इजरायल ने अगले चार सालों में पूर्वोत्तर भारत से पूरे 'बनेई मेनाशे' समुदाय को अपने देश लाने की योजना की घोषणा की है. यह दुनिया के सबसे अनोखे यहूदी समुदायों में से एक के लिए दशकों से चल रही इमिग्रेशन प्रक्रिया का एक बड़ा विस्तार है. उत्तरी इजरायली शहर नोफ हगालील में नए आए प्रवासियों के सम्मान में आयोजित एक समारोह में बोलते हुए, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि सरकार इस समुदाय के बाकी सभी सदस्यों को इजरायल लाने की प्रक्रिया को आसान बनाना चाहती है.
'चार साल में पूरे समुदाय को लाएंगे इजरायल'
नेतन्याहू ने वहां मौजूद लोगों से कहा, 'हम अगले चार सालों में पूरे समुदाय को इजरायल लाएंगे. उन्होंने 'बनेई मेनाशे' को यहूदी लोगों का एक अहम हिस्सा बताया और उन्हें उनकी पुश्तैनी जमीन पर आने के लिए स्वागत किया. इस कार्यक्रम में इजरायल के वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच, आलिया और ओफर सोफर समेत नोफ हगालील के मेयर रोनेन प्लॉट भी शामिल हुए.
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प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, इस साल की शुरुआत से अब तक 'बनेई मेनाशे' समुदाय के लगभग 600 सदस्य इजरायल आ चुके हैं और 2026 के अंत तक 600 और लोगों के आने की उम्मीद है. यह इमिग्रेशन सरकार द्वारा मंजूर की गई उस पहल का हिस्सा है, जिसका मकसद भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में रह रहे समुदाय के लगभग 6,000 बचे हुए सदस्यों को इजरायल में बसाना है.
कौन हैं 'बनेई मेनाशे'?
'बनेई मेनाशे' मुख्य रूप से भारत के मणिपुर और मिज़ोरम राज्यों में रहने वाला एक समुदाय है. वे अपनी वंशावली को बाइबिल में बताए गए 'मनाशे के कबीले' से जोड़ते हैं. यह प्राचीन इजरायल के उन 'दस खोए हुए कबीलों' में से एक था, जो परंपरा के अनुसार, 2700 साल से भी पहले असीरियाई लोगों द्वारा इजरायल साम्राज्य पर कब्जा करने के बाद गायब हो गए थे.
पीढ़ियों से इस समुदाय ने ऐसी परंपराओं को बनाए रखा, जिनके बारे में कुछ सदस्यों का मानना था कि वे प्राचीन इजरायली परंपराओं जैसी ही है. 20वीं सदी के आखिर में, यहूदी संगठनों और इजरायली अधिकारियों के साथ बढ़ते संपर्कों के कारण, कई 'बनेई मेनाशे' परिवारों ने मुख्यधारा के यहूदी धर्म को अपनाया और इजरायल के वंशज के तौर पर मान्यता पाने की कोशिश की. आखिरकार, इजरायल के धार्मिक अधिकारियों ने इस समुदाय के ऐतिहासिक दावों को काफी हद तक मान लिया है और उन्हें खास इंतजामों के तहत बसने की इजाज़त दे दी है. हालांकि यहूदी धार्मिक जीवन में पूरी तरह शामिल होने से पहले, प्रवासियों को आम तौर पर इजरायली रब्बीनेट द्वारा मान्यता प्राप्त औपचारिक धर्म-परिवर्तन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. पिछले दो दशकों में हजारों 'बनेई मेनाशे' लोग इजरायल में बस चुके हैं और देश भर के शहरों और कस्बों में अपने समुदाय बना चुके हैं.
क्या होता है अलियाह?
इजरायल में यहूदियों के बसने की प्रक्रिया को आम तौर पर 'अलियाह' कहा जाता है. यह एक हिब्रू शब्द है जिसका अर्थ है 'ऊपर चढ़ना' या 'ऊपर जाना'. यहूदी परंपरा में, इस शब्द का भौतिक और आध्यात्मिक दोनों तरह का महत्व है, जो इजरायल की भूमि पर लौटने के विचार को दर्शाता है. आधुनिक जायोनवाद और इजरायली राज्य की स्थापना में 'अलियाह' एक मुख्य अवधारणा रही है. 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद से, लगातार सरकारों ने दुनिया भर से यहूदियों के आने को बढ़ावा दिया है. वे इसे एक राष्ट्रीय मिशन और यहूदी सरजमीं के लिए ऐतिहासिक आकांक्षाओं को पूरा करने के रूप में देखते हैं. कई बनेई मेनाशे परिवारों के लिए अलियाह उस लंबे समय से देखे जा रहे सपने के सच होने जैसा है, जिसमें वे अपनी पैतृक जड़ों से फिर से जुड़ना चाहते थे.
प्रवासियों के लिए खुला एब्ज़ॉर्प्शन सेंटर
प्रवासियों के आने की नई पहल के तहत, इजरायली अधिकारियों ने इस हफ्ते नोफ हगालील में 'टावोर एब्ज़ॉर्प्शन सेंटर' का उद्घाटन किया. इस सेंटर को नए आने वालों की इजरायल में जीवन के साथ तालमेल बिठाने में मदद करने के लिए बनाया गया है. यहां हिब्रू भाषा की शिक्षा, सामाजिक सेवाएं और रोजगार, शिक्षा व समुदाय में घुलने-मिलने में मदद दी जाती है. 'अलियाह और इंटीग्रेशन' मंत्री सोफर ने नए आने वाले लोगों को कई परिवारों की लंबे समय से चली आ रही इच्छा के पूरा होने जैसा बताया.
भारत-इजरायल संबंध भी हो रहे मजबूत
नेतन्याहू ने इस पहल को इजरायल और भारत के बीच मजबूत होते रिश्तों से भी जोड़ा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने संबंधों का जिक्र किया. हाल के सालों में व्यापार, रक्षा, तकनीक, कृषि और लोगों के बीच आपसी आदान-प्रदान के क्षेत्रों में दोनों देशों के संबंध काफी बढ़े हैं.
हालांकि 'बनेई मेनाशे' समुदाय भारत की आबादी का एक छोटा सा हिस्सा है, लेकिन इजरायल में उनका बसना दोनों देशों के बीच एक अनोखा ह्यूमन ब्रिज बन गया है. अगर योजना के मुताबिक इसे लागू किया जाता है, तो इस पहल से भारत में बची हुई लगभग पूरी 'बनेई मेनाशे' आबादी दशक के आखिर तक इजरायल आ जाएगी. इससे आधुनिक यहूदी दुनिया की सबसे अनोखी और जिस पर सबकी नजर रही है, ऐसी माइग्रेशन की कहानी का समापन होगा.
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