- दिल्ली के होटल और मुजफ्फरपुर के एक अस्पताल में आग लगने से 26 लोगों की मौत हो गई
- NCRB के मुताबिक, 2024 में आग लगने की दुर्घटनाओं में हर दिन औसतन 16 लोगों की जान गई
- आग लगने और इसमें होने वालीं मौतों की बड़ी वजह नियमों का पालन नहीं करना है
कल दिल्ली का एक होटल था... आज बिहार के मुजफ्फरपुर का एक अस्पताल है... परसों शायद कोई दूसरी जगह होगी...!
3 जून को दिल्ली के 'फ्लरिश होटल' में आग लगी, जिसमें 21 जिंदगियां जलकर राख हो गईं. इस अग्निकांड में एक ही परिवार के 8 लोगों की भी मौत हो गई. अब 4 जून को मुजफ्फरपुर के एक निजी अस्पताल के ICU में आग लग गई, जिसमें 5 लोगों की जान चली गई.
ये सिर्फ दो दिन की दो बड़ी दुर्घटनाएं हैं. लेकिन देश में हर रोज ऐसी दर्जनों घटनाएं होती हैं और दर्जनों मौतें होती हैं. सरकारी आंकड़े खुद इसकी गवाही देते हैं.
NDTV ने जब केंद्र सरकार की एजेंसी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड 2024 की रिपोर्ट खंगाली तो पता चला कि आग लगने की दुर्घटनाओं में कमी जरूर आई है, लेकिन अब भी ऐसी दुर्घटनाओं में हर दिन औसतन 16 लोगों की जान जा रही है.
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क्या कहते हैं आंकड़े?
NDTV ने जब NCRB की रिपोर्ट देखी तो सामने आया कि 2023 की तुलना में 2024 में आग लगने की दुर्घटनाओं में 15% की कमी आई है. NCRB पर सबसे ताजा आंकड़े 2024 तक के हैं.
NCRB की रिपोर्ट बताती है कि 2024 में आग लगने की 5,971 दुर्घटनाएं हुई थीं. 2023 में 7,054 दुर्घटनाएं हुई थीं. दुर्घटनाएं कम हुई हैं तो इनमें होने वाली मौतों की संख्या में भी कमी आई है. 2023 में आग लगने से 6,891 लोगों की जान गई थी, जबकि 2024 में 5,888 लोगों की मौत हुई. सबसे ज्यादा 3,555 मौतें घरों या रिहायशी इमारतों में आग लगने से हुईं.
इन आंकड़ों को देखा जाए तो 2024 में आग लगने की दुर्घटनाओं में हर महीने औसतन 490 और हर दिन 16 लोगों की जान चली गई.

एक और आंकड़ा है जो डराने वाला है. हमने जब दुनियाभर में आग लगने की दुर्घटनाओं के आंकड़े रखने वालीं सेंटर ऑफ फायर स्टेटिस्टिक्स की 2025 की रिपोर्ट देखी तो पता चला कि भारत इस मामले में दूसरे नंबर है, जहां आग लगने से सबसे ज्यादा मौतें होती हैं.
इस रिपोर्ट में 2023 तक का डेटा था. यह रिपोर्ट बताती है कि 2023 में आग लगने से सबसे ज्यादा मौतें रूस में हुई थीं. रूस में उस साल आग लगने से 8,168 लोगों की जान चली गई थी. जबकि, भारत में उस साल 6,891 मौतें हुई थीं. रूस और भारत के बाद अमेरिका तीसरे नंबर पर था, जहां 3,070 लोग मारे गए थे.
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लेकिन सबक कुछ नहीं?
आंकड़े बताते हैं कि भारत में आग लगने की दुर्घटनाओं में काफी कमी आई है. लेकिन अब भी आग लगने से होने वाली मौतों में हम दूसरे नंबर पर हैं.
इसकी वजह क्या है? सबसे बड़ी वजह है- लापरवाही... जब कहीं आग लग जाती है और लोग मारे जाते हैं तो जांच में लापरवाही ही सामने आती है. अब अगर दिल्ली के होटल में लगी आग का ही उदाहरण देखा जाए तो यहां भी लापरवाही ही इतनी मौतों का कारण बनी. सबसे बड़ी लापरवाही तो यही थी कि होटल के पास फायर NOC ही नहीं थी. दूसरी बड़ी लापरवाही ये रही कि होटल को सिर्फ 6 कमरे बनाने की इजाजत थी लेकिन मालिकों ने 25 कमरे बना दिए थे.
दिल्ली के होटल में आग लगने के बाद अब ऐसे होटलों पर सख्ती हो रही है, जिनके पास फायर NOC नहीं है. लेकिन इस तरह की लापरवाहियां ज्यादातर मामलों में सामने आती है. फिर भी ऐसी दुर्घटनाओं से सबक नहीं लिया जाता. गृह मंत्रालय की रिपोर्ट भी यही बात कहती है.
2020 में गृह मंत्रालय से जुड़े नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट (NIDM) की 'FIRES IN INDIA: LEARNING LESSONS FOR URBAN SAFETY' रिपोर्ट आई थी. इस रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया था कि पुराने हादसों से कोई सबक न लेना और लापरवाहियां आग लगने और मौतों की सबसे बड़ी वजह है.

इस रिपोर्ट में कहा गया था कि नियमों का सही ढंग से पालन नहीं होता, सिविक अथॉरिटीज भी नियमों को पालन नहीं करवा पाती हैं, बिल्डिंग प्लानिंग से जुड़े नियम-कायदों को ताक पर रखा जाता है. रिपोर्ट में कहा गया था कि इमारतों में फायर सेफ्टी के लिए कोई सिस्टम होता नहीं है और अगर होता भी है तो बंद पड़े होते हैं. ऐसी इमारतों की समय पर जांच नहीं होती और गैर-कानूनी और अवैध निर्माण होते रहते हैं.
इसके अलावा, आग लगने की दुर्घटनाओं में मौतें या घायलों की संख्या बढ़ने का एक बड़ा कारण फायर ब्रिगेड का टाइम पर न पहुंच पाना है. NIDM की रिपोर्ट कहती है कि भीड़-भाड़ और ट्रैफिक के कारण फायर ब्रिगेड समय पर नहीं पहुंच पाती. इतना ही नहीं, शहरों में हर 10 वर्ग किलोमीटर के दायरे में एक फायर स्टेशन होना चाहिए लेकिन ऐसा भी नहीं है.
कुल मिलाकर, नियमों का ढंग से पालन न होना और घोर लापरवाहियां आग लगने के बाद ज्यादा मौतों की वजह बन जाती हैं.
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