दिल्ली हाईकोर्ट ने एक 81 साल की महिला की याचिका खारिज कर दी, जिसमें वह अपने पुराने वैवाहिक घर में दोबारा रहने की अनुमति चाहती थीं. कोर्ट ने साफ कहा कि घरेलू हिंसा कानून (DV Act) किसी महिला को यह अधिकार नहीं देता कि वह हर हाल में पुराने घर में वापस रहने की मांग करे- खासकर जब उसके पास अच्छा वैकल्पिक रहने का इंतजाम मौजूद हो.
कोर्ट ने क्या कहा?
महिला पहले खुद अपनी मर्जी से अपने पति की दूसरी प्रॉपर्टी में जाकर रहने लगी थीं. वह 'छतहीन' नहीं हैं, यानी उनके पास रहने की जगह उपलब्ध है. उनका घर छोड़ना किसी हिंसा या मजबूरी की वजह से साबित नहीं हुआ।
इसलिए पुराने घर में जबरन दोबारा एंट्री दिलाना सही नहीं होगा.
क्या था मामला?
दरअसल 81 वर्षीय महिला ने दावा किया था कि वह लगभग 60 वर्षों से ग्रीन पार्क स्थित अपने घर में रहती थी. स्वास्थ्य कारणों से अप्रैल 2023 में वह अपनी दूसरे घर (जहां बेटी रहती थी) चली गई थीं. जुलाई 2023 में जब वह वापस लौटना चाहती थीं, तो कथित रूप से उन्हें भीतर प्रवेश नहीं दिया गया. महिला ने DV Act की धारा 19 व 23 के तहत residence order की मांग की थी.
कोर्ट क्यों नहीं माना?
कोर्ट ने पाया कि महिला ने अपने पति द्वारा उपलब्ध करवाए गए दूसरे घर में स्वेच्छा से शिफ्ट किया था. उसके पास उसी स्तर का वैकल्पिक आवास मौजूद है, इसलिए वह 'छतहीन' (roofless) नहीं है. उसने अपने ही बयान में कहा था कि वह इलाज के लिए घर से बाहर गई थी. यानी कोई जबरदस्ती या हिंसा सिद्ध नहीं हुई.
जस्टिस दुडेजा ने कहा, 'धारा 19 के तहत राहत विवेकाधीन (discretionary) और समानुपातिक (equitable) है. यह अधिकार दूसरे निवासियों के अधिकारों के साथ संतुलन बनाकर दिया जाता है.'
कोर्ट ने माना कि याचिका में कानूनी आधार नहीं है. महिला का पुनः प्रवेश का दावा DV Act की मंशा के अनुरूप नहीं. इसलिए याचिका खारिज कर दी गई.
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