Maharashtra News: दुनियाभर में इमारतों या मंदिरों का निर्माण हमेशा जमीन से शुरू होता है. पहले नींव खोदी जाती है, फिर खंभे खड़े होते हैं और अंत में छत या शिखर का निर्माण होता है. लेकिन भारत में एक ऐसा ऐतिहासिक अजूबा मौजूद है, जिसे बनाने के लिए प्राचीन शिल्पकारों ने इस स्थापित नियम को पूरी तरह उलट दिया. जी हां, हम बात कर रहे हैं महाराष्ट्र के संभाजीनगर में स्थित एलोरा की गुफा संख्या 16 यानी भव्य कैलाश मंदिर (The Great Kailasa) की.
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, यह मंदिर दुनिया में सबसे बड़ी एकल पाषाण खुदाई (Largest Single Monolithic Excavation in the World) का अनूठा उदाहरण है. इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसका निर्माण नीचे से ऊपर नहीं, बल्कि ऊपर से नीचे की तरफ हुआ था. यानी शिल्पकारों ने सबसे पहले इसकी छत बनाई और सबसे आखिर में इसका आधार तैयार हुआ.
बिना किसी सीढ़ी-मचान के कैसे बना ये अजूबा?
सोशल मीडिया पर इसे लेकर कई तरह के अजीबोगरीब दावे किए जाते हैं, लेकिन ASI के दस्तावेजों में इसके पीछे की असली तकनीक बताई गई है, जिसे वर्टिकल एक्सकैवेशन (Vertical Excavation) कहते हैं. आसान शब्दों में समझें तो यह मंदिर जिस पहाड़ पर बना है, वो लाखों साल पहले ज्वालामुखी के लावे से जमी एक बेहद मजबूत चट्टान है, जिसे 'बेसाल्ट' कहते हैं. कारीगरों ने सबसे पहले पहाड़ के ऊपर खड़े होकर 'U' आकार में तीन बहुत गहरी खाइयां खोदीं. इससे पहाड़ के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा पत्थर का टुकड़ा अकेले बच गया. इसके बाद कारीगरों ने सबसे पहले मंदिर का सबसे ऊपरी हिस्सा यानी उसका शिखर बनाया. जैसे-जैसे वो पत्थर काटते गए, नीचे उतरते गए और खंभे, मूर्तियां व कमरे बनते चले गए. चूंकि कारीगर ऊपर से काटते हुए नीचे आ रहे थे, इसलिए उन्हें ऊंचाई पर काम करने के लिए अलग से कोई सीढ़ी, बांस या मचान बांधने की जरूरत ही नहीं पड़ी. कटाई करने वाले मजदूर खुद तराशे हुए पत्थरों पर पैर टिकाकर नीचे उतरते चले गए.
मंदिर को बनाते वक्त गलती की कोई गुंजाइश नहीं थी
आज के समय में अगर घर बनाते वक्त कोई दीवार टेढ़ी हो जाए या कोई ईंट गलत लग जाए, तो हम उसे तोड़कर दोबारा ठीक कर सकते हैं. लेकिन कैलाश मंदिर के साथ ऐसा कोई चांस नहीं था. इसे 'सबट्रैक्टिव आर्किटेक्चर' कहते हैं. इसका मतलब है कि अगर कोई मूर्ति या खंभा तराशते समय कारीगर की छेनी जरा भी गलत चल जाती या एक पत्थर ज्यादा टूट जाता, तो उसे दोबारा जोड़ा नहीं जा सकता था क्योंकि वहां अलग से सीमेंट या पत्थर लगाने का कोई जुगाड़ नहीं था. इसके बावजूद, प्राचीन कारीगरों ने मंदिर के अंदर बारिश के पानी को निकालने और गुप्त रास्तों का ऐसा सटीक जाल बिछाया जो आज भी काम करता है.
आखिर इसे किसने और कब बनवाया?
इंटरनेट पर इस मंदिर की उम्र को लेकर कई मनगढ़ंत कहानियां हैं, लेकिन ASI के आधिकारिक साक्ष्य इसका बिल्कुल सटीक इतिहास बताते हैं. इस मंदिर को आज से करीब 1200 साल पहले यानी 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट राजवंश के राजा कृष्ण प्रथम ने बनवाया था. ASI के रिकॉर्ड के अनुसार, राजा कृष्ण प्रथम को इस मंदिर को बनाने का आइडिया कर्नाटक के पट्टदकल में बने प्रसिद्ध 'विरुपाक्ष मंदिर' को देखकर आया था. उन्होंने उसी डिजाइन को बेस मानकर एलोरा में इसे तैयार करवाया. यह मंदिर कितना लाजवाब है, इसका अंदाजा आप ASI की वेबसाइट पर दर्ज एक प्राचीन शिलालेख के इस अनुवाद से लगा सकते हैं- 'यह भव्य मंदिर राजा कृष्ण ने एक पहाड़ी पर बनवाया था. इसे देखकर आसमान से गुजरने वाले देवता भी हैरान रह गए कि यह इंसानों ने बनाया है या यह खुद-ब-खुद प्रकट हो गया है. यहां तक कि इसे बनाने वाला मुख्य कारीगर भी दंग रह गया और सोचने लगा कि अरे, इतना सुंदर मंदिर मैंने कैसे बना दिया.'
'जादू नहीं, हमारे पूर्वजों का टैलेंट है'
स्थानीय लोग इस जगह को 'वेरुल लेनी' के नाम से भी जानते हैं. उनका कहना है कि यह मंदिर किसी एलियन तकनीक या जादू से नहीं बना, बल्कि हमारे पूर्वजों के बेजोड़ दिमाग, गणित और कड़ी मेहनत का नतीजा है. यही वजह है कि आज यह यूनेस्को विश्व धरोहर (UNESCO World Heritage Site) पूरी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा अजूबा बनी हुई है.
कैलाश मंदिर जाने वाले पर्यटकों के लिए जरूरी बातयदि आप इस ऐतिहासिक अजूबे को अपनी आंखों से देखना चाहते हैं, तो ASI के आधिकारिक नियमों के अनुसार इन बातों का ध्यान रखें:-
- एलोरा की गुफाएं और कैलाश मंदिर सूर्योदय से सूर्यास्त तक (सुबह 6:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक) खुले रहते हैं.
- यह ऐतिहासिक स्थल हर मंगलवार को बंद रहता है, इसलिए अपनी यात्रा की प्लानिंग बुधवार से सोमवार के बीच ही करें.
- भारतीय नागरिक, सार्क (SAARC) और बिम्सटेक (BIMSTEC) देशों के पर्यटक 40 रुपये का कैश भुगतान करने यहां घूम सकते हैं. ऑनलाइन टिकट लेने पर 35 रुपये प्रति व्यक्ति का चार्ज लगता है.
- विदेशी पर्यटकों को यहां घूमने के लिए कैश में 600 रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं. हालांकि ऑनलाइन टिकट बुकिंग पर उन्हें 50 रुपये की छूट मिल सकती है.
- 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रवेश पूरी तरह मुफ्त है.
- वीडियो कैमरा ले जाने के लिए 25 रुपये का अतिरिक्त टिकट शुल्क देना होता है.
- चूंकि पूरा एलोरा परिसर 2 किलोमीटर के दायरे में फैला है और अकेले कैलाश मंदिर (गुफा संख्या 16) बेहद विशाल है, इसलिए पूरे परिसर को ठीक से देखने के लिए 3 से 4 घंटे का समय लेकर आएं.
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