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भारत से पेंशन बढ़ाने के लिए गिड़गिड़ा रहा पाक समर्थक हुर्रियत नेता सुमजी, लिख चुका तीन-तीन चिट्ठी

RTI के अनुसार, साल 2015 में गुलाम नबी सुमजी ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा सचिव को एक आवेदन भेजा था. इसमें उन्होंने लिखा था कि पूर्व विधायकों की पेंशन में संशोधन किया गया है.

भारत से पेंशन बढ़ाने के लिए गिड़गिड़ा रहा पाक समर्थक हुर्रियत नेता सुमजी, लिख चुका तीन-तीन चिट्ठी
फाइल फोटो
NDTV

कश्मीर में भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक राजनीति करने वाले हुर्रियत नेता गुलाम नबी सुमजी को जम्मू-कश्मीर सरकार के खजाने से हर महीने करीब 60 हजार रुपये पेंशन मिल रही है. एक RTI के जरिए हुए खुलासे ने अलगाववादी राजनीति और सरकारी सुविधाओं के इस्तेमाल को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. हैरानी की बात यह है कि सुमजी ने खुद अपनी पेंशन बढ़ाने के लिए आवेदन किया था. इस आवेदन को सरकार ने तीन बार मंजूरी दी और पेंशन करीब 24 हजार रुपये से बढ़कर 60 हजार रुपये प्रति माह पहुंच गई.

RTI से सामने आए दस्तावेजों के मुताबिक, प्रतिबंधित हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (गिलानी गुट) के महासचिव और अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के करीबी रहे सुमजी आज भी पूर्व विधायक के रूप में सरकारी पेंशन ले रहे हैं.

2018 से बढ़ा हुआ मिल रहा है पेंशन 

जानकारी के अनुसार, सुमजी को हर महीने लगभग 60 हजार रुपये की पेंशन जम्मू-कश्मीर के सरकारी खजाने से मिल रही है. RTI में यह भी सामने आया है कि उन्होंने केवल पेंशन हासिल ही नहीं की, बल्कि उसमें बढ़ोतरी के लिए कई बार आवेदन भी किया. उनकी अपीलों को तीन बार मंजूर किया गया. इसके बाद उनकी मासिक पेंशन धीरे-धीरे बढ़कर 60 हजार रुपये तक पहुंच गई. अप्रैल 2018 से वह बढ़ी हुई पेंशन ले रहे हैं.

1987 में विधायक बने, 1989 में अलगाववादी राजनीति में गए

गुलाम नबी सुमजी 1987 में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (MUF) के टिकट पर दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के होम शालीबुग-बिजबेहाड़ा क्षेत्र से विधायक चुने गए थे. वह 1987 से 1989 तक विधायक रहे.

इसके बाद 1989 में जब जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद और पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का दौर शुरू हुआ, तब उन्होंने विधायक पद छोड़कर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का रुख किया. बाद के वर्षों में वह अलगाववादी राजनीति का प्रमुख चेहरा बन गए और पाकिस्तान समर्थक रुख के लिए जाने गए.

पेंशन बढ़ाने के लिए खुद दी थी अर्जी

RTI के अनुसार, साल 2015 में सुमजी ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा सचिव को एक आवेदन भेजा था. इसमें उन्होंने लिखा था कि पूर्व विधायकों की पेंशन में संशोधन किया गया है और अन्य लोगों को बकाया राशि जारी की जा चुकी है. इसलिए उनकी बढ़ी हुई पेंशन और एरियर भी जारी किया जाए.

इसके बाद संबंधित प्रावधानों के तहत उनकी पेंशन में संशोधन किया गया और बकाया राशि भी जारी की गई. बाद में हुए संशोधनों के साथ उनकी पेंशन बढ़कर लगभग 60 हजार रुपये प्रति माह हो गई.

RTI खुलासे के बाद उठे सवाल

इस खुलासे के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं. आलोचकों का कहना है कि जो नेता सालों तक भारत के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाते रहे और भारतीय व्यवस्था को सार्वजनिक तौर से खारिज करते रहे, वे उसी व्यवस्था से मिलने वाली सुविधाओं और आर्थिक लाभों का फायदा कैसे उठाते रहे.

जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) एस.पी. वैद ने इस मामले को कश्मीर के युवाओं के लिए सबक बताया. उनका कहना है कि जिन नेताओं के कहने पर कई युवा भटके, वही नेता पर्दे के पीछे सरकारी सुविधाओं का लाभ लेते रहे.

वहीं, संगठन रूट्स इन कश्मीर के प्रवक्ता अमित रैना ने कहा कि यदि अलगाववादी राजनीति से जुड़े लोगों को सार्वजनिक धन से लाभ दिया जा रहा है, तो सरकार को इसकी पूरी पारदर्शिता और कानूनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए. उनका कहना है कि करदाताओं के पैसे के इस्तेमाल पर जनता को जवाब मिलना चाहिए.

सामाजिक कार्यकर्ता तस्लीमा ने भी सवाल उठाते हुए कहा कि टैक्सदाताओं के पैसे के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट जवाबदेही जरूरी है और सरकार को इस पूरे मामले पर अपना पक्ष रखना चाहिए.

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