- केरल के वायनाड के पल्पल्ली में आदिवासी बस्ती के लोग 70 वर्षीय हथिनी लक्ष्मी की मौत पर शोक मना रहे हैं
- लक्ष्मी वर्षों से गांव के पास जंगल से निकलकर चुपचाप समय बिताती थी और कभी लोगों को परेशान नहीं किया था
- गांव वाले उसे कटहल, आम और फलों से स्वागत करते थे, जिससे इंसान और जंगली हाथी के बीच अनोखा रिश्ता बन गया था
एक ओर जहां जंगली हाथियों के खौफ से लोग डरते और घबराते हैं, वहीं केरल के वायनाड से एक अनोखा मामला सामने आया है, जहां पूरा गांव एक हथिनी की मौत पर शोक मना रहा है. वायनाड के पल्पल्ली में चेकाडी के पास 'चंद्रोथ उन्नति' नाम की आदिवासी बस्ती के लोग 70 साल की एक जंगली हथिनी की मौत पर दुखी हैं, जिसे वे प्यार से 'लक्ष्मी' बुलाते थे.
स्थानीय लोगों का कहना है कि सालों से लक्ष्मी पास के जंगल से निकलकर चुपचाप बस्ती के पास घंटों बिताती थी. दूसरे हाथी जहां अक्सर गांवों में घुसकर फसलें बर्बाद करते हैं या लोगों पर हमला करते हैं, वहीं लक्ष्मी ने कभी लोगों को परेशान नहीं किया. धीरे-धीरे डर अपनापन में बदल गया.
गांव के लोग करते थे स्वागत
बच्चे उसकी एक झलक पाने का इंतजार करते थे. गांव वाले अपने खेतों से इकट्ठा किए गए कटहल, आम और दूसरे फलों के साथ उसका स्वागत करते थे. एक आजाद घूमने वाली जंगली हथिनी और आदिवासी समुदाय के बीच का यह अनोखा रिश्ता शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का स्थानीय प्रतीक बन गया था.
बुधवार सुबह, वन अधिकारियों को लक्ष्मी मृत अवस्था में मिली. वह उस गांव के पास जंगल में थी जिसे उसने अपना घर मान लिया था. अधिकारियों का अनुमान है कि वह लगभग 70 साल की थी. मौत की सही वजह का पता पोस्टमार्टम के बाद चलेगा. लक्ष्मी की मौत से 'चंद्रोथ उन्नति' गांव में शोक का माहौल है.
सबसे अनोखी थी 'लक्ष्मी'
वायनाड में, जहां इंसान और हाथी के बीच संघर्ष में दोनों तरफ जानें गई हैं और लोगों का नजरिया सख्त हो गया है, वहां लक्ष्मी सबसे अलग थी. वह इस बात का जीता-जागता सबूत थी कि इंसानों और जंगली जानवरों के बीच सह-अस्तित्व मुमकिन है, भले ही यह रिश्ता नाजक हो.
अब, वह शांत हथिनी, जो जंगल की सीमा पार करके घुसपैठिए की तरह नहीं, बल्कि एक जानी-पहचानी मेहमान की तरह आती थी. एक ऐसा खालीपन छोड़ गई है जिसे पूरा गांव महसूस कर रहा है.
आदिवासी इलाके से सामने आ रही पुरानी तस्वीरें एक दिलचस्प कहानी बयां करती हैं कि कैसे जंगल की विशाल हथिनी लक्ष्मी एक शांत और प्यार करने वाली हस्ती थी. महिलाएं, बच्चे और पुरुष अपने रोजमर्रा के काम करते रहते थे और लक्ष्मी शांति से उनके आस-पास चरती रहती थी. आदिवासी लोग लक्ष्मी को हमेशा याद करेंगे.
(इनपुट: अश्विन नंदकुमार)
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