- ट्रेन 2400 किलोवाट शक्ति वाली हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रणाली से संचालित होगी और अधिकतम गति 75 किमी प्रति घंटा है
- ट्रेन पूरी तरह भारत में डिज़ाइन और विकसित की गई है, जो आत्मनिर्भर भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है
- हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक के कारण इस ट्रेन से केवल पानी और गर्मी उत्सर्जित होती है, जिससे यह प्रदूषण मुक्त है
हरित और टिकाऊ परिवहन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, भारतीय रेलवे ने नॉर्दर्न रेलवे के जींद-सोनीपत सेक्शन पर 10-कोच वाली हाइड्रोजन फ्यूल सेल-बेस्ड ट्रेन चलाने को मंजूरी दी है. इस ऐतिहासिक पहल के साथ, भारत हाइड्रोजन फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके साफ और टिकाऊ रेल सेवाएं चलाने वाले दुनिया के अग्रणी देशों के विशेष क्लब में शामिल होने जा रहा है. यह ट्रेन 1200 KW के हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रोपल्शन सिस्टम से चलेगी और इसकी अधिकतम रफ्तार 75 किमी/घंटा होगी.
हाइड्रोजन ट्रेन की मुख्य विशेषताएं
- विश्व रिकॉर्ड क्षमता: फिलहाल, यह ब्रॉड गेज पर दुनिया की सबसे लंबी (10 कोच वाली) और सबसे शक्तिशाली (2400 kW) हाइड्रोजन ट्रेन-सेट है.
- पावर कॉन्फ़िगरेशन: इस ट्रेन-सेट में 1200 kW की दो ड्राइविंग power कार (DPC) हैं (कुल मिलाकर 2400 kW) और साथ में आठ पैसेंजर कार हैं.
- विशिष्ट डिजाइन संरचना: इसमें हाइड्रोजन स्टोरेज सिलेंडर, फ्यूल सेल सिस्टम, बैटरी और कंट्रोल सिस्टम के लिए अलग कोच / जगह निर्धारित की गई हैं.
- रेंज और स्पीड: एक बार रिफ्यूल होने पर इसकी रेंज लगभग 250 किमी है. इसकी ट्रायल स्पीड 120 किमी/घंटा और व्यावसायिक परिचालन स्पीड 75 किमी/घंटा निर्धारित की गई है.
- सुरक्षित ईंधन भण्डारण: इसमें सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए आगे की तरफ लगभग 27 और पीछे की तरफ 27 हाइड्रोजन सिलेंडर लगाए गए हैं.
स्वदेशी विकास एवं निर्माण:
इसे पूर्णत भारत में डिज़ाइन और विकसित किया गया है, जो 'आत्मनिर्भर भारत' के प्रति भारतीय रेलवे की प्रतिबद्धता को दिखाता है.
- डिज़ाइन – रेलवे के रिसर्च डिज़ाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइज़ेशन (RDSO), लखनऊ
- निर्माण – इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF), चेन्नई
हाइड्रोजन फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी
यह ट्रेन मूल रूप से अपनी बिजली खुद बनाती है – यानी यह एक ‘चलता-फिरता बिजली जनरेटर' है. हाइड्रोजन फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी हाइड्रोजन का इस्तेमाल करके केमिकल रिएक्शन के जरिए बिजली बनाती है. इसमें सबसे बड़ा फायदा यह है कि जीरो CO2 उत्सर्जन होता है – प्रक्रिया के उप-उत्पाद (by-product) के रूप में इससे केवल वाटर वेपर (पानी की भाप) और गर्मी निकलती है. यही कारण है कि यह पारंपरिक फॉसिल फ्यूल-आधारित ट्रैक्शन सिस्टम का एक बेहद साफ़-सुथरा और टिकाऊ विकल्प बन जाता है.
हाइड्रोजन-आधारित रेल सिस्टम को दुनिया भर में टिकाऊ मोबिलिटी के लिए एक बेहतरीन समाधान के तौर पर तेज़ी से पहचाना जा रहा है. इस पहल के साथ, भारत जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका जैसे चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया है, जो साफ-सुथरे रेल ट्रांसपोर्टेशन के लिए हाइड्रोजन के इस्तेमाल पर काम कर रहे हैं. चूंकि यह टेक्नोलॉजी अभी शुरुआती दौर में है, इसलिए अभी दुनिया में बहुत कम देश ऐसे सिस्टम चला रहे हैं या उनका प्रायोगिक परीक्षण कर रहे हैं.
पायलट रूट एवं अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर
- पायलट सेक्शन: हरियाणा में जींद-सोनीपत सेक्शन को इन ऐतिहासिक ऑपरेशन्स के लिए पहले पायलट रूट के तौर पर चुना गया है.
- रीफ्यूलिंग सुविधा: इस विशेष ट्रेन-सेट के लिए जींद में ही पूर्णतः स्वदेशी हाइड्रोजन स्टोरेज और रीफ्यूलिंग सुविधा का निर्माण किया गया है.
