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जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह बने सरकार के 'संकटमोचक', शांति के साथ कैसे बनाई बात

जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह अपने व्यवहार और सूझबूझ से ये विश्वास जगाने में कामयाब रहे कि सरकार बगैर किसी छल-कपट के सीजेपी नेताओं से बात कर रही है. साथ ही सरकार छात्रों की समस्याओं को बहुत गंभीरता से ले रही है. मगर ये सब इतना आसान नहीं रहा.

जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह बने सरकार के 'संकटमोचक', शांति के साथ कैसे बनाई बात
जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की सूझबूझ ने एक बड़ा आंदोलन को समाप्त करा दिया. (फोटो-PTI)
  • मोदी सरकार के संकटमोचक मंत्री अमित शाह ने कई आंदोलनों को कुशलता से संभाला है, जिससे संकट जल्दी खत्म हुए
  • जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह को सीजेपी आंदोलन के समाधान के लिए चुना गया मगर परदे के पीछे अमित शाह ही थे
  • सीजेपी ने वार्ता के लिए धरनास्थल पर मिलने की शर्त रखी, मांगों पर अड़े रहे मगर मंत्रियों ने उन्हें राजी कर लिया

लैंड बिल, सीएए बिल और फिर कृषि बिल के कारण नरेंद्र मोदी सरकार महीनों तक घिरी रही. मगर दिल्ली जंतर-मंतर धरना हंगामें के चंद दिनों में ही खत्म हो गया. ऐसी ही एक आंदोलन के कारण यूपीए सरकार की काफी किरकिरी हुई थी. अन्ना आंदोलन के समय कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए 2 मामले को सुलझाने में नाकाम हो गई. नतीजा उसे चुनाव में भुगतना पड़ा. ऐसे आंदोलनों के समय सरकार के सामने दिक्कत ये होती है कि शीर्ष नेतृत्व सीधे आंदोलनकारियों से बात नहीं कर सकता. कारण अगर बातचीत वहां फेल हुई तो फिर आगे संभालने वाला कोई नहीं रह जाएगा.

यहीं पर भूमिका होती है काबिल मंत्रियों की. जो शीर्ष नेतृत्व की बात समझे और आंदोलनकारियों की बात से भी शीर्ष नेतृत्व को अवगत कराए. ऐसे ही मंत्रियों को संकटमोचक कहा जाता है. मोदी सरकार के सबसे बड़े संकटमोचक मंत्री अमित शाह हैं. वो हर संकट से सरकार को ऐसे निकाल ले जाते हैं कि कुछ दिनों बाद लगता ही नहीं कि फलां संकट सचमुच इतना बड़ा था. मगर इस बात युवाओं की थी. हर कदम फूंक-फूंक कर रखना था. विपक्ष अपने पासे फेंक रहा था. अराजक तत्व अपने फायदे देख रहे थे. ऐसे में शीर्ष नेतृत्व ने जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह को इस काम के लिए चुना.

जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ही क्यों

जेपी नड्डा को चुनने के पीछे सूत्रों ने सबसे बड़ा कारण ये बताया कि वो स्वास्थ्य मंत्री हैं. नीट परीक्षा का मुद्दा उनसे भी जुड़ा हुआ है. साथ ही वो पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के भी नजदीकियों में गिने जाते हैं. जहां तक बात जितेंद्र सिंह की है तो उनके बारे में इतना ही जान लेना काफी है कि वो 2014 से लगातार पीएमओ में राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत हैं. मतलब पीएम मोदी उनके काम से ना सिर्फ बहुत संतुष्ट बल्कि उन्हें अपने नजदीक भी रखते हैं. चूंकि सीधे पीएम मोदी इस आंदोलन के मुद्दों को समझ रहे थे, इसलिए जेपी नड्डा के साथ जितेंद्र सिंह को भी बातचीत के लिए भेजा गया. परदे के पीछे से अमित शाह सारा मामला संभालते रहे.

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मगर ये इतना आसान भी नहीं था 

मगर ये सब इतना आसान भी नहीं था. शीर्ष नेतृत्व से हरी झंडी मिलने के बाद दोनों लगातार एक्टिव हो गए. पहली बार सरकार की ओर से जेपी नड्डा ने सीजेपी के सौरव दास और आशुतोष रांका से 20 जुलाई को मुलाकात की. इस मुलाकात में सीजेपी ने तीन प्रमुख मांगें रखीं. मगर इसके बाद सीजेपी वालों ने शर्त रख दी कि अब वो जेपी नड्डा के घर या दफ्तर में बात करने नहीं जाएंगे. उन्हें बात करनी है तो धरना स्थल पर आएं. इसके बाद 4 दिनों तक सरकार बुलाती रही पर सीजेपी वाले जिद पर अड़े रहे. मगर सरकार ने हार नहीं मानी और न्यूट्रल जगह पर बातचीत को राजी हो गई. 23 जुलाई को पीएम मोदी ने कई फैसले लिए, पेपर लीक को लेकर फास्ट ट्रैक कोर्ट और कड़ी सजा का ऐलान किया. उसी रात जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह फिर सोनम वांगचुक से बात करने पहुंचे. उन्हें समझाया कि सारी मांगे सरकार मान रही है. शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से कुछ नहीं होगा. सिस्टम में बदलाव किया जा रहा है. साथ ही किसी भी प्रदर्शनकारी स्टूडेंट पर कोई कार्रवाई नहीं होगी. आखिरकार इन दोनों मंत्रियों के समझाने पर सोनम वांगचुक ने अनशन तोड़ दिया. फिर 24 जुलाई को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में बातचीत में जेपी नड्डा के साथ जितेंद्र सिंह भी शामिल हुए. बातचीत अच्छी रही पर कोई नतीजा नहीं निकला. सीजेपी वाले शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़े रहे. 

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सूझबूझ से साध लिया सबको

फिर दोनों मंत्रियों ने शीर्ष स्तर पर बात पहुंचाई कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बगैर धरना समाप्त करना मुश्किल लग रहा है. इसके बाद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के नफा-नुकसान को शीर्ष नेतृत्व ने आंका और फैसला हुआ कि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दे दें. 25 जुलाई यानी आज धर्मेंद्र प्रधान ने ठीक जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की मीटिंग से पहले अपने इस्तीफे का ऐलान कर दिया. इसके बाद भी अभिजीत दीपके धरना और आगे बढ़ाने के मूड में थे, लेकिन इन दोनों मंत्रियों ने सीजेपी के दोनों प्रवक्ताओं को ऐसे घेरा कि उनके पास धरना बढ़ाने का और रास्ता नहीं सूझा. दोनों मंत्री सीजेपी नेताओं को ये विश्वास दिलाने में कामयाब हो गए कि सरकार सारी मांगे पूरी करेगी और अपनी बात से पीछे नहीं हटेगी. तब आम सहमति बनी कि जंतर-मंतर पर धरना तत्काल समाप्त होगा और सरकार अपने वादे को समय से पूरा करेगी. फिर प्रेस कांफ्रेंस हुई और धरना समाप्त करने का ऐलान हो गया.   

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