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कैसे राम मंदिर ट्रस्ट वाले चंपत राय का संघ परिवार में बढ़ा इतना कद, क्यों कहे जाते हैं अयोध्या के पटवारी

संघ के लोग कहते हैं कि राम मंदिर से जुड़े सभी कानूनी दस्तावेज चंपत राय के पास ही रहते थे। वह हर चीज देखा करते थे। विष्णु शर्मा ने कहा कि यदि अशोक सिंघल विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस का चेहरा थे तो वहीं चंपत राय मूक शिल्पकार थे।

कैसे राम मंदिर ट्रस्ट वाले चंपत राय का संघ परिवार में बढ़ा इतना कद, क्यों कहे जाते हैं अयोध्या के पटवारी
  • राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है और कई लोगों से पूछताछ हो चुकी है
  • संघ परिवार और भाजपा से जुड़े सदस्यों ने चंपत राय की निष्ठा पर किसी भी प्रकार का संदेह व्यक्त नहीं किया है
  • चंपत राय दशकों से राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय रहे और उन्होंने सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए आंदोलन को मजबूती दी है
अयोध्या/नई दिल्ली:

राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी किए जाने का मामला सुर्खियों में है. इस मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन हुआ है और अब तक टीम ने चंपत राय के करीबी टुन्नू यादव, ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा, गोपाल राव और खुद चंपत राय से पूछताछ की है. अब तक इस मामले में नृपेंद्र मिश्र समेत कई लोगों के बयान आ चुके हैं. इस मामले में गड़बड़ी की जांच की सभी ने मांग की है, लेकिन संघ परिवार या फिर भाजपा से जुड़े किसी भी सदस्य ने चंपत राय की भूमिका को सवालों से परे ही माना है. हर किसी ने यही कहा कि चंपत राय की व्यक्तिगत निष्ठा पर सवाल नहीं उठाए जा सकते हैं. यह जरूर संभव है कि उनके करीबी लोगों की निष्ठा डोल गई हो और उन्होंने इस तरह चोरी को अंजाम दिया.

आखिर चंपत राय के प्रति संघ परिवार के लोग क्यों इतना भरोसा रखते हैं और कैसे उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिली? यह सवाल किसी के भी मन में उठना स्वाभाविक है. इस संबंध में जब हमले RSS के एक वरिष्ठ प्रचारक से बात की तो उन्होंने कहा कि चंपत राय का संघ में इतना बड़ा कद होने की कई वजहें हैं. पहली बात यह कि एक प्रचारक के नाते वह परिवार से दूर हैं और संपत्ति बनाने की जैसी चीजें उनके जीवन का हिस्सा ही नहीं है. इसके अलावा दशकों से वह राम मंदिर आंदोलन के लिए डटे रहे हैं. सादगीपूर्ण जीवन और बिना किसी चर्चा या राजनीतिक अभिलाषा के वह नींव की पत्थर की तरह काम करते रहे हैं.

1991 में ही अवध के क्षेत्रीय मंत्री बन गए थे चंपत राय

अशोक सिंघल के करीबी रहे प्रचारक ने बताया कि चंपत राय 1991 में ही अवध प्रांत के क्षेत्रीय मंत्री बने थे। उन्हें यह अहम जिम्मेदारी मिली तो उन्होंने अवध और खासतौर पर अयोध्या के आसपास के लोगों को आंदोलन से जोड़ा था. कहा जाता है कि अयोध्या के स्थानीय लोगों में राम मंदिर के लिए चल रही मुकदमेबाजी से निराशा थी. लेकिन चंपत राय ने लोगों में भरोसा जताया कि हिंदू पक्ष की जीत भी हो सकती है. यही नहीं संघ के इतिहास के जानकार विष्णु शर्मा ने कहा कि चंपत राय ने सवर्ण समाज से इतर अन्य वर्गों तक भी राम मंदिर आंदोलन को पहुंचाया था. घर-घर से ईंट जुटाने वाले अभियान के वही सूत्रधार थे.

अशोक सिंघल से क्यों थी चंपत राय की इतनी करीबी

इसके अलावा राम मंदिर से जुड़े सभी कानूनी दस्तावेज उनके ही पास रहते थे. वह मुकदमे के बारे में हर चीज देखा करते थे. विष्णु शर्मा ने कहा कि यदि अशोक सिंघल विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस का चेहरा थे तो वहीं चंपत राय मूक शिल्पकार थे, जो आंदोलन को शक्ल दे रहे थे और खुद लो-प्रोफाइल रहते थे. यहां तक कि राम मंदिर ट्रस्ट की जिम्मेदारी मिलने से पहले उन्हें संघ के दायरे के बाहर के लोग कम ही जानते थे. यही कारण है कि चंपत राय पर सीधे तौर पर सवाल उठाने से लोग बच रहे हैं.

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डॉ. सूर्यप्रकाश
Deputy Editor
पत्रकारिता में डेढ़ दशक का अनुभव रखने वाले डॉ. सूर्यप्रकाश एनडीटीवी डिजिटल में डिप्टी एडिटर हैं. राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखते हैं तो वहीं भारतीय संस... और पढ़ें
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