- सुरक्षा लाइसेंस: पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गनाइज़ेशन (PESO) ने इस साइट पर कंप्रेस्ड हाइड्रोजन गैस के स्टोरेज और डिस्पेन्सिंग के लिए सभी ज़रूरी लाइसेंस जारी कर दिए हैं.
- बैकअप और टेक्निकल सपोर्ट: रीफ्यूलिंग ऑपरेशन्स के लिए हाइड्रोजन कम्प्रेशन सिस्टम लगाया गया है, साथ ही एक स्टैंडबाय कम्प्रेशर यूनिट और ज़रूरी स्पेयर पार्ट्स की व्यवस्था की गई है ताकि संचालन निर्बाध रहे.
- सुरक्षा सेंसर्स की निगरानी: हाइड्रोजन प्रोडक्शन, स्टोरेज और डिस्पेन्सिंग सुविधा में लगे हाइड्रोजन लीक डिटेक्टर और फ्लेम डिटेक्टर जैसे कई एडवांस सेफ्टी सेंसर्स की नियमित रूप से जांच और सफाई की जाएगी, ताकि धूल जमा न हो और सुरक्षित संचालन सुनिश्चित हो सके.
भारतीय रेलवे में हाइड्रोजन ट्रेन का व्यावहारिक इस्तेमाल
वर्तमान परिदृश्य में हाइड्रोजन ट्रेन के इस्तेमाल पर कई तरह की सीमाएं हैं – जैसे इसकी रेंज, हाइड्रोजन रीफिलिंग नेटवर्क और उच्च सुरक्षा मानक. भारतीय रेलवे ने नवंबर 2025 तक अपने ब्रॉड गेज नेटवर्क का लगभग 99.2% हिस्सा सफलतापुर्वक इलेक्ट्रिफाई कर लिया है, जो दुनिया के सबसे बड़े इलेक्ट्रिफाइड रेल प्रणालियों में से एक है. इसलिए, हाइड्रोजन ट्रेन का रणनीतिक इस्तेमाल मुख्य रूप से उन विशेष या हेरिटेज रूटों पर किया जाएगा, जहां भौगोलिक बाधाओं के कारण नेटवर्क का पारंपरिक ओवरहेड इलेक्ट्रिफिकेशन करना बेहद मुश्किल या नामुमकिन है.
हाइड्रोजन ट्रेन के फायदे और नुकसान
| फायदे | नुकसान और सीमाएं |
| ज़ीरो एमिशन: इनसे निकलने वाली मुख्य चीज़ें सिर्फ़ पानी की भाप और गर्मी हैं. ये ट्रेनें चलते समय ग्रीनहाउस गैसें या बारीक कण नहीं छोड़ती हैं. | कम एनर्जी एफिशिएंसी: बिजली को हाइड्रोजन में बदलने, उसे स्टोर करने और फिर से बिजली में बदलने की प्रक्रिया में सीधी इलेक्ट्रिक ट्रेनों की तुलना में काफी ज़्यादा ऊर्जा का नुकसान होता है. |
| ओवरहेड इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत नहीं: ये बिना-बिजली वाली लाइनों के लिए बहुत अच्छी हैं, क्योंकि इनमें ओवरहेड तारों को लगाने और उनके भारी रखरखाव खर्च से बचा जा सकता है. | उच्च शुरुआती लागत: पारंपरिक डीज़ल या इलेक्ट्रिक ट्रेनों की तुलना में हाइड्रोजन ट्रेनें और उनके लिए ज़रूरी रीफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना काफी ज़्यादा महंगा होता है. |
| तेज़ी से रीफ्यूलिंग: बैटरी से चलने वाली ट्रेनों को चार्ज होने में घंटों लग सकते हैं, लेकिन हाइड्रोजन ट्रेनों में डीज़ल इंजनों की तरह ही लगभग 15 से 20 मिनट में ईंधन भरा जा सकता है. | ईंधन का स्रोत: पर्यावरण को होने वाले वास्तविक फ़ायदे इस बात पर निर्भर करते हैं कि हाइड्रोजन कैसे बनी है। 'ग्रीन हाइड्रोजन' सबसे अच्छी है, लेकिन अभी ज्यादातर सप्लाई 'ग्रे हाइड्रोजन' की है. |
| कम शोर वाला संचालन: डीज़ल इंजनों की भारी आवाज़ की तुलना में ये ट्रेनें बहुत कम शोर और कंपन के साथ चलती हैं, जिससे यात्रा बेहद आरामदायक होती है. | सप्लाई, लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर: बहुत ज़्यादा प्रेशर वाली गैस को स्टोर करने के लिए खास इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए। बड़े डिस्ट्रिब्यूशन नेटवर्क के बिना ऑपरेटर सिर्फ उन्हीं रूट तक सीमित रहते हैं जहां स्टेशन बने हैं. |
'नमो ग्रीन रेल' परियोजना केवल एक नई ट्रेन सेवा की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह सतत विकास की दिशा में भारतीय रेलवे की तकनीकी आत्मनिर्भरता का एक जीवंत प्रमाण है. शुरुआती ढांचागत और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद, यह अगली पीढ़ी की ईंधन तकनीक भविष्य के स्वच्छ और प्रदूषण-मुक्त भारत के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगी.
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