- CJP मुंबई में गांधी जयंती के दिन जेल भरो आंदोलन शुरू कर रही है और गांधी जी की तस्वीर को प्रतीक बनाया है
- CJP की मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दें, उन पर वोट चोरी कराने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं
- गांधी जी का आंदोलन अहिंसक था और साधन व साध्य दोनों को पवित्र मानने की उनकी सख्त नीति थी
डांडी मार्च की वो आइकॉनिक तस्वीर. गांधी जी के हाथ में लाठी और चाल में एक संकल्प, दृढ़ता. CJP कल से मुंबई में जेल भरो आंदोलन कर रही है और इस ऐलान के लिए जो पोस्टर उसने जारी किए हैं, उनमें से एक में गांधी जी की तस्वीर भी है. आंदोलन भी गांधी जयंती के दिन शुरू हो रहा है. माने जेन जी ने गांधी जी को प्रतीक बनाया है. लेकिन गांधी को प्रतीक बनाना आसान और गांधी की राह पर चलना बहुत मुश्किल है.
बहुत कठिन है डगर गांधी की
धरना, प्रदर्शन, अनशन, भूख हड़ताल... ये वो हथियार हैं जो इस देश के आंदोलनकारियों को गांधी जी ने विरासत में दिए हैं. अक्सर गांधी को बिना पूरा समझे-पढ़े आंदोलनकारी सड़कों पर आते हैं. लेकिन वैसे संकल्प न होने के कारण भटक जाते हैं. CJP का जंतर-मंतर पर हालिया प्रदर्शन इसका उदाहरण है. वहाँ जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल हुआ, वो गांधी का तरीका बिल्कुल भी नहीं है. जंतर-मंतर पर आंदोलन के दौरान कुछ ऐसी तस्वीरें भी आई थीं, जो गांधी जी का तरीका नहीं थीं. गांधी जी कहते थे कि साध्य के साथ-साथ साधन भी पवित्र होना चाहिए. अगर साधन पवित्र नहीं हुआ तो साध्य के करप्ट होने का डर रहता है.
गांधी जी अपने साधन को लेकर कितने संजीदा थे, इसका उदाहरण है 1920 में शुरू हुआ असहयोग आंदोलन. जाहिर है, गांधी जी का आंदोलन था तो रास्ता अहिंसक था. लेकिन 4 फरवरी 1922 को यूपी में चौरा-चौरी कांड हो गया. भीड़ ने वहाँ एक थाने में आग लगा दी, जिससे 22 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई. इस बात से गांधी जी इतने दुखी हुए कि उन्होंने 12 फरवरी को ये आंदोलन ही वापस ले लिया. इस आंदोलन में दो साल से हिस्सा ले रहे लोगों को इससे बड़ी उम्मीदें थीं. जब गांधी जी ने आंदोलन वापस लेने का फैसला किया तो बड़ी निराशा हुई, लेकिन गांधी जी टस से मस नहीं हुए.
इस फैसले के पीछे कहीं न कहीं एक नैतिक जिम्मेदारी भी थी. आप अगर किसी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं, तो उसके सही और गलत दोनों की जिम्मेदारी लेनी होगी. आंदोलनकारियों की एक टुकड़ी भी कुछ गलत करती है तो वो पूरे आंदोलन को दागदार करती है. लेकिन भीड़ कब क्या कर दे, ये पक्के तौर पर नेता तय नहीं कर पाता. वहीं, एक-एक आंदोलनकारी की जिम्मेदारी आ जाती है.
गांधी जी की राह चलेंगे जेन जी?
मुंबई में आंदोलन के लिए CJP को परमिशन नहीं मिली है, लिहाजा आंदोलन शुरू होने से पहले ही संघर्ष की नौबत आ सकती है. गांधी जी के अहिंसा वाले आंदोलन को कुछ लोगों ने कमजोर का तरीका कहा था, लेकिन गांधी ने कहा कि इस रास्ते पर चलने के लिए बहुत कलेजा चाहिए. आप पर कोई लाठियाँ बरसा रहा है और आप चुपचाप सह रहे हैं. वो कहते थे कि कोई एक गाल पर चाँटा मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर दो. ये कोई बहुत बहादुर व्यक्ति ही कर सकता है.
अहिंसक आंदोलन में जब हिंसा के पल आने लगते हैं तो दिक्कत ये होती है कि मूल मकसद गौण हो जाता है और सुर्खियों में वही हिंसा आ जाती है. बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में साधन के भ्रष्ट होने का हश्र हम देख ही रहे हैं. सवाल ये है कि भारत के जेन जी में क्या इतना सब्र और बहादुरी है? अगर उन्होंने गांधी को प्रतीक बनाया है, आंदोलन शुरू करने की तारीख गांधी जयंती को चुनी है, तो क्या वो अक्षरशः गांधी के रास्ते पर चलेंगे? दावा तो यही है, लेकिन देखिए आगे क्या होता है?
यह भी पढ़ें- चुनाव आयोग के खिलाफ CJP का प्रदर्शन कल से, अभिजीत दीपके ने रखीं 3 मांगें... CEC ज्ञानेश कुमार पर क्या कहा?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं