- जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में जाना बेगम के आतंकी बेटे रियाज ने मां की अंतिम इच्छा पूरी नहीं की
- रियाज हिजबुल का आतंकी है और उस पर दस लाख रुपये का इनाम घोषित है, जो पंद्रह साल से घर नहीं लौटा
- जाना बेगम ने बेटे से आतंक का रास्ता छोड़कर वापस आने की भावुक अपील की थी, लेकिन वह नहीं माना
"बेटा वापस आ जाओ, मेरा ख्याल रखना, और अगर मैं मर जाऊं तो मुझे कंधा देना. मैंने बहुत दुख सहा है. यह किस तरह का जिहाद है, जहां माता-पिता को छोड़ दिया जाता है?" जाना बेगम की ये भावुक अपील भी काम नहीं आई. बेटा मां की मौत के बाद कंधा देने भी नहीं आया. सवाल ये है कि क्या कोई भी वजह बेटे को मां को कंधा देने से रोक सकती है? बेटा कितना भी मजबूर क्यों न हो मां के अंतिम वक्त में आने की कोशिश जरूर करता है. लेकिन जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में जाना बेगम की अंतिम इच्छा अधूरी ही रह गई. वह अपने जिगर के टुकड़े को देखना चाहती थी लेकिन बेटा आया ही नहीं.
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टूट गई मां की उम्मीद की डोर
बेटे के मां से ना मिलने की वजह भी जान लीजिए. दरअसल जाना बेगम का बेटा रियाज अहमद हिजबुल एक आंतकी है. उनसे 15 साल पहले ही घर छोड़ दिया था. बेबस माता-पिता बेटे को आखिरी बार देखने की उम्मीद ही लगाए रहे. कुछ महीने पहले बेबस मां ने बेटे से हाथ जोड़कर विनती की थी वह आतंक के रास्ते से वापस घर लौट आए लेकिन उसने एक न सुनी. मां की अंतिम इच्छा भी जैसे उसके लिए कोई मायने ही नहीं रखती थी.

आतंकी बेटा मां को कंधा देने नहीं आया
जाना बेगम के आतंकी बेटे रियाज अहमद पर 10 लाख रुपये का इनाम घोषित है. उसने 15 साल पहले ही अपने बुजुर्ग माता-पिता को अकेला छोड़ आतंक का रास्ता चुन लिया था. मां ने अपने लाड़ले की याद में जैसे-तैसे जीवन गुजारा. आखिरी वक्त में भी उनको अपने जिगर के टुकड़े की एक झलक नसीब नहीं हो सकी. जाना बेगम आखिरी बार अपने लाल को देखना चाहती थीं लेकिन उनका इंतजार उनके साथ ही चला गया. बेटे को देखने की उम्मीद आंखों में लिए वह हमेशा से लिए दुनिया से रुखसत हो गईं. वह हर दिन दरवाजे पर टकटकी लगाए रियाज के लौटने का इंतजार करती थी. उनको लगता था कि बेटा उनके ताबूत को कंधा देने तो जरूर आएगा. लेकिन ऐसा नहीं हो सका.

मां की भावुक अपील भी आतंकी बेटे को वापस नहीं ला सकी
बता दें कि कुछ महीनों पहले आंखों में आंसू लिए जाना बेगम ने कांपती हुई आवाज में बेटे रियाज़ से बहुत ही भावुक अपील करते हुए कहा था-"रियाज़, वापस आ जाओ, इस दुख से मुझे उबार लो, मुझे और कुछ नहीं चाहिए." मां की इन बातों का आतंकी बेटे पर कोई असर नहीं हुआ. पिता ने भी आतंकी बेटे से हिंसा का रास्ता छोड़कर घर लौटने की अपील की थी. लेकिन रियाज़ ने उनकी बात नहीं मानी. वह नहीं लौटा. जाना बेगम अकेली नहीं हैं, जिन्हें आखिरी वक्त में बेटे की एक झलक भी नसीब नहीं हुई. उनकी जैसी अनगिनत माताएं हैं, जो अपने भटके हुए अपने बच्चों का इंतजार करती ही रह गईं. लेकिन बच्चों ने ममता से ऊपर आतंक को रखा. जाना बेगम की अधूरी इच्छा उनके साथ ही दफन हो गई.
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