आज भारतीय रसायन विज्ञान के जनक आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय की जयंती है. प्रफुल्ल चंद्र एक वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि बड़े देशभक्त और समाजसेवा भी थे. अमीर खानदान में जन्मे प्रफुल्ल चंद्र ने एक कमरे में अपनी जिंदगी गुजारी और केमिस्ट्री में कई बड़ी खोजकर दुनिया में भारत का डंका बजवाया. जमींदार के बेटे राय ने महज 700 रुपये में अपने घर के एक छोटे कमरे में भारत की पहली स्वदेशी दवा इंडस्ट्री की नींव रखी. प्रफुल्ल चंद्र राय ने जीवन भर शादी नहीं की और बेहद सादगी से जिंदगी गुजारते थे. प्रेसीडेंसी कॉलेज का छोटा कमरा उनका घर, प्रयोगशाला और ऑफिस था. जमींदार के बेटे राय ने 1944 में जब आखिरी सांस ली तो उनके पास कोई संपत्ति या जागीर नहीं थी.
दादा दीवान और पिता जमींदार
प्रफुल्ल चंद्र राय का जन्म 2 अगस्त 1861 में बंगाल प्रेसीडेंसी के खुलना जिले के रारुली-कातिपारा गांव में हुआ था. अभी ये इलाका बांग्लादेश में है. उनके दादा दीवान और पिता हरिश्चंद्र राय जमींदार और फारसी, अंग्रेजी और संस्कृत जैसी भाषाओं के विद्वान थे. राय का परिवार 1870 में उनका कलकत्ता आया जहां, मॉडर्न एजुकेशन के हेयर स्कूल में उनकी पढ़ाई हुई. लेकिन पेचिश के कारण उन्हें पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी. लेकिन बेहद होनहार राय ने घर पर ही अंग्रेजी, लैटिन, ग्रीक, संस्कृत और इतिहास का गहन अध्ययन कर विशेषज्ञता हासिल की.
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प्रेसिडेंसी कॉलेज कलकत्ता से पढ़ाई में उन्होंने रसायन विज्ञान में ऐसी छाप छोड़ी की उन्हें 1882 में उच्च शिक्षा के लिए स्कॉटलैंड की एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी में स्कॉलरशिप से दाखिला मिला. राय ने 1886 में एडिनबर्ग से बीएससी और और 1887 में डीएससी की डिग्री ली. उनके रिसर्च पेपर ने ब्रिटेन के साथ पूरी दुनिया में तहलका मचाया.
क्लास में चमत्कार, मर्क्यूरस नाइट्राइट की खोज
प्रेसीडेंसी कॉलेज कोलकाता की लैब में 1896 मे प्रफुल्ल चंद्र राय मरकरी और नाइट्रिक एसिड मिलाकर कुछ नया बनाने की कोशिश में थे.उन्हें परखनली के पेंदे में पीले रंग के खूबसूरत क्रिस्टल तैरते दिखे.जांच में ये मर्क्यूरस नाइट्राइट निकला. उस समय तक पूरी दुनिया का कोई वैज्ञानिक स्थिर रूप में इसकी खोज नहीं कर पाया था.इस खोज ने उनका डंका पूरी दुनिया में बजने लगा. उन्होंने पारे (Mercury) और सल्फर के कई कंपाउंड पर रिसर्च किए.एमाइन नाइट्राइट्स सीरीज के गहन अध्ययन के साथ 150 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए.
धोती-कुर्ते वाला 'पागल वैज्ञानिक'
आचार्य राय का सोच थी कि सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी का दुखड़ा रोने की बजाय भारत को स्वदेशी, आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना होगा.भारत को अपनी दवाई और कच्चा माल खुद बनाना होगा. उन्होंने 1892 में घर के एक छोटे से कमरे में 700 रुपये से दवा कारखाने की नींव रखी.राय खुद बाजार से दवाओं का कच्चा माल लाकर दवाई बनाते थे. इन दवाओं को बेचने के लिए डॉक्टरों के पास जाते. लोग उन्हें पागल वैज्ञानिक कहते थे. उनका कहना था कि कॉलेज का प्रोफेसर सड़कों पर घूम-घूमकर दवाइयां बेच रहा है. लेकिन इसी जोश जज्बे और जुनून ने देश में पहली स्वदेशी फार्मास्यूटिकल कंपनी बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स की नींव रखी.
स्वदेशी का मंत्र- खुद धोते थे अपने कपड़े
सादगीपसंद राय इतने सादे कपड़े पहनते थे कि कोई नहीं कह सकता था कि वो देश के इतने बड़े वैज्ञानिक और प्रोफेसर हैं. वो अपनी धोती और कुर्ते खुद ही धोते थे. एक शिष्य ने जब पूछा कि इतने बड़े वैज्ञानिक होकर वो कपड़े धोने में वक्त क्यों बर्बाद करते हैं? राय ने कहा कि थोड़ी शारीरिक मेहनत के लिए ये जरूरी है. कपड़े धोबी से धुलवाकर पैसे देकर देश का पैसा बाहर क्यों भेजा जाए. वो अपनी कमाई का 90 फीसदी फंड गरीब छात्रों की फीस और अकाल पीड़ित की मदद में दान कर देते थे. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी उनकी खूब तारीफ की थी.
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शिष्यों ने गुरु का नाम रोशन किया
राय का कहना था कि एक सच्चे शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान होती है कि वह अपने शिष्यों की सफल होते देखे. प्रेसिडेंसी कॉलेज और कलकत्ता विश्वविद्यालय के साइंस कॉलेज में प्रोफेसर प्रफुल्ल चंद्र राय ने वैज्ञानिकों की पूरी पीढ़ी तैयार की. सत्येंद्र नाथ बोस, मेघनाद साहा, शांति स्वरूप भटनागर और ज्ञानेन्द्र नाथ मुखर्जी जैसे महान वैज्ञानिक उन्हीं की देन हैं. सत्येंद्र नाथ बोस के नाम पर बोसोन कण का नाम पड़ा. छात्रों की बड़ी खोज पर राय पूरे कॉलेज में ढोल बजाकर खुशी मनाते थे.
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