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उद्धव के हार का राज: हम तो डूबेंगे सनम... ठाकरे ब्रदर्स का गेम कैसे हो गया 'ओवर'?

राज ठाकरे को लगा कि उद्धव ठाकरे के साथ मिलकर वो मुंबई में वापसी करेंगे. लेकिन उनकी ये रणनीति भी काम नहीं आई. जनता ने बता दिया कि सिर्फ बयानबाजी से वोट नहीं मिलते, जनता के बीच रहना और काम करना होता है.

  • राज ठाकरे ने शिव सेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई लेकिन राजनीतिक सफलता नहीं मिली
  • महाराष्ट्र महानगरपालिका चुनाव में एमएनएस ने 2869 वार्डों में से 20 से कम सीटें ही हासिल कीं
  • राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के एक मंच पर आने के बावजूद ठाकरे ब्रांड की मुंबई में वापसी असफल रही
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मुंबई:

एक वक्त था जब कई लोग राज ठाकरे को बाल ठाकरे के बाद शिव सेना का उत्तराधिकारी मानते थे. बाल ठाकरे की स्टाइल, बोलने की शैली और तेवर कॉपी कर राज ठाकरे को लगता था कि वो भी पार्टी और मराठियों के बीच उतने ही सर्वमान्य होंगे, जितने उनके चाचा हैं, लेकिन बाल ठाकरे के जीवित रहते ही राज ठाकरे के शिव सेना में मतभेद हो गए और वो पार्टी से अलग हो गए. फिर उन्होंने अपनी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) बनाई. उत्तर भारतीय और मराठी बनाम गैर मराठी का वही मुद्दा उठाकर वो नाम हासिल करने की जुगत में लग गए, लेकिन बाल ठाकरे बनने के चक्कर में वो राज ठाकरे भी नहीं कर पाए. महाराष्ट्र महानगरपालिका के चुनाव के नतीजे तो यही बयां कर रहे हैं.

2869 वार्डों के चुनाव में एमएनएस 20 का आंकड़ा भी नहीं छू पाई. 29 में से 24 नगर निगमों में तो राज ठाकरे का खाता भी नहीं खुला. इस चुनाव में राज ठाकरे एक बार फिर से फ्लॉप हो गए. चुनाव में उन्होंने मराठी मानुष, रसमलाई और लुंगी-पुंगी जैसी कई अनर्गल बयानबाजी की. उन्हें लगा की इस तरह के जोशीले बयान देकर को लोगों के बरगला लेंगे, लेकिन जनता इसे समझ गई और उन्होंने इसे सिरे से नकार दिया. जनता को राज ठाकरे का वही घिसा-पिटा अंदाज जरा भी पसंद नहीं आया.

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राज ठाकरे ने मराठी जनता को एक तरह से चेतावनी भी दी थी कि बाहर के लोग आकर उनका हिस्सा छीन रहे हैं. अगर इस बार वो चूक गए तो, उनका अस्तित्व खत्म हो जाएगा, उन्होंने कहा कि ये मराठी लोगों का आखिरी चुनाव हो सकता है. हालांकि उनके लोगों को ही ये बात पसंद नहीं आयी.

मुंबई में ठाकरे ब्रांड की नहीं हो सकी वापसी

करीब 20 साल बाद इस बार राज ठाकरे अपने चचेरे भाई उद्धव ठाकरे से मतभेद भुलाकर एक मंच पर आए थे. उन्हें लगा कि मराठी सेंटिमेंट दोनों भाइयों के साथ होगा. ठाकरे ब्रांड की मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति में वापसी होगी, हालांकि उनका ये सपना पूरा नहीं हो सका. कहते हैं ना, 'खुद तो डूबेंगे सनम, तुमको भी साथ लेकर डूबेंगे', राज के आने से उद्धव को फायदा तो नहीं हुआ उल्टे नुकसान हो गया. हिंदी भाषियों के लिए राज ठाकरे की नफरत उद्धव को भी ले डूबी. चुनाव दर चुनाव अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे राज ठाकरे का ये प्रयोग उद्धव ठाकरे के लिए भी असफल साबित हुआ.

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राज ठाकरे की चुनावी असफलता जारी रही

राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने पिछले कई चुनावों में एक भी बड़ी जीत हासिल नहीं की है. बीएमसी देश का सबसे अमीर निगम है और मुंबई की राजनीति का असली पावर सेंटर भी है. राज ठाकरे को लगा कि उद्धव ठाकरे के साथ मिलकर वो मुंबई में वापसी करेंगे. लेकिन उनकी ये रणनीति भी काम नहीं आई. जनता ने बता दिया कि सिर्फ बयानबाजी से वोट नहीं मिलते, जनता के बीच रहना और काम करना होता है. राज ठाकरे का तो जमीनी स्तर पर संगठन भी कमजोर है.

नुकसान दोनों ठाकरे को हुआ. राज ठाकरे तो पहले से ही कमजोर हैं, ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि उद्धव के साथ आकर वो अपनी हालत में थोड़ा सुधार कर पाएंगे. ये चुनाव राज ठाकरे के लिए बेहद अहम था, ये उनके राजनीतिक पुनर्जन्म का मौका था, लेकिन नतीजों ने उन्हें फिर से निराश कर दिया. राज अपनी पुरानी कमजोरी भी सुधार नहीं पाए. उनकी दो दशक की राजनीति में एक जैसी ही रणनीति रही, उत्तर भारतीय और गैर मराठियों के खिलाफ अपने कार्यकर्ताओं को भड़काना, उनके खिलाफ बयानबाजी करना और परप्रांतिय की दीवार खड़ी करके रखना.
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कन्फ्यूज नेता दिखे राज ठाकरे

राजनीतिक तौर पर भी वो कई बार रास्ते बदलते दिखे. पहले जहां वो पीएम मोदी की तारीफ कर बीजेपी के करीब आते दिखे, वहीं फिर विरोध में बयानबाजी कर उद्धव ठाकरे के साथ आ गए. उनकी पहचान एक कन्फ्यूज नेता की बन गई, जो किसी एक मुद्दे पर नहीं टिक सकते. इस चुनाव के नतीजों ने उन्हें राजनैतिक तौर पर और कमजोर किया है. वो अब महाराष्ट्र की राजनीति में हाशिए पर आते दिख रहे हैं. जरूरत है उन्हें फिर से विचार करने की कि रणनीति में कहां कमी रह रही है, जनता को वास्तविक मुद्दों से कैसे जोड़ा जाए और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाकर जमीनी स्तर पर संगठन को कैसे मजबूत किया जाए.

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