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विपक्ष अगले सत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाएगा

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है. सबसे पहले लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा के 50 सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है.

विपक्ष अगले सत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाएगा
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाने के लिए विपक्ष महाभियोग ला सकता है.
  • ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की योजना बना रहा है जिसमें कांग्रेस की प्रमुख भूमिका है
  • अप्रैल में भी विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग नोटिस दिया था लेकिन लोकसभा में वह प्रस्ताव खारिज हुआ
  • महाभियोग प्रक्रिया में सौ लोकसभा सांसदों या पचास राज्यसभा सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है

चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर 'इंडियन एक्सप्रेस' की जो रिपोर्ट आई है, उस पर अब विवाद बढ़ता जा रहा है. विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हमलावर हो गया है. इसी बीच खबर है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए विपक्ष महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है. ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अप्रैल में भी विपक्ष ने महाभियोग का नोटिस दिया था. लोकसभा में ये प्रस्ताव खारिज हो गया था. जबकि राज्यसभा में अभी भी लंबित है.

लेकिन अब अखबार की रिपोर्ट आने के बाद ज्ञानेश कुमार एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर आ गए हैं. विपक्ष ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग कर रहा है. लेकिन उन्हें पद से हटाना आसान नहीं है. मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग के जरिए ही पद से हटा सकते हैं.

क्या है विपक्ष का प्लान?

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने का प्लान कांग्रेस का है. सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस की पहले पर इंडिया ब्लॉक के दलों में इस पर सहमति बन गई है और नोटिस तैयार किया जा रहा है. कांग्रेस से जुड़े सूत्रों ने बताया कि अगले हफ्ते महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया जा सकता है.  विपक्ष का कहना है कि नए नोटिस में हाल के घटनाक्रम और नए खुलासों को भी शामिल किया जाएगा.

गौरतलब है कि विपक्ष की ओर से 24 अप्रैल को राज्यसभा में भी इसी तरह का एक नोटिस दिया गया था, जो अभी लंबित है. उस नोटिस पर 73 सांसदों के हस्ताक्षर थे. हालांकि बाद में हस्ताक्षर करने वाले सात सांसद पाला बदल चुके हैं. ऐसे में विपक्ष अब नए सिरे से समर्थन जुटाकर संशोधित नोटिस लाने की तैयारी में है. जिसमें मंगलवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक कर विपक्ष के नेताओं के हस्ताक्षर के बाद महाभियोग का नोटिस दिया जाएगा. नोटिस देने के लिए सदन का सत्र चलना जरूरी नहीं है. नोटिस पर 50 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए होते हैं.अगले दो हफ़्ते के अंदर महाभियोग का नोटिस दे देगी कांग्रेस.

CEC को हटाने की प्रक्रिया क्या है?

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है. सबसे पहले लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा के 50 सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है. इसके बाद आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की जाती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक कानून विशेषज्ञ को शामिल किया जाता है.

समिति अपनी जांच रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को सौंपती है. यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संसद में प्रस्ताव पर मतदान कराया जाता है, जिसके लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत का समर्थन जरूरी होता है. संसद से मंजूरी मिलने के बाद प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है और अंतिम प्रक्रिया पूरी होने पर CEC को पद से हटाया जा सकता है.

विपक्ष को मिला बड़ा मुद्दा

विपक्ष को लगता है कि उसे एक तरह की संजीवनी मिल गई हो. यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश के राजनीतिक दल उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुटे हैं. इन राज्यों में करीब पांच महीने बाद चुनाव होने हैं. सबसे बड़ा विवाद यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दो चुनाव आयुक्तों के बीच एसआईआर को लेकर मतभेद बताए जा रहे हैं. यही वह मुद्दा है जिसे विपक्ष लंबे समय से उठाता रहा है.

चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से बढ़ा विवाद

चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की थी. इतना ही नहीं दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म-6 में बदलाव तथा मतदाता डेटा के प्रबंधन पर भी सवाल उठाए. कुछ फैसलों के बारे में तो यह भी कहा गया कि बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों को उनकी जानकारी तक नहीं थी.

दुबारा मतदान की मांग तेज

इन खुलासों के बाद कई राज्यों के नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में दोबारा मतदान कराने की मांग शुरू कर दी है. महाराष्ट्र के नेता उद्धव ठाकरे, बिहार के आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने राज्यों में हुए चुनाव को निरस्त कर दोबारा मतदान कराने की मांग उठाई है. उद्धव ठाकरे का कहना है कि चुनाव ईवीएम की बजाय बैलेट पेपर से कराए जाने चाहिए.

उद्धव ठाकरे ने कहा कि अब तक विपक्ष इस तरह की बातें करता रहा था, लेकिन अब ऐसी बातें खुद चुनाव आयुक्तों की ओर से सामने आ रही हैं. उनका कहना है कि चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा है, जो बेहद गंभीर मामला है. वहीं ममता बनर्जी ने कहा, “यह बहुत गंभीर मामला है. मुख्य चुनाव आयुक्त को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है. उन्हें पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है.”

एसआईआर पर विपक्ष के आरोप

ममता बनर्जी का मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रति गुस्सा इसलिए भी ज्यादा माना जा रहा है क्योंकि एसआईआर का सबसे अधिक असर पश्चिम बंगाल में देखने को मिला था, जहां बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने की बात कही गई. ममता बनर्जी का मानना है कि इसका असर चुनाव परिणामों पर पड़ा. वहीं आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी दिल्ली में दोबारा चुनाव कराने की मांग की है.

नियुक्ति प्रक्रिया पर कांग्रेस के सवाल

जहां तक कांग्रेस का सवाल है, वह मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया का ही विरोध करती रही है. कांग्रेस का कहना है कि नियुक्ति करने वाली समिति में सरकार का बहुमत रहता है. पार्टी की मांग है कि इस समिति में प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी शामिल किया जाए. कांग्रेस इस मुद्दे पर INDIA गठबंधन के दलों के संपर्क में है. साथ ही पार्टी ने अपनी रणनीति तय करने के लिए कार्यसमिति की बैठक भी बुलाई है.

यूपी चुनाव से जोड़ रही सपा

समाजवादी पार्टी ने इस विवाद को उत्तर प्रदेश के चुनाव से जोड़ दिया है. पार्टी का आरोप है कि एसआईआर के जरिए उसके समर्थक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए. अखिलेश यादव का कहना है कि उनकी पार्टी ने नाम हटाए जाने के विरोध में चुनाव आयोग के सामने सबूत भी पेश किए, लेकिन आयोग ने कोई सुनवाई नहीं की. अखिलेश यादव का कहना है कि मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में आगे कोई चुनाव नहीं होना चाहिए.

यह लगभग तय है कि विपक्ष चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्तों से जुड़े इस मुद्दे पर चुप बैठने वाला नहीं है. हालांकि एक सवाल ऐसा भी है जिसका जवाब विपक्ष को देना होगा. विपक्ष को स्पष्ट करना पड़ेगा कि यदि इन्हीं चुनाव आयुक्तों की निगरानी में केरल में कांग्रेस की सरकार बनी और तमिलनाडु में टीवीके को सफलता मिली, तो क्या उन राज्यों में भी दोबारा चुनाव कराए जाने चाहिए?
 

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