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तमिलनाडु चुनाव 2026: थलपति विजय की जीत के 6 बड़े फैक्टर्स क्या हैं? क्यों फेल हुए द्रविड़ दिग्गज

Tamil Nadu Election 2026 Results: 4 मई 2026 के नतीजे गवाह हैं कि तमिलनाडु की जनता अब केवल 'द्रविड़ विरासत' के नाम पर वोट देने को तैयार नहीं है. कलकत्ता की सड़कों पर जो संघर्ष कभी ममता बनर्जी ने किया था, वैसा ही जुझारूपन विजय ने अपनी 'अकेले लड़ने' की रणनीति में दिखाया. 2026 की यह जीत गवाह है कि जब साख और संवाद का सही मेल होता है, तो पर्दे का नायक हकीकत का 'किंगमेकर' या 'किंग' बन ही जाता है.

तमिलनाडु चुनाव 2026: थलपति विजय की जीत के 6 बड़े फैक्टर्स क्या हैं? क्यों फेल हुए द्रविड़ दिग्गज
  • 27 सितंबर 2025 को करूर में हुई भगदड़ में 41 लोगों की मौत के बाद विजय का राजनीतिक करियर खतरे में माना गया था
  • 4 मई 2026 को विजय तमिलनाडु में बड़ी जीत हासिल कर द्रविड़ राजनीति की पुरानी नींव को चुनौती दी
  • विजय ने भ्रष्टाचार, परिवारवाद और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाकर जनता का विश्वास हासिल किया
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Thalapathy Vijay Victory: वो तारीख थी- 27 सितंबर 2025. करूर का मैदान खचाखच भरा था. अपने चहेते सितारे 'थलपति' विजय की एक झलक पाने के लिए करीब 50 हजार से ज्यादा लोग उमड़ पड़े थे. अचानक एक अफरा-तफरी मची और देखते ही देखते वह रैली मातम में बदल गई. उस दिन मची भगदड़ में 41 लोगों की जान चली गई. राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गईं, बड़े-बड़े पंडितों ने दावा कर दिया कि "विजय का राजनीतिक करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया." लेकिन अगली तारीख आई- 4 मई 2026. ...एक्टर विजय तमिलनाडु में सबसे बड़े विजेता बन कर उभरे. उन्होंने जीत की ऐसी इबारत लिखी, जिसने दशकों पुराने द्रविड़ दुर्ग को ढहा दिया. जिस विजय को कभी उनके लुक्स के लिए नकारा गया, आज वो तमिलनाडु की कमान संभालने की स्थिति में हैं. इस रिपोर्ट में पढ़ते हैं आखिर इस सुपरहिट क्लाइमेक्स की इबारत कैसे लिखी गई ?

रिजेक्शन से 'जायंट किलर' बनने तक का सफर

विजय का सफर भी संघर्षों की एक लंबी दांस्ता रहा है. 1992 में जब 'नालय्या थीरपू' फिल्म से उन्होंने करियर शुरुआत की, तो उनके लुक्स का सोशल मीडिया पर मजाक उड़ाया गया था. लेकिन विजय ने हार मानने के बजाय खुद को एक 'मास हीरो' के रूप में गढ़ा. 'घिल्ली' और 'पोक्किरी' जैसी फिल्मों ने उन्हें 'थलपति' बनाया, तो 'सरकार' (2018) जैसी फिल्मों में मुफ्त की राजनीति पर उनके कड़े प्रहार ने सीधे सत्ता से टक्कर मोल ली. जब उन्होंने अपनी पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) का झंडा उठाया, तो विरोधियों ने उन्हें 'पार्ट टाइम राजनेता' कहा, लेकिन विजय ने जमीनी स्तर पर अपना ऐसा नेटवर्क तैयार किया कि द्रविड़ राजनीति के दिग्गज चारों खाने चित हो गए. 
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'द्रविड़ दुर्ग' दरकने की 6 बड़ी वजहें

1. परिवारवाद और भ्रष्टाचार पर प्रहार: डीएमके सरकार के खिलाफ बढ़ती 'एंटी-इंकंबेंसी' और परिवारवाद के आरोपों को विजय ने कुशलता से भुनाया. उन्होंने खुद को एक 'बाहरी' (Outsider) विकल्प के तौर पर पेश किया. स्टालिन सरकार के मंत्रियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने विजय के 'क्लीन पॉलिटिक्स' के नैरेटिव को और मजबूत कर दिया.

