्क में हैं.
वहीं, टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने भी कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने के बारे में सोच रहे हैं, क्योंकि जिस तरह से वह SIR करवा रहे हैं, वह गलत है और देश के हर नागरिक के वोटिंग के अधिकार पर असर डालता है.
महाभियोग प्रस्ताव क्यों?
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है. संविधान के अनुच्छेद 324(5) में इसका प्रावधान है. ये कहता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए भी वही प्रक्रिया होगी, जो सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाने के लिए अपनाई जाती है.
संसद के किसी भी सदन में इसे लेकर महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है. अगर लोकसभा में प्रस्ताव लाया जाता है तो इसके लिए कम से कम 100 सांसदों के दस्तखत जरूरी हैं. अगर इसे राज्यसभा में लाना है तो इसके लिए कम से कम 50 सांसदों के दस्तखत जरूरी हैं.
फिर क्या होता है?
महाभियोग प्रस्ताव को लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के चेयरमैन को भेजा जाता है. स्पीकर या चेयरमैन के पास इसे खारिज या मंजूर करने का अधिकार होता है.
अगर प्रस्ताव मंजूर हो जाता है तो जांच समिति बनाई जाती है. समिति में सुप्रीम कोर्ट के जज, हाई कोर्ट के जज और एक कानून के जानकार होते हैं. अगर जांच में मुख्य चुनाव आयुक्त को दोषी करार दिया जाता है तो इस रिपोर्ट को सदन में रखा जाता है और इस पर वोटिंग होती है.
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए दोनों सदनों में बहुमत की जरूरत होती है. इसका मतलब हुआ कि वोटिंग वाले दिन सदन में मौजूद और वोट करने वाले सांसदों का दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए. दोनों सदनों से पास होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी ली जाती है. अगर राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाती है तो मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटा दिया जाता है.
क्या आ पाएगा प्रस्ताव?
आजतक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव नहीं लाया गया है. इस बार भी उम्मीद कम ही है. मुख्य चुनाव आयुक्त से पहले विपक्ष चीफ जस्टिस और उपराष्ट्रपति के खिलाफ भी महाभियोग का प्रस्ताव लाने की कोशिश की है लेकिन हर बार इसे खारिज कर दिया गया है.
2018 में तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ कांग्रेस और सीपीआई समेत 7 विपक्षी पार्टियों ने महाभियोग का नोटिस दिया था. हालांकि, राज्यसभा के सभापति ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि आरोप संवैधानिक मानकों के अनुरूप नहीं हैं.
इसके बाद दिसंबर 2024 में इंडिया ब्लॉक के लगभग 60-70 सांसदों ने तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को पद से हटाने के लिए राज्यसभा के महासचिव को नोटिस दिया था. विपक्ष ने उन पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने और विपक्षी नेताओं की आवाज दबाने का आरोप लगाया था. राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने 19 दिसंबर 2024 को इस नोटिस को खारिज कर दिया था.
हाल ही में इंडिया ब्लॉक के सांसदों ने मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन के खिलाफ राजनीतिक विचारधारा के आधार पर फैसले लेने का आरोप लगाते हुए महाभियोग लाने की कोशिश की थी.
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