- हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिवप्रताप शुक्ल ने विधानसभा में अपना बजट अभिभाषण केवल दो मिनट में समाप्त कर दिया.
- अभिभाषण के तीसरे से 16वें पैराग्राफ में राजस्व घाटा अनुदान पर चर्चा थी जिसे राज्यपाल ने पढ़ने से मना कर दिया.
- मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्यपाल के अभिभाषण को पूरा नहीं पढ़ने के फैसले को सामान्य बताया.
हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिवप्रताप शुक्ल ने सोमवार को राज्य विधानसभा में सिर्फ दो मिनट में ही अपना बजट अभिभाषण खत्म कर दिया. उन्होंने अभिभाषण के एक अंश को ‘‘संवैधानिक संस्था पर टिप्पणी'' करार दिया और इसे नहीं पढ़ा. विधानसभा के बजट सत्र की शुरुआत में राज्यपाल ने अपने अभिभाषण में कहा कि वह तैयार अभिभाषण के तीसरे से 16वें पैराग्राफ को नहीं पढ़ेंगे. इसके बाद उन्होंने अपना 50 पन्नों का पारंपरिक संबोधन महज कुछ ही मिनटों में खत्म कर दिया. हालांकि आमतौर पर बजट अभिभाषण में काफी समय लगता है. यह एक तरह से सरकार की नीतियों और उसकी प्राथमिकताओं को बताता है.
राज्यपाल ने सदन को बताया कि मुझे लगता है कि तीसरे से 16वें पैराग्राफ तक संवैधानिक संस्था पर टिप्पणियां हैं और मुझे नहीं लगता कि मुझे उन्हें पढ़ना चाहिए. उन्होंने कहा कि 17वें पैराग्राफ से आगे के भाषण में सरकार की उपलब्धियां शामिल हैं, जिन पर सदन में चर्चा होगी.
नहीं पढ़े गए अंश में आरडीजी की बात
इससे पहले, राज्यपाल ने सदन को सूचित किया कि यह सत्र वर्ष 2025-26 के लिए अनुदान संबंधी पूरक मांगों को पारित करने, वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट को पारित करने और महत्वपूर्ण विधायी कार्यों के लिए है.
भाषण के नहीं पढ़े गये अंश में राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) पर ध्यान केंद्रित किया गया था.
भाषण के मूल पाठ में लिखा है, ‘‘आरडीजी छोटे राज्यों विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश के लिए राजस्व घाटा अनुदान की भरपाई करने में अत्यंत सहायक सिद्ध हो रहा है. हालांकि 16वें वित्त आयोग ने आरडीजी को समाप्त करने की सिफारिश की है, जो संविधान के अनुच्छेद 275(1) के विरुद्ध है.''
तैयार मूल पाठ को पढ़ा हुआ मान लिया गया. उसमें कहा गया है कि वित्त आयोग ने उक्त अवधि के लिए विभिन्न राज्यों के राजस्व और व्यय के अनुमानों को अलग-अलग दर्शाने के बजाय संयुक्त रूप से प्रस्तुत किया है, जिसके कारण हिमाचल प्रदेश से संबंधित राज्य विशिष्ट वित्तीय आवश्यकताओं और राजस्व घाटे को स्पष्ट रूप से नहीं दर्शाया जा सका है.
मूल पाठ के अनुसार, ‘‘भारत का संघीय ढांचा राजकोषीय संतुलन और सहकारी संघवाद पर आधारित है, जहां हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे और पर्वतीय राज्यों को राजस्व घाटा अनुदान जैसे संवैधानिक हस्तांतरणों के माध्यम से संरक्षण प्राप्त है. दुर्गम भूभाग, सीमित राजस्व स्रोतों और उच्च प्रशासनिक लागतों से ग्रस्त हिमाचल प्रदेश अकेले अपने संसाधनों के माध्यम से आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं को बनाए नहीं रख सकता.''
इसमें यह तर्क दिया गया कि आरडीजी से इनकार करने से राजकोषीय स्वायत्तता कमजोर होती है, क्षेत्रीय असमानता बढ़ती है और छोटे राज्यों को वित्तीय संकट में धकेलकर तथा केंद्र सरकार से विवेकाधीन समर्थन पर अत्यधिक निर्भरता के कारण संघवाद की भावना कमजोर होती है.
15वें और 16वें वित्त आयोगों की सिफारिशों का उल्लेख
इसमें 15वें और 16वें वित्त आयोगों की सिफारिशों के बीच ‘‘स्पष्ट अंतर'' को रेखांकित किया गया, क्योंकि 15वें वित्त आयोग ने 6 वर्षों (2020-21 से 2025-26) के लिए लगभग 48,630 करोड़ रुपये के राजस्व घाटा अनुदान की सिफारिश की थी, जिसे 16वें वित्त आयोग ने ‘‘पूरी तरह से समाप्त'' कर दिया है.
मूल पाठ के अनुसार, शहरी स्थानीय निकायों के लिए अनुदान 855 करोड़ रुपये से घटाकर 435 करोड़ रुपये कर दिया गया है. इसके विपरीत, केंद्रीय करों, ग्रामीण स्थानीय निकायों को दिए जाने वाले अनुदान और अन्य विशेष अनुदानों में वृद्धि हुई है. इस प्रकार, यह घाटा लगभग 33,195 करोड़ रुपये आंका गया है, जो वास्तविक रूप से कहीं अधिक है.
इसमें राजस्व घाटा अनुदान को बंद करने को छोटे और पहाड़ी राज्यों के लिए ‘‘गंभीर चिंता'' का विषय बताया गया और इससे राज्य की अर्थव्यवस्था को ‘‘भारी नुकसान'' होने का उल्लेख किया गया है.
सीएम सुक्खू ने राज्यपाल के फैसले को बताया सामान्य
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्यपाल के पूरे पारंपरिक संबोधन को छोड़ने के फैसले को सामान्य बताया और कहा कि यह कोई अपवाद नहीं है, पहले भी राज्यपालों ने संबोधन छोड़ दिए हैं.
राज्य के वित्तीय हालात पर उन्होंने कहा कि यह सरकार का मामला नहीं है. आरडीजी हमारा अधिकार है. राज्य के अधिकारों को नुकसान न पहुंचाया जाए.
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