- चुनाव आयोग पर विपक्षी दलों ने अक्सर पक्षपात और निष्पक्षता से जुड़े आरोप लगाए हैं, जिसमें बीजेपी भी शामिल रही है
- 2014 में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को वाराणसी में प्रचार की अनुमति न मिलने पर चुनाव अधिकारी पर आरोप लगाए थे
- दिल्ली में विरोध प्रदर्शन का केंद्र 1990 के दशक तक बोट क्लब होता था, बाद में ये जंतर-मंतर शिफ्ट हुआ
चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष आंदोलित है. सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई जारी है. मगर, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. इतिहास के पन्नों को पलटें तो चुनाव आयोग कई बार विपक्षी दलों के निशाने पर आया है. अभी सत्ता में मौजूद बीजेपी ने भी कई बार चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोला है. यहां तक की 2014 लोकसभा चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी के लिए भी बीजेपी ने चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोला था.
क्यों भड़की थी बीजेपी
2014 के लोकसभा चुनाव में उतरते समय बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का चेहरा बना दिया था. मोदी पहली बार वाराणसी से चुनाव लड़ रहे थे. उस दौरान वाराणसी में नरेंद्र मोदी को रैलियां करने की इजाजत नहीं दी गई तो बीजेपी ने शहर के चुनाव अधिकारी पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए उन्हें हटाने की मांग की. भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया कि मोदी को इजाज़त नहीं देने के फैसले में उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी का हाथ था. चुनाव आयोग को लिखे एक पत्र में पार्टी नेता अरुण जेटली ने कहा कि चुनाव अधिकारी को 5 मई को ही रोहनिया और बेनियाबाग में होने वाली दो रैलियों के बारे में ज़ुबानी तौर पर बता दिया गया था. इसके बाद 6 मई को एक औपचारिक आवेदन भेजा गया था.जेटली ने कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर की कोशिश मोदी को वाराणसी शहर में प्रचार करने से रोकने की है, और चुनाव अधिकारी ने इसके लिए सुरक्षा कारणों का हवाला दिया है.

ये 2014 की तस्वीर है, जब रैली की इजाजत नहीं मिलने पर नरेंद्र मोदी को वाराणसी में रोड-शो करना पड़ा.
उस समय बीजेपी की प्रवक्ता रहीं निर्मला सीतारमण ने भी कहा कि इस इजाजत को न देने के पीछे उत्तर प्रदेश सरकार का हाथ है. सीतारमण ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "भारतीय चुनावों में शायद यह पहली बार हो रहा है कि किसी उम्मीदवार को अपने ही चुनाव क्षेत्र में रैली करने की इजाजत नहीं दी जा रही है. जिला प्रशासन समाजवादी पार्टी के किसी आदेश का पालन कर रहा है." इसके विरोध में भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह, अरुण जेटली और अनंत कुमार वाराणसी में BHU परिसर के बाहर सड़क पर धरने पर बैठ गए थे. वहीं दिल्ली में भाजपा कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग मुख्यालय तक मार्च निकाला था. तय जगहों पर रैली तो नहीं हो सकी लेकिन चुनाव आयोग ने जवाब दिया कि वह "पक्षपात के आरोपों" को स्वीकार नहीं करता है और वादा किया कि अगर कोई अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहता है या पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. इसके बाद ये मामला शांत हो गया.
कब-कब लगे चुनाव आयोग पर आरोप
- दिसंबर 2025 में राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में कांग्रेस की तरफ से वोट चोर गद्दी छोड़ महारैली का आयोजन किया गया.
- कांग्रेस ने सरकार और चुनाव आयोग की मिलीभगत से लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए इसी मुद्दे पर यह रैली आयोजित की गई.
- इस रैली को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सहित अन्य नेताओं ने संबोधित किया.
- जून 1991 (पंजाब चुनाव टालना - टी.एन. शेषन का दौर):उग्रवाद के दौर में टी.एन. शेषन ने वोटिंग से 36 घंटे पहले पंजाब चुनाव टाल दिए थे.
- भाजपा ने चुनाव आयोग के इस फैसले का कड़ा विरोध किया था. भाजपा का मानना था कि चुनाव टालने से लोकतंत्र को नुकसान होगा और पार्टी नेताओं ने आयोग के खिलाफ तीखी बयानबाजी और प्रदर्शन किए थे.
- लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे शीर्ष नेताओं ने सड़कों पर उतरकर अपनी गिरफ्तारी दी.
बोट क्लब से जंतर-मंतर तक का बदलाव
- 1990 के दशक की शुरुआत से पहले, राजधानी दिल्ली में बड़े पैमाने पर आंदोलन और प्रदर्शन करने का मुख्य केंद्र 'बोट क्लब' हुआ करता था.
- यह क्षेत्र इंडिया गेट और आज के कर्तव्य पथ के बेहद करीब स्थित है. साल 1988 में प्रसिद्ध किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लगभग पांच लाख किसान इस जगह पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए थे.
- इस ऐतिहासिक प्रदर्शन के कारण पूरी मध्य दिल्ली की व्यवस्था ठप पड़ गई थी.
- इस भारी भीड़ और सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चिंताओं को देखते हुए सरकार और प्रशासन ने बोट क्लब पर होने वाले आयोजनों और प्रदर्शनों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए.
- इसके बाद, साल 1993 के आसपास जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शनों के नए ठिकाने के रूप में सामने आया.
- हालांकि, इसे किसी सरकारी आदेश या अधिसूचना के जरिए आधिकारिक रूप से प्रदर्शन स्थल घोषित नहीं किया गया था, बल्कि समय के साथ वहां होने वाली सभाओं के कारण यह स्वतः ही इस रूप में पहचान पा गया.
- जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन 1993 में डीसूसा (DUSU) के तत्कालीन अध्यक्ष आशीष सूद द्वारा केंद्र सरकार के एक आदेश के विरोध में किये गए प्रदर्शन को माना जाता है.

