- भारत दाल का सबसे बड़ा उपभोक्ता, उत्पादक और आयातक है, लेकिन अब आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है
- ‘मिशन आत्मनिर्भरता इन पल्सेज’ के तहत 2030-31 तक दाल उत्पादन में पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल करने का लक्ष्य रखा
- नई दाल किस्में उत्पादन बढ़ाने और जलवायु प्रतिरोधी होने के कारण कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव ला रही हैं
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उपभोक्ता, उत्पादक और साथ ही आयातक रहा है. एक ऐसा विरोधाभास जो सालों से भारतीय थाली पर हावी रहा. तूर, उड़द और मसूर जैसी दालों के लिए देश अब भी अमेरिका, अफ्रीका, म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा पर निर्भर रहा है. हर कटोरी सांभर और दाल तड़का के पीछे ग्लोबल सप्लाई चेन और कीमतों की अस्थिरता का दबाव छिपा था. लेकिन अब स्थितियां बदलने जा रही हैं.

अमेरिकी डॉक्यूमेंट से हटे 'दाल' के जिक्र ने बदल दिया संकेत
अमेरिका के एक ट्रेड डॉक्यूमेंट में “कुछ दालों” पर टैरिफ रियायत का जिक्र सामने आते ही दिल्ली में राजनीतिक हलचल मच गई. दाल सिर्फ एक कमोडिटी नहीं, बल्कि भारत की पोषण सुरक्षा और राजनीतिक संवेदनशीलता से जुड़ा मुद्दा है. लेकिन कुछ ही घंटों में व्हाइट हाउस ने इस संदर्भ को हटाकर एक सशक्त संकेत दे दिया. इसका मतलब ये हुआ कि भारत अब कमजोर स्थिति में नहीं है और अपनी दाल नीति खुद तय करेगा.
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भारत का मास्टरस्ट्रोक: ‘मिशन आत्मनिर्भरता इन पल्सेज'
इस आत्मविश्वास की वजह है वह बड़ा कदम, जो केंद्र ने 11 अक्टूबर 2025 को उठाया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मिशन आत्मनिर्भरता इन पल्सेज' लॉन्च किया. एक 6-वर्षीय, 11,440 करोड़ रुपये का राष्ट्रीय कार्यक्रम, जिसका लक्ष्य 2030-31 तक दाल उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भरता हासिल करना है. मिशन के प्रमुख लक्ष्य:
- 2030-31 तक 350 लाख टन दाल उत्पादन
- 310 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दाल की खेती
- 4 वर्ष तक तूर, उड़द और मसूर की 100% MSP पर खरीद
- लगभग 2 करोड़ किसानों को सीधा लाभ
- मुफ्त बीज किट, प्रमाणित बीज और वैल्यू-चेन समर्थन
यह नीति रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक रणनीति है, जो कि दालों के बाजार को भारत-केंद्रित बनाने की योजना रखती है.
विज्ञान से मिल रही मदद, नई बीज किस्मों ने दी गति
दाल क्रांति की रीढ़ नई वैज्ञानिक किस्में हैं. हैदराबाद स्थित ICRISAT ने भारतीय संस्थानों के साथ मिलकर तूर की हाई-यील्ड, क्लाइमेट-रेजिलिएंट किस्में तैयार की हैं, जो कृषि में बड़ा बदलाव ला सकती हैं. ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक बताते हैं कि भारत प्रतिवर्ष 25 मिलियन टन दाल पैदा करता है, लेकिन 5–6 मिलियन टन आयात भी करना पड़ता है. इसका कारण उत्पादकता की कमी है, जो सिर्फ 800–900 kg/हेक्टेयर है, जबकि क्षमता 1.4–1.5 टन तक की है.

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नई किस्म ICB 25444 की खासियत:
- सिर्फ 120–125 दिनों में तैयार
- प्रति हेक्टेयर 2.5 टन तक उत्पादन
- गर्मी (45°C तक) सहनशील
- छोटे आकार की, मशीन से कटने योग्य
- फोटो-इंसेंसिटिव—अलग-अलग मौसम में बोई जा सकती
आपको बता दें कि ये किस्में वर्तमान भूमि पर उत्पादन बढ़ाने के साथ नए क्षेत्रों में भी खेती का विस्तार संभव करती हैं, जैस कि गर्मी का मौसम और धान कटने के बाद खाली पड़े खेत.
राइस फॉलो से पल्सेज तक, कृषि नक्शे में बड़ा बदलाव
इस मिशन का एक बड़ा फोकस है क्रॉप सब्स्टीट्यूशन. भारत में 4.4 करोड़ हेक्टेयर में धान उगाया जाता है, जिसमें 60–70 लाख हेक्टेयर ऐसे हैं जहां पानी की कमी और कम उत्पादकता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह पूरा इलाका दालों के लिए आदर्श है. डॉ. पाठक कहते हैं कि जितने पानी में एक धान की फसल होती है, उतने में पाँच तूर की फसलें उगाई जा सकती हैं." पल्सेज मिट्टी में नाइट्रोजन भी बढ़ाती हैं, जिससे उर्वरक की जरूरत घटती है. यह बदलाव सिर्फ दाल उत्पादन नहीं बढ़ाता, बल्कि कृषि को और भी टिकाऊ बनाता है.
किसानों के भरोसे की वापसी, MSP और बीज सप्लाई ने बदला समीकरण
वर्षों तक किसान दाल उगाने से कतराते रहे, क्योंकि कम पैदावार, कीमतों में उतार-चढ़ाव और अनिश्चित खरीद परेशानी का सबब रही. नए मिशन ने इन तीनों समस्याओं को सीधे निशाने पर लिया है.
- 88 लाख फ्री बीज किट
- 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज
- 5-वर्षीय बीज उत्पादन योजना
- रीयल-टाइम मॉनिटरिंग के लिए SAATHI पोर्टल
- खरीद की जिम्मेदारी NAFED और NCCF
इन उपायों के बाद किसान दाल की खेती के लिए फिर से भरोसे के साथ आगे बढ़ेंगे.

आयातक से निर्यातक बनने की राह पर भारत
भारत इस समय अपनी जरूरत का 15–20% दाल आयात करता है. लेकिन नई किस्में और बड़े पैमाने पर घरेलू उत्पादन के साथ देश न सिर्फ आयात बंद कर सकता है, बल्कि वैश्विक दाल बाजार का स्थिरकर्ता भी बन सकता है. यह वह स्थिति होगी जब अमेरिका सहित किसी भी देश की टैरिफ चेतावनी का असर सीमित रह जाएगा.
धीरे-धीरे हो रही क्रांति, लेकिन असर दिखेगा गहरा
यकीनन यह दाल क्रांति हरित क्रांति की तरह तात्कालिक और तेज़ नहीं दिखती, लेकिन इसकी नींव मजबूत और गहरी है. नीति, विज्ञान, खरीद और किसानों का विश्वास. सरकारें टैरिफ और दस्तावेज़ बदलती रहेंगी, लेकिन असली बदलाव खेतों, बीज प्रयोगशालाओं और किसान निर्णयों में दिखेगा और जब यह क्रांति पूरी तरह परिपक्व होगी, तो भारत से “दाल आयातक देश” का टैग हमेशा के लिए हट सकता है. आने वाले कल की आपकी थाली में परोसी जाने वाली तूर या अरहर की दाल, लगभग तय है, पूरी तरह देश में उगी होगी.
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