राजशाही, परंपरा और आधुनिकता का एक बेहतरीन तालमेल हैं मारवाड़ के महाराजा गज सिंह द्वितीय. उनकी जिंदगी के उतार-चढ़ाव किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं हैं. सिर्फ चार साल की मासूम उम्र में राजपाट संभालने से लेकर देश की राजनीति और संस्कृति में अपना डंका बजाने तक, इस 'मॉडर्न महाराजा' का सफर बेहद शानदार रहा है. दरअसल, गजसिंह को लेकर एक खबर सामने आई है. इसमें उनके नाम पर दर्ज करोड़ों रुपए की सैकड़ों बीघा जमीन हड़पने की कोशिश की जा रही है. इस मामले में जोधपुर में 10 नामजद आरोपियों समेत अन्य के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज कराया गया है. आपको बताते हैं कि जोधपुर के पूर्व महाराजा गज सिंह कौन हैं?
कौन हैं पूर्व महाराजा गज सिंह द्वितीय
तारीख थी 13 जनवरी 1948. मारवाड़-जोधपुर के शानदार राठौड़ घराने में महाराजा हनवंत सिंह के घर एक बेटे का जन्म हुआ. जिसे लोग बड़े प्यार से 'बापजी' बुलाने लगे. ये थे गज सिंह द्वितीय. 1947 में महाराजा हनवंत सिंह ने जोधपुर के भारत में विलय के दस्तावेज पर साइन कर दिए. राठौड़ वंश के वारिस महज चार साल के गज सिंह को आधिकारिक महाराजा मान लिया गया. जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, महज चार साल की उस कच्ची उम्र में गज सिंह अपनी रियासत के 39वें महाराजा बन चुके थे.
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पिता का साया अचानक उठने के बाद उनकी और उनके भाई-बहनों की परवरिश उनकी मां, राजमाता कृष्णा कुमारी ने की. आठ साल की उम्र में उन्हें पढ़ाई के लिए समंदर पार इंग्लैंड के मशहूर 'कोथिल हाउस' भेज दिया गया. ये तो बस उनके सफर की शुरुआत थी. आगे चलकर ईटन कॉलेज और ऑक्सफोर्ड जैसी दुनिया की सबसे नामी जगहों से उन्होंने फिलॉसफी, पॉलिटिक्स और इकोनॉमिक्स में तालीम हासिल की.
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भारत वापस लौटे तो संभाला पूरा परिवार
1970 का वक्त था, जब महाराजा गज सिंह अपनी जिम्मेदारियां संभालने वापस जोधपुर लौट आए. इसके बाद उन्होंने कश्मीर की पूंछ रियासत के राजा और नेपाल राजघराने की नलिनी राज्य लक्ष्मी देवी की बेटी हेमलता राजे से शाही शादी रचाई और अपनी विरासत को आगे बढ़ाया.

1971 में आया मोड़, इंदिरा गांधी ने लिया फैसला
फिर आया 1971 का वो साल, जब देश की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आया. 5 नवंबर 1971 को संविधान में ऐसा बदलाव हुआ जिसने महाराजा गज सिंह समेत देश के सभी राजा-महाराजाओं की जिंदगी पलट कर रख दी. राजाओं को मिलने वाले प्रिवी पर्स यानी सरकारी भत्ते और शाही विशेषाधिकार एक झटके में खत्म कर दिए गए. डिप्लोमेटिक छूट और राजशाही के सारे तमगे हमेशा के लिए इतिहास हो गए. राजघरानों को रोजी-रोटी के लिए गज सिंह के मुताबिक, "हमारे पास आलीशान महल थे. सैकड़ों कर्मचारियों का स्टाफ था, लेकिन तिजोरी खाली थी. मैंने सब कुछ नए सिरे से खड़ा किया. आज भगवान की कृपा से हमारे होटल और म्यूजियम ही हमारी रोजी-रोटी हैं और इसी के जरिए हम अपनी इस ऐतिहासिक विरासत को बचा पा रहे हैं."

Photo Credit: बेटी शिवरंजिनी राजे के साथ पूर्व महाराजा गज सिंह
विरासत को बनाया दुनिया का सबसे लग्जरी ब्रांड
अब जरा उस महल का जिक्र करते हैं, जिसकी भव्यता के चर्चे पूरी दुनिया में हैं- उम्मेद भवन पैलेस. कहा जाता है कि आज इस महल की कीमत करीब 25 हजार करोड़ रुपये है. उन्होंने अपने कारोबारी विजन से इसे एक नए मुकाम पर पहुंचाया. ताज ग्रुप के साथ हाथ मिलाया और इस महल को दुनिया के सबसे लग्जरी हेरिटेज होटल में तब्दील कर दिया. आज इस महल के तीन हिस्से हैं. एक हिस्से में शाही परिवार का निवास है, दूसरे में इतिहास समेटे हुए एक म्यूजियम है, और तीसरा वो लग्जरी होटल है, जहां दुनिया भर के अमीर लोग और हॉलीवुड-बॉलीवुड के सितारे शादियां रचाने आते हैं.

जिंदगी का सबसे बड़ा तूफान
दौलत और शोहरत के इस सफर में महाराजा की जिंदगी का सबसे बड़ा तूफान साल 2005 में आया. उनके इकलौते बेटे और पोलो के शानदार खिलाड़ी, युवराज शिवराज सिंह जयपुर में एक मैच के दौरान घोड़े से गिर पड़े. ये हादसा इतना खौफनाक था कि युवराज कोमा में चले गए. तब एक महाराजा के लिए ये जिंदगी का सबसे कड़ा इम्तिहान था. लेकिन गज सिंह टूटे नहीं. बेटे के इलाज और रिहैब के लिए उन्होंने दिन-रात एक कर दिया. आज युवराज रिकवर कर रहे हैं.

पत्नी और बच्चे के साथ राजकुमार शिवराज सिंह
पूर्व महाराजा गज सिंह का रुतबा सिर्फ राजमहलों का मोहताज नहीं था. उन्होंने विदेशी जमीन पर त्रिनिदाद और टोबैगो में भारतीय उच्चायुक्त बनकर देश का झंडा बुलंद किया. इतना ही नहीं, भारतीय संसद के उच्च सदन, राज्यसभा में पहुंचकर उन्होंने देश की राजनीति में भी अपना लोहा मनवाया और अहम योगदान दिया.
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