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भारत की अंतरिक्ष यात्रा विश्वास, विकास और जनकल्याण का प्रतीक, कबतक बनेगा भारत का अंतरिक्ष स्टेशन

अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत ने पिछले 12 सालों में उल्लेखनीय प्रगति की है. आइए जानते हैं कि इन 12 सालों में इसरो ने क्या क्या कारनामा किया है.

भारत की अंतरिक्ष यात्रा विश्वास, विकास और जनकल्याण का प्रतीक, कबतक बनेगा भारत का अंतरिक्ष स्टेशन
नई दिल्ली:

अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की पिछले 12 साल की यात्रा 'विश्वास, विकास और जनकल्याण' की भावना का प्रतीक है. 'आत्मनिर्भर भारत', 'मेक इन इंडिया' और 'विकसित भारत 2047' की कल्‍पना से प्रेरित भारत दुनिया में अग्रणी अंतरिक्ष शक्ति के रूप में उभरा है. इस दौर की प्रमुख उपलब्धियों में चंद्रयान-3 का चन्‍द्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफलतापूर्वक उतरना, आदित्य-एल1 का सौर मिशन और गगनयान और राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की तैयारियां प्रमुख हैं. ये उपलब्धियां एक ऐसे आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर प्रस्तुत करती हैं, जो विकास, वैश्विक साझेदारी और समावेशी प्रगति के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग कर रहा है.

वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में भारत का उदय

पिछले 12 साल में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम राष्ट्रीय आत्मविश्वास, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक महत्वाकांक्षा का प्रतीक बनकर उभरा है. एक वैज्ञानिक प्रयास के रूप में शुरू हुई यात्रा, आज एक ऐसी रणनीतिक राष्ट्रीय संपदा में परिवर्तित हो चुकी है, जो विकास को गति देती है, राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करती है, नवाचार को बढ़ावा देती है और विश्व पटल पर भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाती है. यह यात्रा 'विश्वास के, निर्माण के और जनकल्याण के 12 साल' की भावना को साकार करती है. 

भारत की अंतरिक्ष क्षमता ने ऐतिहासिक अंतरिक्ष अभियानों, उन्नत प्रक्षेपण प्रणालियों और स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के माध्यम से देश की पहुंच पृथ्वी से कहीं आगे तक विस्तारित की है. इसके अलावा राष्ट्रीय क्षमता निर्माण के अंतर्गत अंतरिक्ष-आधारित ऐप्‍लीकेशनों का उपयोग कर सुशासन, संपर्क, आपदा प्रबंधन, कृषि, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और आर्थिक विकास को नई मजबूती प्रदान की गई है. वैश्विक साझेदारी और सहयोगात्मक नेतृत्व ने भारत को एक विश्वसनीय अंतरिक्ष भागीदार के रूप में स्थापित किया है. इससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग का दायरा बढ़ा है और अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण और जिम्मेदार उपयोग के प्रति भारत की भूमिका और अधिक सुदृढ़ हुई है.

अंतरिक्ष की ओर रवाना होता इसरो का एक प्रक्षेपण यान.

अंतरिक्ष की ओर रवाना होता इसरो का एक प्रक्षेपण यान.
Photo Credit: ISRO

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम

पिछले दशक में भारत ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम के दायरे का लगातार विस्तार किया है. इसकी शुरुआत अंतरिक्ष अन्वेषण पर केंद्रित प्रयासों से हुई थी. भारत की चांद की यात्रा वैज्ञानिक खोज और तकनीकी प्रगति के प्रति एक स्‍थायी प्रतिबद्धता को दर्शाती है. इसकी नींव 2008 में चंद्रयान-1 के साथ रखी गई थी. यह चन्‍द्रमा पर भारत का पहला मिशन था. इस मिशन ने चन्‍द्रमा की सतह पर जल अणुओं और हाइड्रॉक्सिल की उपस्थिति के साक्ष्य खोजे. वही 2019 में प्रक्षेपित चंद्रयान-2 ने भारत के चांद कार्यक्रम को और मजबूत किया. 100 किलोमीटर की ऊंचाई से इसने चन्‍द्रमा की सतह की एचडी फोटो लीं.इसने 30 सेंटीमीटर तक सूक्ष्म विवरणों को भी पकड़ा. चंद्रयान-1 और चंद्रयान-2 ने भारत को वैश्विक चन्‍द्र विज्ञान में एक गंभीर और महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में स्थापित किया. यह आधार 23 अगस्त 2023 को भारत के चंद्रयान-3 ने चन्‍द्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग की. इसके विक्रम लैंडर ने चन्‍द्रमा का वह इलाका छुआ, जहां पहले कोई भी अंतरिक्ष यान नहीं पहुंचा था. भारत की योजना 2027 में चंद्रयान-4 शुरू करने की है. इसका उद्देश्य चन्‍द्रमा पर उतरकर नमूने एकत्र करना और उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है. वहीं चंद्रयान-5 मिशन चन्‍द्रमा के दक्षिणी ध्रुव के नजदीक स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्रों में जल और अन्य वाष्पशील पदार्थों की खोज करेगा. इससे भारत चन्‍द्रमा अन्वेषण के अगले युग में और गहराई तक प्रवेश करेगा.

