- पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कहा कि SIR प्रक्रिया शुरू होने के बाद से चुनाव आयोग विवादों में घिरा हुआ है
- लवासा ने फॉर्म-6 में किए गए संशोधनों को गैर-कानूनी बताया और इस पर सरकार की अनुमति न होने की बात कही
- अशोक लवासा ने बताया कि चुनाव आयोग में चार महीने से कोई बैठक नहीं हुई जिससे अंदर मतभेद और असहज माहौल बन गया है
चुनाव आयोग को लेकर 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट में जो दावा किया गया है, उसे लेकर बवाल जारी है. इसे लेकर विपक्ष भी हमलावर है. इस बीच पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने NDTV से बातचीत में कई गंभीर बातें कही हैं. उन्होंने कहा कि जब से SIR की प्रक्रिया शुरू हुई है, तब से ही चुनाव आयोग विवादों के घेरे में हैं.
अखबार की रिपोर्ट पर अशोक लवासा ने कहा कि जिस परिप्रेक्ष्य में ये रिपोर्ट आई है उसे समझना जरूरी है. जून 2025 से SIR शुरू होने के बाद से ही चुनाव आयोग विवादों में है.
दरअसल, बुधवार को अखबार ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR की कवायद के दौरान 10 महीने में 14 बार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सामने आपत्ति दर्ज कराई थी.
अशोक लवासा ने क्या-क्या कहा?
NDTV से बातचीत में अशोक लवासा ने कहा कि जिस तरह से SIR को लागू किया गया है, उससे बहुत सारे सवाल खड़े हुए हैं.
उन्होंने कहा कि चुनाव आयुक्तों की ओर से आपत्तियां उठाई गईं और उन पर चुनाव आयोग ने क्या फैसला लिया, इन बातों को भूलकर ये देखना चाहिए कि मुद्दे कौन-कौन से उठाए गए हैं.
उन्होंने कहा कि आयुक्तों ने फॉर्म-6 का मुद्दा उठाया और कहा कि फॉर्म-6 में जो तबदीलियां की गईं, वो कानूनी रूप से नहीं हुई. और दूसरा मुद्दा उठाया गया है कि ECI NET को एक्सेस करने में अड़चन आ रही थी. ये मुद्दे अपने आप में मायने रखते हैं और इन मुद्दों पर विचार करना जरूरी है.
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चुनाव आयुक्तों की आपत्ति कितनी बड़ी
चुनाव आयुक्तों का आपत्ति दर्ज कराना क्या इतिहास में पहली बार हुआ है? इस पर अशोक लवासा ने कहा कि ये बिल्कुल अभूतपूर्व है, क्योंकि चुनाव आयोग तीन आयुक्तों की संस्था है. ऐसी प्रथा रही है कि हर हफ्ते कम से कम दो बार मीटिंग होगी. मुझे नहीं पता कि ये प्रथा कायम है या नहीं लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि 4 महीने से कोई मीटिंग ही नहीं हुई थी.
उन्होंने कहा कि ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऐसी नौबत आ गई कि किसी चुनाव आयुक्त को चिट्ठी लिखकर अपनी राय जाहिर करनी पड़ी. मीटिंग होती तो मीटिंग के अंदर बात रखी जाती और उस पर फैसला होता, लेकिन चिट्ठी लिखने की जो नौबत आई है, उससे ऐसा लगता है कि अंदर ही अंदर मतभेद हैं और काम करने का माहौल सौहार्दपूर्ण नहीं है.
फॉर्म-6 में संशोधन पर क्या बोले?
चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म-6 में बदलाव का मुद्दा भी उठाया है. इस पर अशोक लवासा ने कहा कि अगर तीनों आयुक्त सहमत होते और फॉर्म-6 को संशोधित करने के लिए सरकार की इजाजत नहीं ली थी तो ये गैर-कानूनी है.
इस बारे में समझाते हुए उन्होंने कहा कि फॉर्म-6 इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन रूल्स से जुड़ा है. अगर आप फॉर्म-6 का फॉर्मेट और SIR में प्रयोग किया फॉर्म-6 का फॉर्मेट देखेंगे तो दोनों अलग-अलग है और आप खुद देख सकते हैं कि उसमें बदलाव हुआ है.
उन्होंने कहा कि अगर वो संसोधन चुनाव आयोग के तीनों आयुक्तों ने मिलकर सहमति से भी किया है और उसके लिए सरकार की सहमति नहीं है तो वो मेरे हिसाब से गैर-कानूनी होगा.
ECI NET को लेकर क्या कहा?
अखबार ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि ERO को ECI NET एक्सेस करने नहीं दिया जा रहा है. ये सेंट्रल IT सिस्टम है जो वोटर लिस्ट पर सीधा असर डालता है. इस पर अशोक लवासा ने कहा कि टेक्नोलॉजी कानून को सपोर्ट करने के लिए होती है, उसमें बाधा डालने के लिए नहीं. गोवा में ERO ने 8 बार ईमेल लिखी, ये बताता है कि सिस्टम में गड़बड़ी है.
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