- ISRO की बड़ी कामयाबी, NVS-03 के साथ अंतरिक्ष में पहुंची तीसरी स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक
- ISRO का एक और रिकॉर्ड, 56 दिन के अंतर में पूरा किया GSLV मिशन
- NVS-03 लॉन्च के साथ NavIC को मिली बड़ी ताकत, ISRO प्रमुख ने दी जानकारी
जब शुक्रवार रात देश के ज्यादातर लोग सो रहे थे, तब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के हजारों वैज्ञानिक, इंजीनियर और तकनीशियन एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक मिशन को अंजाम देने में जुटे थे. रात 11:51 बजे श्रीहरिकोटा से ISRO के जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल GSLV-F18 ने NVS-03 उपग्रह को लेकर उड़ान भरी. यह एक महत्वपूर्ण नेविगेशन उपग्रह है, जो भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली NavIC को मजबूत और पुनर्स्थापित करने में मदद करेगा. इस लॉन्च के साथ ही भारत के रीजनल नेविगेशन प्रोग्राम को बड़ी मजबूती देते हुए इसरो ने NVS-03 उपग्रह के साथ तीसरी स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया है. यह मिशन केवल एक और उपग्रह प्रक्षेपण नहीं था, बल्कि भारत के रणनीतिक बुनियादी ढांचे में मौजूद एक महत्वपूर्ण कमी को दूर करने की दिशा में बड़ा कदम था.
30 अक्टूबर को हुआ सफल प्रक्षेपण
ISRO ने 30 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से GSLV-F18 रॉकेट के जरिए NVS-03 उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया. प्रक्षेपण के बाद 2,250 किलोग्राम वजनी NVS-03 उपग्रह सफलतापूर्वक रॉकेट से अलग हुआ और उसे निर्धारित जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित कर दिया गया. मिशन की सफलता के कुछ ही मिनट बाद ISRO प्रमुख वी. नारायणन ने घोषणा की कि उपग्रह को सफलतापूर्वक और सटीक रूप से उसकी निर्धारित दीर्घवृत्ताकार कक्षा में स्थापित कर दिया गया है. मिशन के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत अब 'वन नेशन, वन टाइम' के लक्ष्य के और करीब पहुंच सकता है. उन्होंने स्वदेशी और अत्यधिक सटीक समय तथा नेविगेशन सेवाओं की आवश्यकता पर जोर दिया.
रिकॉर्ड समय में पूरा हुआ मिशन
वी. नारायणन ने बताया कि यह मिशन एक और वजह से खास रहा. लगातार दो GSLV मिशनों के बीच केवल 56 दिनों का अंतर रहा, जो अब तक का सबसे कम टर्नअराउंड टाइम है. उन्होंने इस सफलता के लिए ISRO के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, औद्योगिक साझेदारों और अकादमिक संस्थानों को बधाई दी.

NVS-03 सैटेलाइट लॉन्च
Photo : इसरो
इस लॉन्च का अहम हिस्सा था एटॉमिक क्लॉक अंतरिक्ष पहुंचाना
ISRO अध्यक्ष वी. नारायणन ने GSLV-F18/NVS-03 मिशन की सफलता के बाद बताया कि NVS-03 उपग्रह का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा एटॉमिक क्लॉक है. उन्होंने कहा कि अब तक दो स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक काम कर रही थीं, जबकि NVS-03 के साथ तीसरी स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक भी कक्षा में स्थापित कर दी गई है. यह तकनीक सटीक समय निर्धारण और नेविगेशन सेवाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है.
#WATCH | Sriharikota, Andhra Pradesh: On ISRO launching GSLV-F18 carrying NVS-03 navigation satellite from Satish Dhawan Space Centre, ISRO chief Dr V. Narayanan says, "...currently three satellites are already working, and this is the fourth satellite which has been launched. The important point today is that in this satellite, one of the important components is called an atomic clock, and we have placed one of the indigenous atomic clocks. Till now, two clocks are already working; the indigenous clocks are working perfectly. Today, we have also placed the third indigenous clock in orbit..."
— ANI (@ANI) October 30, 2026
अमेरिका से बेहतर होगा भारत का GPS सिस्टम
NVS-03 भारत की दूसरी पीढ़ी के नेविगेशन उपग्रहों की श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है और भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) का 12वां उपग्रह है. इसे IRNSS-1L नाम से भी जाना जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य मौजूदा उपग्रह समूह को मजबूत करना और NavIC नेटवर्क में नई क्षमताएं, अधिक विश्वसनीयता और मजबूती जोड़ना है. NavIC को अमेरिका की GPS प्रणाली के भारतीय विकल्प के रूप में विकसित किया गया है.
आज के दौर में क्यों है इसकी ज्यादा जरूरत?
इस प्रक्षेपण का महत्व ऐसे समय में और बढ़ जाता है जब भारत को स्वतंत्र नेविगेशन प्रणाली की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है.