प्रशासनिक नियम और भीड़ की सीमाएं
31 जनवरी 2003 को दिल्ली पुलिस द्वारा जारी स्टैंडिंग ऑर्डर नंबर 309 के तहत यह नियम बनाया गया कि जंतर-मंतर पर एक समय में 5,000 से अधिक लोग जमा नहीं हो सकते.
साथ ही, प्रदर्शनकारियों के वाहनों के प्रवेश पर भी पाबंदी लगाई गई. यदि प्रदर्शन में इससे अधिक भीड़ जुटने की संभावना हो, तो उसके लिए रामलीला मैदान जाने की व्यवस्था तय की गई.
बोट क्लब से भी पहले कहां होती थीं सभाएं?
- बोट क्लब को मुख्य केंद्र बनाए जाने से पहले दिल्ली में राजनीतिक और सामाजिक विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से अकबर रोड के आसपास हुआ करते थे.
- चूंकि बोट क्लब संसद, राष्ट्रपति भवन और मंत्रालयों (नॉर्थ-साउथ ब्लॉक) के बेहद नजदीक था, इसलिए सत्ता पर दबाव बनाने के लिए इसे सबसे मुफीद जगह माना जाता था.
- लेकिन 1988 में जब किसानों ने वहां डेरा डालकर अपने मवेशी बांध लिए और वहीं भोजन पकाने लगे, तो सरकार की नींद उड़ गई, जिसके बाद वहां रैलियों पर रोक लगा दी गई.
एनजीटी (NGT) की रोक और सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
- साल 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने जंतर-मंतर पर सभी प्रकार के धरने-प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगा दी थी.
- एनजीटी का तर्क था कि इन आयोजनों के कारण इलाके की हरियाली नष्ट हो रही है और भारी गंदगी फैल रही है. अदालत ने प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान शिफ्ट होने की सलाह दी.
- हालांकि, इस फैसले के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां 2018 में शीर्ष अदालत ने एनजीटी के आदेश पर रोक लगाते हुए दिल्ली पुलिस को इस संबंध में नए सिरे से संतुलित दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया.
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: जंतर-मंतर का मूल निर्माण
- आज जिसे हम लोकतंत्र के मंच यानी विरोध प्रदर्शनों के केंद्र के रूप में जानते हैं, असल में वह एक ऐतिहासिक धरोहर है.
- दिल्ली के हृदय स्थल पर स्थित इस जंतर-मंतर का निर्माण साल 1724 में आमेर के राजा महाराज जयसिंह द्वितीय ने करवाया था. यह मूल रूप से एक प्राचीन खगोलीय वेधशाला है.
- मुगल बादशाह मोहम्मद शाह के शासनकाल के दौरान जब देश के हिंदू और मुस्लिम खगोलविदों के बीच ग्रहों की स्थिति और उनकी गणनाओं को लेकर मतभेद और लंबी बहस छिड़ गई थी, तो उस वैचारिक असमंजस को दूर करने के लिए सवाई जय सिंह ने सटीक खगोलीय माप के वास्ते इस वेधशाला का निर्माण कराया था.

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जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल से क्यों हटाया गया?
- 9 अक्टूबर को चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने प्रदर्शन से पहले दिल्ली में ट्रेन और मेट्रो सेवाओं पर लगाई गई पाबंदियों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की थी.
- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के लिए बेहतर सुविधाओं वाली वैकल्पिक जगह तय करने के सुझाव पर विचार किया जाए.
- अदालत ने कहा कि ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां प्रदर्शनकारियों को जरूरी बुनियादी सुविधाएं मिल सकें.
- तुषार मेहता ने भी कहा था कि सक्षम प्राधिकारी इस पर फैसला लेगा और कपिल सिब्बल इस सुझाव पर सहमत थे.
- अदालत ने साथ ही दिल्ली में ट्रेन और मेट्रो सेवाएं पूरी तरह बंद करने के बजाय उन्हें नियंत्रित तरीके से जारी रखने का निर्देश दिया था.
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