2. युवाओं का 'वोट-कन्वर्जन' : विजय की जीत में युवाओं ने 'ब्रांड एंबेसडर' की भूमिका निभाई. युवा मतदाताओं ने न केवल खुद विजय को वोट दिया, बल्कि अपने घर के बड़े-बुजुर्गों और दादा-दादी को भी राजी किया. युवाओं के इस तर्क ने कि "हमारे भविष्य के लिए एक बार इन्हें देख लीजिए", उन बुजुर्गों का भी मन बदल दिया जो दशकों से पारंपरिक पार्टियों के वफादार थे.

3. शिक्षा और 'फैक्ट-चेक' वाली राजनीति: विजय ने चुनावी रैलियों को सिर्फ नारों तक सीमित नहीं रखा. 10वीं और 12वीं के टॉपर्स को सम्मानित करने के उनके अभियान ने मध्यम वर्गीय परिवारों के दिल में जगह बनाई. उन्होंने राजनीति को 'पढ़े-लिखे युवाओं' का करियर बनाने का आह्वान किया, जिसने 'फर्स्ट टाइम वोटर्स' को भारी संख्या में उनकी ओर मोड़ा.

4. जातिगत राजनीति से ऊपर 'तमिल प्राइड': तमिलनाडु की राजनीति हमेशा जातिगत समीकरणों में उलझी रही है, लेकिन विजय ने पेरियार, अंबेडकर और कामराज की विरासत को एक साथ समेटकर एक नई पहचान गढ़ी. उन्होंने खुद को किसी एक जाति के बजाय 'तमिल हितों के रक्षक' के रूप में पेश किया, जिससे दलित और पिछड़ा वर्ग उनके पाले में आ गया.

5. महिला सुरक्षा और प्रशासनिक विफलता: तमिलनाडु में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों और ड्रग्स की समस्या पर विजय का रुख बेहद आक्रामक रहा. कल्लाकुरुची शराब कांड जैसी घटनाओं ने जनता में जो गुस्सा भरा था, उसे विजय ने वोट में तब्दील किया. महिलाओं ने विजय में एक 'भरोसेमंद भाई' की छवि देखी, जिससे डीएमके का पारंपरिक महिला वोट बैंक दरक गया.

6. सिनेमाई प्रभाव और स्पष्ट विजन: विजय ने राजनीति में आने से पहले अपनी फिल्मों के जरिए जो 'प्रो-पीपल' छवि बनाई थी, उसने जनता के मन में यह विश्वास पैदा किया कि वे उनकी समस्याओं को समझते हैं. उनकी सादगी और सीधा संवाद द्रविड़ राजनीति के पुराने ढर्रे पर भारी पड़ा.

चेन्नई सचिवालय के नए 'सुल्तान'

करूर हादसे के बाद विजय ने न तो मैदान छोड़ा और न ही राजनीति. उन्होंने पीड़ित परिवारों के बीच जाकर उनके आंसू पोंछे, घायलों की जिम्मेदारी उठाई और अपनी छवि को 'रील हीरो' से 'रियल लाइफ रक्षक' में बदल दिया. आज अप्रैल 2026 के नतीजे गवाह हैं कि करूर के उसी मलबे से विजय ने अपनी जीत की इबारत लिखी. सियासत का यह नया अध्याय बताता है कि तमिलनाडु की जनता अब केवल 'द्रविड़ विरासत' के नाम पर वोट देने को तैयार नहीं है. कलकत्ता की सड़कों पर जो संघर्ष कभी ममता बनर्जी ने किया था, वैसा ही 'स्ट्रीट फाइटर' वाला जज्बा विजय ने करूर की त्रासदी के बाद दिखाया. 2026 की यह जीत गवाह है कि जब संघर्ष की नींव पर साख की इमारत खड़ी होती है, तो पर्दे का नायक हकीकत का 'सुल्तान' बन ही जाता है.
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