भारत का मंगल मिशन 

इसरो के मार्स ऑर्बिटर मिशन को 'मंगलयान' के नाम से जाना जाता है. 24 सितंबर 2014 को इस अंतरिक्ष यान ने सफलतापूर्वक मंगल की कक्षा में प्रवेश किया. इससे भारत अपने पहले ही प्रयास में मंगल तक पहुंचने वाला विश्व का पहला देश बन गया. इस उपलब्धि के साथ इसरो अमेरिका की नासा, रूस की रोसकॉसमॉस और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद मंगल की कक्षा में किसी अंतरिक्ष यान को स्थापित करने वाली दुनिया की चौथी अंतरिक्ष एजेंसी बन गई. छह महीने के मिशन के लिए तैयार 'मंगलयान' आठ साल से अधिक समय तक सक्रिय रहा. 

इसरो के मार्स ऑर्बिटर की ओर से ली गई मंगल ग्रह के सतह की एक तस्वीर.

इसरो के मार्स ऑर्बिटर की ओर से ली गई मंगल ग्रह के सतह की एक तस्वीर.
Photo Credit: ISRO

भारत की पहली सौर वेधशाला

आदित्य-एल1 भारत का पहला समर्पित सौर मिशन है. 2023 में प्रक्षेपित इस अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक सूर्य-पृथ्वी एल1 लैग्ररेंज प्‍वाइंट के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया गया. यह जगह पृथ्वी से करीब 15 लाख किलोमीटर दूर है. यह मिशन सूर्य के कोरोना, सौर वायु और अंतरिक्ष मौसम संबंधी घटनाओं का अध्ययन करता है, जो पृथ्वी के पर्यावरण और तकनीकी प्रणालियों को प्रभावित करते हैं. इससे मिले वैज्ञानिक आंकड़े सार्वजनिक किए जाते हैं. अब तक 27 टेराबाइट से अधिक सौर अवलोकन डेटा साझा किया जा चुका है.इससे यह मिशन अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जानकारी में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बन गया है.

भारत ने जनवरी 2025 में स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (स्‍पेडेक्‍स) के माध्यम से एक महत्वपूर्ण तकनीकी सफलता भी हासिल की. इस मिशन ने भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बाद अंतरिक्ष में स्वायत्त डॉकिंग और अनडॉकिंग का प्रदर्शन करने वाला विश्व का चौथा देश बना दिया. इसरो ने डॉक किए गए उपग्रहों के बीच ऊर्जा स्थानांतरण का प्रदर्शन भी किया. चन्‍द्रमा और मंगल पर अपनी उपलब्धियों के झंडे गाड़ने के बाद भारत ने अब शुक्र ग्रह के लिए अपने पहले मिशन की तैयारी कर रहा है. शुक्र ऑर्बिटर मिशन को मार्च 2028 में प्रक्षेपित करने का लक्ष्य रखा गया है. यह मिशन शुक्र ग्रह की भूगर्भीय संरचना, सतह की संरचना, वायुमंडल, आयनमंडल तथा पुनर्सतहीकरण प्रक्रियाओं का अध्ययन करेगा. 

इंसान को अंतरिक्ष में भेजेगा भारत 

इस मिशन का उद्देश्य तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को करीब 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिन तक भेजना और फिर उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है. इस कार्यक्रम में दो मानव रहित मिशन और एक मानवयुक्त मिशन शामिल हैं. यह कार्यक्रम 2025 में अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है. वहीं भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन भारत का प्रस्तावित अंतरिक्ष स्टेशन है. यह 'स्पेस विजन 2047' का एक प्रमुख स्तंभ है. बीएएस पृथ्वी की निम्न कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में स्थित एक पांच मॉड्यूल वाला अंतरिक्ष स्टेशन होगा. इसे दीर्घकालिक मानव अंतरिक्ष मिशनों और सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण में उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए तैयार किया गया है. सितंबर 2024 में मंत्रिमंडल ने इसके पहले मॉड्यूल बीएएस-01 के विकास और प्रक्षेपण को 2028 तक स्वीकृति दी. यह विस्तारित गगनयान कार्यक्रम का हिस्सा है. यह स्टेशन जीवन विज्ञान, चिकित्सा और उभरती प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान को सक्षम बनाएगा. यह पृथ्वी की कक्षा से परे भविष्य के मानव अन्वेषण मिशनों में भी सहयोग करेगा.

भारत की अंतरिक्ष में प्रगति स्पष्ट रूप से क्षमता बढ़ाने से नेतृत्व स्थापित करने की ओर एक बदलाव को दर्शाती है. देश न केवल वैज्ञानिक खोज की सीमाओं का विस्तार कर रहा है, बल्कि उन तकनीकों का भी विकास कर रहा है जो भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण को आकार देंगी. महत्वाकांक्षी मिशनों, उन्नत अनुसंधान कार्यक्रमों और एक मजबूत दीर्घकालिक रूपरेखा के साथ, भारत विश्व के प्रमुख अंतरिक्ष-यात्रा करने वाले देशों में अपनी स्थिति को मजबूत कर रहा है.

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