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वाम मुक्त भारत... केरल में हार के साथ ही देश में ढह गया लेफ्ट का आखिरी किला!

वाम दलों की मौजूदगी मुख्य रूप से सिर्फ केरल तक सीमित रह गई थी. 2018 में त्रिपुरा में भी वामपंथी किला ढह गया था. अब केरल से आए नतीजों ने लेफ्ट की चिंता बढ़ा दी है. पहली बार वाम दलों के पास किसी भी राज्य की सत्ता नहीं है.

वाम मुक्त भारत... केरल में हार के साथ ही देश में ढह गया लेफ्ट का आखिरी किला!
  • केरल में हार के बाद वामपंथी पार्टियों की पिछले 50 सालों में पहली बार किसी भी राज्य में सरकार नहीं होगी
  • 2008 तक वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली थे, यूपीए सरकार उनके समर्थन से ही बनी थी
  • पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में लंबे समय तक वाम सरकार रही, लेकिन इन राज्यों में भी अब उनकी ताकत कमजोर हो गई है
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तिरुवनंतपुरम:

भारत की राजनीति में कभी मजबूत पकड़ रखने वाली वामपंथी पार्टियां अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी हैं, जहां पहली बार 50 से ज्यादा सालों में उनके पास किसी भी राज्य की सत्ता नहीं है. पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे प्रदेश गंवाने के बाद अब केरल में हार के साथ ही देश में लेफ्ट का आखिरी किला भी ढह गया. एक-एक कर राज्य हारने के बाद अब 2026 में आखिरकार 'वाम मुक्त भारत' हो गया.

साल 1996 में सीपीआई-एम के दिग्गज नेता ज्योति बसु, जो उस समय तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में करीब दो दशक पूरे कर चुके थे, देश के प्रधानमंत्री बनने तक के बेहद करीब पहुंच गए थे. यूनाइटेड फ्रंट सरकार के तहत उन्हें यह प्रस्ताव मिला था, लेकिन उनकी पार्टी के पोलित ब्यूरो ने इसे ठुकरा दिया. बाद में खुद ज्योति बसु ने इसे 'ऐतिहासिक भूल' बताया था.

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साल 2008 तक वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति में भी काफी प्रभावशाली थे. उस समय मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार (यूपीए) संसद में वाम दलों के समर्थन पर टिकी थी, लेकिन भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर वाम दलों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिससे सरकार को विश्वास मत का सामना करना पड़ा. उस दौर में वामपंथी दल पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा, तीन राज्यों में सत्ता में थे और लोकसभा में भी उनकी अच्छी-खासी मौजूदगी थी.

1970 के बाद पहली बार है जब किसी भी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं 

अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. पिछले कुछ सालों में मतदाताओं का झुकाव केंद्र-दक्षिणपंथी दलों की ओर बढ़ा है, जिससे वामपंथी दलों का प्रभाव लगातार घटता गया है. केरल में मौजूदा मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के सत्ता से बाहर जाते ही करीब 1970 के बाद यह पहली बार है, जब देश के किसी भी राज्य में वाम दलों की सरकार नहीं होगी.

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हालांकि भारत में वाम राजनीति का इतिहास काफी समृद्ध रहा है. देश के पहले आम चुनाव (1951-52) में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी थी. इसके कुछ साल बाद 1957 में केरल में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार बनी, जो अपने आप में ऐतिहासिक घटना थी.

1970 के दशक के अंत में वाम दलों का स्वर्णकाल शुरू हुआ. 1977 में पश्चिम बंगाल में सीपीआई-एम के नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट ने सत्ता हासिल की और इसके बाद वहां सबसे लंबा लगातार शासन चला. ज्योति बसु ने 23 साल तक मुख्यमंत्री रहकर रिकॉर्ड बनाया और 2000 में उन्होंने बुद्धदेव भट्टाचार्य को जिम्मेदारी सौंपी. 2011 तक वाम दलों का बंगाल पर कब्जा बना रहा.

त्रिपुरा में 20 साल तक रही लेफ्ट की सरकार

त्रिपुरा भी वामपंथ का मजबूत गढ़ रहा. 1993 से लेकर कई चुनावों तक लेफ्ट फ्रंट ने लगातार जीत हासिल की. माणिक सरकार जैसे नेता करीब 20 साल तक मुख्यमंत्री रहे और स्थिर शासन का उदाहरण बने.

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पिछले एक दशक में वाम दलों का पतन तेजी से शुरू हुआ. 2011 में पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और सिंगूर जैसे मुद्दों पर जनता के असंतोष ने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के लिए रास्ता साफ कर दिया. इसके बाद वाम दलों की ताकत तेजी से घटती गई.

इसके बाद वाम दलों की मौजूदगी मुख्य रूप से केरल तक सीमित रह गई. 2014 में केंद्र में भाजपा के उभार के बाद, 2018 में त्रिपुरा में भी वामपंथी किला ढह गया. 60 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 36 सीटें जीत लीं और वाम दलों की सीटें 50 से घटकर 16 रह गईं.

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केरल वाम दलों का आखिरी मजबूत गढ़ बचा. 2016 में पिनाराई विजयन के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में लौटा और 2021 में लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर परंपरा को तोड़ा. इससे वामपंथ को कुछ समय के लिए नई ऊर्जा मिली.
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अब केरल से आए नतीजों ने लेफ्ट की चिंता बढ़ा दी है. यहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने बड़ी जीत हासिल की है. ऐसे में ये वाम राजनीति के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है. पहली बार वाम दलों के पास किसी भी राज्य की सत्ता नहीं है.

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