मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्र कवि कहा जाता है. मैथिलीशरण गुप्त सिर्फ एक साहित्यकार, कवि नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे सेनानी थे, जिन्होंने पैनी कलम से ऐसी चिंगारी पैदा की, जिसने भारतीयों के स्वाभिमान की अलख को जगा दिया. मैथिलीशरण गुप्त ने 1912 में भारत-भारती काव्य लिखा. इस पुस्तक ने देश में स्वतंत्रता संग्राम की ऐसी लहर पैदा की कि ब्रिटिश शासन ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया. वो कई बार जेल गए, लेकिन उनकी लेखनी की धार में आजादी की ललक और कसक वैसी ही कायम रही.
स्वतंत्रता संग्राम की गीता लिखी
भारत-भारती को स्वतंत्रता संग्राम की गीता कहा जाता है. इस पुस्तक ने देश में राष्ट्रीय चेतना की ऐसी लहर पैदा कि अंग्रेजी हुकूमत के नींव हिल गई. इस पुस्तक में भारत के गौरवशाली इतिहास, अंग्रेजों की गुलामी में हो रही दुर्दशा और भविष्य में आजादी के पुनर्जागरण का आह्वान किया गया था. भारत-भारती की पंक्तियां क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए मंत्र बन गईं.
भारत-भारती पर प्रतिबंध लगा
रैली, जुलूसों में इनको गाते हुए अंग्रेजों का जोरदार विरोध होता था. भारत-भारती की लोकप्रियता से ब्रिटिश सरकार इतनी डर गई कि उन्हें राजद्रोही घोषित कर दिया. यह पुस्तक चोरी छिपे छपती रही और हाथोंहाथ बिकती रही. ये क्रांतिकारियों के लिए स्वतंत्रता संग्राम की गीता बन गई.खड़ी बोली में उनकी कविताओं ने सीधे मजदूर, किसान, युवा और महिलाओं को आजादी के आंदोलन से जोड़ा.
जेल में लिखीं कविताएं, संसद में गूंज
मैथिलीशरण गुप्त स्वतंत्रता आंदोलन में कई बार जेल गए. 1941 के सत्याग्रह के दौरान मैथिलीशरण गुप्त आगरा और झांसी की जेल में बंद थे. उन्होंने वहां कई महत्वपूर्ण काव्यों की रचना और अनुवाद किया.वो 1952 से 1964 तक मनोनीत राज्यसभा सांसद रहे. संसद में भी अहम मुद्दों पर अपनी तुकबंदियों से उन्होंने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा.सांसदों और मंत्रियों पर उनके कटाक्ष का गहरा असर दिखा.
स्वदेशी और स्वाभिमान का मूलमंत्र
राष्ट्र प्रेम, स्वदेशी और स्वाभिमान उनकी कविताओं का मूलमंत्र था. वो गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारतीयों के भीतर से हीनभावना निकालकर उन्हें भारत के गौरवशाली इतिहास की याद दिलाते थे. स्वराज और स्वदेशी की भावना को उन्होंने बढ़ावा दिया. मातृभूमि के प्रति उनका अटूट प्रेम इन पंक्तियों में झलकता है... जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं, नर पशु निरा है और मृतक समान है.
राष्ट्रकवि नहीं, राष्ट्र गायक हैं
महात्मा गांधी ने 1936 में वाराणसी में हिंदी प्रचार सभा में गुप्त को राष्ट्र कवि की उपाधि दी.बापू ने कहा था, मैथिलीशरण केवल राष्ट्रकवि नहीं हैं, वो राष्ट्र गायक हैं. जैसे कोई गायक राजा को जगाने के लिए देश प्रेम के गीत गाता था, वैसे ही मैथिलीशरण ने सोये हुए पूरे भारत को जगाने के लिए गीत लिखे हैं. लेकिन गुप्त ने बेहद विनम्रता से कहा, मैं तो केवल भारत का एक साधारण सेवक हूं, राष्ट्र कवि तो वो हैं जो देश की आजादी के लिए लड़ रहे हैं.