NavIC को भारत और उसकी सीमाओं से 1,500 किलोमीटर तक अत्यधिक सटीक पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाएं देने के लिए डिजाइन किया गया है. यह प्रणाली आम नागरिकों के लिए स्टैंडर्ड पोजिशनिंग सर्विस और रणनीतिक उपयोगकर्ताओं के लिए प्रतिबंधित सेवा उपलब्ध कराती है. वर्तमान में इसके सिग्नल L5 और S बैंड में प्रसारित होते हैं, जबकि नई पीढ़ी के उपग्रहों में वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय L1 सिग्नल भी जोड़ा जा रहा है. इससे स्मार्टफोन, परिवहन, विमानन और समुद्री क्षेत्र में इसका उपयोग और बढ़ेगा.

Photo Credit: ISRO
ISRO को अपनी रणनीति क्यों बदलनी पड़ी?
हालांकि भारत के नेविगेशन कार्यक्रम को कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है. अब तक 11 नेविगेशन उपग्रह लॉन्च किए जा चुके हैं, लेकिन इनमें से कई में विशेष रूप से आयातित एटॉमिक क्लॉक से जुड़ी समस्याएं सामने आईं. समय के साथ कई उपग्रह आंशिक या पूरी तरह अनुपयोगी हो गए, जिससे पूरे नेटवर्क की क्षमता प्रभावित हुई. एक समय ऐसा भी आया जब सात परिचालन उपग्रहों पर आधारित प्रणाली केवल कुछ ही सक्रिय उपग्रहों के सहारे चल रही थी.
इसका जवाब था स्वदेशी तकनीक पर जोर. NVS-03 में एक भारतीय एटॉमिक क्लॉक भी लगाई गई है, साथ ही अन्य खरीदी गई क्लॉक भी मौजूद हैं. यह स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक भारत के लिए बड़ी तकनीकी उपलब्धि है क्योंकि इससे सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में विदेशी निर्भरता कम होगी.
भारत जैसे बड़े और महत्वाकांक्षी देश के लिए स्वदेशी नेविगेशन क्षमता अब कोई विलासिता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और सैन्य बुनियादी ढांचे की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है.
अब आगे NVS-04 और NVS-05 की बारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार कह चुके हैं कि ऑपरेशन सिंदूर जारी है. ऐसे परिदृश्य में सात उपग्रहों वाले पूर्ण NavIC नेटवर्क की जरूरत और अधिक बढ़ जाती है. NVS-03 के कक्षा में पहुंचने से नेटवर्क की क्षमता और मजबूत हुई है. अधिकारियों के अनुसार अब NavIC नेटवर्क को चार नेविगेशन उपग्रहों का समर्थन प्राप्त है, हालांकि दीर्घकालिक लक्ष्य सात पूर्ण परिचालन उपग्रहों वाला नेटवर्क तैयार करना है. इसी कारण आने वाले समय में NVS-04 और NVS-05 उपग्रहों का भी प्रक्षेपण किए जाने की संभावना है, ताकि इस नेटवर्क को पूरी तरह आधुनिक और सक्षम बनाया जा सके.
'नॉटी बॉय' से 'स्मार्ट बॉय'
इस मिशन का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू लॉन्च व्हीकल का प्रदर्शन भी रहा. GSLV Mk-II को कभी ISRO का 'नॉटी बॉय' कहा जाता था क्योंकि इसके शुरुआती वर्षों में कई असफलताएं और विशेष रूप से क्रायोजेनिक तकनीक से जुड़ी चुनौतियां सामने आई थीं. 20 प्रक्षेपणों में से छह असफल रहे थे, जिससे इसे अविश्वसनीय माना जाता था.
करीब 50 मीटर ऊंचे और 420 टन वजनी इस तीन चरण वाले रॉकेट ने एक बार फिर अपनी क्षमता साबित करते हुए NVS-03 को सटीक रूप से निर्धारित ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया. ISRO के लिए यह मिशन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्ष 2026 का उसका तीसरा प्रक्षेपण है. यह साल संगठन के लिए सफलताओं और चुनौतियों दोनों का गवाह रहा है, ऐसे में NVS-03 मिशन एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.
पूर्ण स्वदेशी नेविगेशन नेटवर्क की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रक्षेपण दुनिया को यह संदेश देता है कि तकनीकी चुनौतियों और बाधाओं के बावजूद भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी रणनीतिक क्षमताओं को मजबूत करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है.
जब देश सो रहा था, तब ISRO ने चुपचाप राष्ट्र को एक मिडनाइट गिफ्ट दिया. यह वही नेविगेशन नेटवर्क है जिसकी नींव कारगिल युद्ध से मिले सबक पर रखी गई थी, जिसे कई तकनीकी चुनौतियों ने परखा और जिसे अब भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से मजबूत किया जा रहा है.
फिलहाल ISRO का 'स्मार्ट बॉय' अपना काम सफलतापूर्वक कर चुका है और भारत वास्तविक नेविगेशन स्वतंत्रता तथा 'वन नेशन, वन टाइम' के लक्ष्य के एक कदम और करीब पहुंच गया है..
यह भी पढ़ें : अमेरिका के GPS को मिलेगी टक्कर! ISRO ने लॉन्च किया NVS-03 सैटेलाइट; जानें क्या होगा फायदा?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं