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कॉकरोच जनता पार्टी का भविष्य: आंदोलन से निकली पार्टियां असल में कितनी सफल हो पाती हैं?

आखिर आंदोलन से निकली पार्टियां वास्तव में कितना सफल हो पाती हैं. भारत और दुनिया के कई दूसरे मुल्कों में ऐसी पार्टियां सामने आई हैं जिनकी जड़ें किसी बड़े आंदोलन से जुड़ी रही हैं.

कॉकरोच जनता पार्टी का भविष्य: आंदोलन से निकली पार्टियां असल में कितनी सफल हो पाती हैं?
कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन
PTI

कॉकरोच जनता पार्टी ने जंतर मंतर पर कई दिनों के विरोध प्रदर्शन को समाप्त कर दिया है. बड़ी बात यह है कि जिस मांग के साथ इस प्रदर्शन को शुरू किया गया था, वो भी पूरी हो चुकी है. पेपर लीक के मुद्दे पर कॉकरोच जनता पार्टी ने अपना आंदोलन शुरू किया था, मांग थी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा. अब इस्तीफा हो चुका है, ऐसे में इसे एक सफल आंदोलन माना जा रहा है.

अभी के लिए कॉकरोच जनता पार्टी कोई राजनीतिक महत्वकांक्षा नहीं दिखा रही है, उसके चुनाव लड़ने को लेकर भी असमंजस की स्थिति है. कई कानूनी अड़चनें भी राह को मुश्किल बना रही हैं. इस बीच एक सवाल उठता है- आखिर आंदोलन से निकली पार्टियां वास्तव में कितना सफल हो पाती हैं. भारत और दुनिया के कई दूसरे मुल्कों में ऐसी पार्टियां सामने आई हैं जिनकी जड़ें किसी बड़े आंदोलन से जुड़ी रही हैं. जानने की कोशिश करते हैं कितनी ऐसी पार्टियां सफल रहीं और किन्हें झटका लगा-

आम आदमी पार्टी

6 अप्रैल 2011 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे अनशन पर बैठ गए थे. उनकी मांग थी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त जन लोकपाल कानून बनाया जाए. इस आंदोलन के साथ हजारों लोग जुड़े. कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए. बच्चे, नौजवान और बुजुर्ग, सभी ने अन्ना हजारे का साथ दिया. भ्रष्टाचार के खिलाफ यह देश की सबसे बड़ी लड़ाइयों में से एक बन गई.

इसी आंदोलन का एक बड़ा चेहरा अरविंद केजरीवाल भी थे. वह अन्ना हजारे के करीबी सहयोगियों में गिने जाते थे. आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार भी किया गया. लेकिन बाद में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के रास्ते अलग हो गए.

इसके बाद 2 अक्टूबर 2012 को अरविंद केजरीवाल ने नई राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान किया. उन्होंने अपनी पार्टी का नाम आम आदमी पार्टी (AAP) रखा. अन्ना हजारे इस फैसले के पक्ष में नहीं थे, लेकिन केजरीवाल का मानना था कि अगर भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए तो राजनीति में आए बिना बदलाव संभव नहीं है.

आम आदमी पार्टी एक आंदोलन से निकली थी. वह पहले से कोई स्थापित राजनीतिक दल नहीं थी. इसके बावजूद 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में उसने अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई. पार्टी ने 70 में से 28 सीटें जीत लीं.

हालांकि, किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला. ऐसे में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने. लेकिन महज 49 दिन बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया. उनका तर्क था कि बहुमत नहीं होने की वजह से उनकी सरकार जन लोकपाल विधेयक पास नहीं करा पा रही थी.

इसके बाद 2015 के विधानसभा चुनाव हुए. इस बार आम आदमी पार्टी ने जोरदार प्रचार किया.नतीजा यह हुआ कि आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की.

इसके बाद 2020 के विधानसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन शानदार रहा. पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सरकार बनाई.

हालांकि, पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी. आम आदमी पार्टी भी दिल्ली की सत्ता से बाहर हो गई.

जानकार आम आदमी पार्टी को आंदोलन से निकली पार्टी का सबसे बड़ा उदाहरण मानते हैं. उनका कहना है कि किसी आंदोलन से निकली पार्टी का करीब 15 साल तक दिल्ली की सत्ता में बने रहना अपने आप में एक सफल राजनीतिक प्रयोग है।

तेलंगना राष्ट्र समिति

पूर्व मुख्यमंत्री केसीआर ने तेलुगु देशम पार्टी से अलग होकर तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन किया था. उन्होंने अलग राज्य की मांग को लेकर लंबा आंदोलन चलाया था. उन्होंने 2009 में एक अलग राज्य की मांग के साथ आमरण अनशन शुरू कर दिया था. विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्होंने एक बड़ी रैली को भी संबोधित किया था. इसी वजह से जब केसीआर की गिरफ्तारी हुई थी, मानों पूरा तेलंगाना ही विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गया था. उस आंदोलन के दम पर ही बाद में उन्होने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और उनकी पार्टी पहली बार सत्ता में आई थी.

अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस

दक्षिण अफ्रीका में श्वेत-अश्वेत वाला भेदभाव काफी रहा है. इसी भेदभाव के खिलाफ कई साल पहले अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुई थी. साल 1912 में इस पार्टी ने बड़ी संख्या में लोगों को संगठित किया था और अफ्रीका ने में रंगभेद के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया था. बाद में 1948 में दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने Apartheid को आधिकारिक सरकारी नीति घोषित कर दिया था. इसका सीधा मतलब था कि श्वेत-अश्वेत के बीच और ज्यादा भेदभाव का बढ़ जाना.

उस समय अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस ने बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किए थे, पूरे देश में हड़तालें हुईं, बहिष्कार कार्यक्रम चलाए गए. इस आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा रहे नेल्सन मंडेला जिन्हें इसी विरोध प्रदर्शन की वजह से 27 साल तक जेल में भी रहना पड़ा. इसके बाद जब 1990 में मंडेला की रिहाई हुई, एक बार फिर विरोध प्रदर्शन हुए. 1994 आते-आते दक्षिण अफ्रीका में स्थिति बदल रही थी, सभी नस्लों के लोगों को वोटिंग का अधिकार मिला. उस चुनाव में नेल्सन मंडेला की पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की और अफ्रीका की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई. नेल्सन मंडेला पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने.

ब्राजील की वर्कर्स पार्टी

ब्राजील में एक ऐसा दौर था जब मजदूरों को कम वेतन मिलता था, उनके अधिकारों का हनन होता था और उन्हें आवाज उठाने तक की इजाजत नहीं हुआ करती थी. ये ब्राजील में 1980 का दौर था और तब वहां पर मिलिट्री का शासन था. उस मिलिट्री शासन के खिलाफ तब कई ट्रेड यूनियन एक साथ आ गई थीं, इसके अलावा कई शिक्षक और समाजिक कार्यकर्ता भी जमीन पर उतरे थे.

बाद में इन सभी ने मिलकर वर्कर्स पार्टी बना ली. इसके सबसे बड़े नेता लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा रहे जो 2003 में पहली बार ब्राजील के राष्ट्रपति बने. 

ऐसे में किसी बड़े आंदोलन से निकल कई पार्टियां सफल रही हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी उदाहरण हैं जहां विरोध प्रदर्शन हुए, उससे पार्टी बनी, लेकिन वो उतनी सफलता हासिल नहीं कर पाई जिसकी उम्मीद लगाई गई. इस लिस्ट में जर्मनी की पाइरेट पार्टी, अमेरिका की ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट और इटली की फाइव स्टार मूवमेंट शामिल है.

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