अंग्रेजी हुकूमत को हिलाया
ब्रिटिश हुकूमत में उनकी किताब भारत-भारती ने देश प्रेम की ऐसी चिंगारी निकली जो भारतीयों के बीच ज्वाला बन गई. एक ब्रिटिश कलेक्टर ने उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया तो गुप्त जी ने घबराने के बजाय कुछ पंक्तियां उनके सामने पढ़ीं. कलेक्टर को मैथिली शरण गुप्त की कविता की पंक्तियां इतनी पसंद आईं कि उन्होंने चेतावनी देकर
उन्हें छोड़ दिया.
अपना प्रिंटिंग प्रेस लगाकर छापी किताबें
उन्होंने खुद का प्रिंटिंग प्रेस ललिता प्रेस और महाकाव्य साकेत का प्रकाशन वहीं किया. वो नहीं चाहते थे कि उनकी इस किताब में कहीं भी कोई गलती हो. उन्होंने अपने गांव चिरगांव (झांसी) में प्रिंटिंग प्रेस ललिता प्रेस स्थापित किया था. साकेत का पहला संस्करण यहीं छपा. उस समय के ज्यादातर कवि या साहित्यकार अकेले में लिखना पसंद करते थे. लेकिन मैथिली शरण गुप्त एक बड़े संयुक्त परिवार में रहते थे. जहां रोज 40-50 लोगों का खाना रोज बनता था. गुप्त का कहना था कि जब तक बच्चों की मस्ती और घर का शोर-शराबा न हो, उनकी कलम आगे नहीं बढ़ती है.
प्रेमचंद से अनोखी शर्त लगाई
महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद और मैथिलीशरण गुप्त के बीच गहरी दोस्ती थी. प्रेमचंद अक्सर गुप्त से सवाल पूछते थे कि वो गद्य क्यों नहीं लिखते, कविता ही क्यों.मैथिलीशरण ने जवाब में कहा था, जो चीज 4 पन्नों के गद्य में नहीं आती, वो चार पंक्तियों की कविता में कही जा सकती है तो अपना वक्त क्यों बर्बाद करूं.

Maithili Sharan Gupt
विदेशी काव्यों का अनुवाद
मैथिली शरण गुप्त ने फारसी के महान सूफी कवि उमर खय्याम की रुबाइयों और बांग्ला के प्रसिद्ध नाटककार माइकल मधुसूदन दत्त की रचनाओं का हिंदी में काव्य अनुवाद किया था. लेकिन ऐसा लगता है कि ये उनकी मूल रचना हो. गुप्त को ताश और क्रिकेट से गहरा लगाव था. वो अपने छोटे भाई सियाराम शरण गुप्त के साथ खेल पर चर्चा करते थे. 12 दिसंबर 1964 को उनका देहावसान हो गया, लेकिन खड़ी बोली हिंदी को काव्य भाषा का दर्जा दिलाने में उनका अमिट योगदान है.
महावीर प्रसाद द्विवेदी की सीख
मैथिली शरण गुप्त पहले ब्रजभाषा में रसिकेंद्र उपनाम से कविताएं लिखते थे. उन्होंने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की पत्रिका सरस्वती में प्रकाशन के लिए अपनी रचनाएं भेजीं तो द्विवेदी ने उन्हें पत्र लिखकर सलाह दी कि ब्रजभाषा का समय बीत चुका है. अब खड़ी बोली में और छद्म नाम की जगह असली नाम से कविताएं लिखो. फिर खड़ी बोली को ही उन्होंने काव्य लिखे.
नारी किरदारों को केंद्र में रखा
मैथिलीशरण गुप्त ने पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं में उन नारी किरदारों को केंद्र में रखा.साकेत महाकाव्य (1931) रामायण में भगवान राम के वनवास के समय लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के त्याग और विरह की कथा है.यशोधरा में भगवान बुद्ध की पत्नी यशोधरा के आत्मसम्मान और दर्द को उभरा. सखि, वो मुझसे कह कर जाते की पंक्तियां आज भी अजर-अमर है. मैथिलीशरण गुप्त को भारत-भारती, साकेत, यशोधरा, पंचवटी, जयद्रथ वध, द्वापर, विष्णुप्रिया नाम से काव्य लिखे. साकेत के लिए हिंदुस्तान अकादमी पुरस्कार, 1946 में साहित्य वाचस्पति और 1954 में पद्म भूषण मिला. 3 अगस्त को कवि दिवस मनाया जाता है.
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