- वस्त्र मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर साल करीब 78 लाख टन टेक्सटाइल कचरा पैदा होता है.
- अच्छी बात यह है कि इसका बड़ा हिस्सा रीसाइक्लिंग और अपसाइक्लिंग के जरिए अर्थव्यवस्था में वापस लाया जा रहा है.
- फटे पुराने कपड़े जो पहले कूड़े में डाले जाते थे, आज रोजगार का नया जरिया बनते दिखाई दे रहे हैं.
भारत में हर साल लगभग 78 लाख टन कपड़े का कचरा निकलता है. लेकिन अब इसे समस्या नहीं, बल्कि रोजगार और नई अर्थव्यवस्था के अवसर के रूप में देखा जा रहा है. कुछ साल पहले तक जिन पुराने कपड़ों को भरपूर इस्तेमाल के बाद कूड़ेदान में डाल दिया जाता था, वही अब भारत में रोजगार का नया जरिया बनते दिखाई दे रहे हैं.
सरकार का मानना है कि आने वाले वर्षों में टेक्सटाइल वेस्ट की रीसाइक्लिंग यानी कपड़े के कचरे को दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाना केवल पर्यावरण के लिए ही मददगार साबित नहीं होगा, बल्कि इससे हजारों की संख्या में रोजगार भी पैदा होंगे. यही कारण है कि अब वेस्ट-टू-वेल्थ यानी कचरे से कमाई की सोच टेक्सटाइल इंडस्ट्री में तेजी से अपनी जगह बना रहा है.
हर साल निकलता लाखों टन कपड़े का कचरा
भारत दुनिया के सबसे बड़े टेक्सटाइल उत्पादकों में शामिल है. अब चूंकि इस उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा देश में ही इस्तेमाल किया जाता है तो कपड़े का कचरा भी उसी मात्रा में निकलता है.

सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर साल करीब 78 लाख टन टेक्सटाइल कचरा पैदा होता है. हालांकि, अच्छी बात यह है कि इसका बड़ा हिस्सा दोबारा इस्तेमाल, रीसाइक्लिंग और अपसाइक्लिंग के जरिए अर्थव्यवस्था में वापस लाया जा रहा है. कपड़ा उत्पादन प्रक्रिया में पर्यावरण की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए क्लोज्ड-लूप प्रोडक्शन व्यवस्था अपनाई जाती है.
फैक्ट्री स्तर पर बनने वाले 95 फीसद से अधिक कपड़े का कचरा रिकवरी हो जाती है और स्पिनिंग सेक्टर में लगभग पूरा कचरा फिर से उत्पादन में इस्तेमाल हो जाता है.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि सर्कुलर इकोनॉमी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह कचरे को भी संसाधन मानती है. यानी जिस कपड़े को पहले इस्तेमाल के बाद फेंक दिया जाता था, वही अब किसी नए कपड़े, बैग, औद्योगिक उत्पाद, घरेलू उपयोग की वस्तु या तकनीकी टेक्सटाइल का कच्चा माल बन सकता है. इस पूरी प्रक्रिया में केवल मशीनें ही काम नहीं करतीं. सबसे बड़ी भूमिका इंसानों की होती है.

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कपड़े के कचरा उद्योग में कितने तरह के रोजगार?
कपड़े इकट्ठा करने वाले. छंटाई करने वाले, यानी रंग और गुणवत्ता के हिसाब से उन कपड़ों को अलग करने वाले. रीसाइक्लिंग यूनिट्स में काम करने वाले. इिडाइनर, अपसाइक्लिंग करने वाले कारीगर, डाउनसाइक्लिंग करने वाले कारीगर, लॉजिस्टिक्स और परिवहन से जुड़े कर्मचारी. यानी एक पुराना कपड़ा कई लोगों के लिए रोजगार का जरिया बन जाता है.
1 लाख ग्रीन जॉब्स क्यों महत्वपूर्ण हैं?
केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय की रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक भारत का टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग बाजार 3.5 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. इसके साथ ही अगले पांच वर्षों में करीब 1 लाख ग्रीन जॉब्स पैदा होने की संभावना है. ग्रीन जॉब्स का मतलब सिर्फ पर्यावरण से जुड़ी नौकरियां नहीं होता. ये ऐसी नौकरियां हैं जो आर्थिक विकास के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा भी करती हैं. यानी 78 लाख टन कपड़ो के कचरे से देश में हजारों की संख्या में ग्रीन जॉब्स के बढ़ने की जबरदस्त संभावना है. और इस तरह यह टेक्स्टाइल रीसाइक्लिंग मॉडल बन रहा है रोजगार की खान. यह रोजगार भी बढ़ता है और साथ ही इसका पर्यावरण पर प्रतिकूल असर भी अपेक्षाकृत कम पड़ता है.
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लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी
सरकार के मुताबिक, टेक्सटाइल कचरे की रिकवरी, छंटाई, पुनर्वितरण और रीसाइक्लिंग से जुड़ा पूरा इकोसिस्टम पहले से ही करीब 40 से 45 लाख लोगों की आजीविका का सहारा बना हुआ है. इनमें बड़ी संख्या महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की है. कई महिलाएं कपड़े इकट्ठा करने, छांटने, मरम्मत करने और अपसाइक्लिंग का काम कर रही हैं.
टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि रोजगार केवल बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं रहता. इस पूरी वैल्यू चेन में नगर निगम, स्वयं सहायता समूह, छोटे उद्यम, कबाड़ी नेटवर्क, स्थानीय बाजार, डिजाइन स्टार्टअप और एमएसएमई भी जुड़ते हैं.
नवी मुंबई की टेक्सटाइल रिकवरी सुविधा, पानीपत का रीसाइक्लिंग क्लस्टर और दिल्ली के मंगोलपुरी का कतरन बाजार इस मॉडल की झलक दिखाते हैं, जहां कचरे से आजीविका का पूरा नेटवर्क तैयार हो चुका है.

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सरकार क्यों दे रही है इतना जोर?
सरकार का मानना है कि आने वाले समय में दुनिया ऐसे कपड़ों को ज्यादा महत्व देगी जो पर्यावरण के अनुकूल तरीके से बने हों. इसीलिए रीसाइक्लिंग, जिम्मेदार सोर्सिंग, इको-लेबलिंग, ट्रेसेबिलिटी और संसाधनों के दोबारा उपयोग पर लगातार जोर दिया जा रहा है. इससे भारतीय टेक्सटाइल उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी मजबूत हो सकती है.
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन भी अपनी वेस्ट-टू-वेल्थ पहल में इस पर जोर देता है कि यदि कचरा प्रबंधन को औपचारिक व्यवस्था, प्रशिक्षण और स्थानीय उद्यमों से जोड़ा जाए तो इससे बड़ी संख्या में सम्मानजनक और हरित रोजगार पैदा किए जा सकते हैं.
भारत के वस्त्र मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक टेक्सटाइल उद्योग पहले से ही 4.5 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है और कृषि के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है. अब यदि टेक्सटाइल वेस्ट मैनेजमेंट और रीसाइक्लिंग को बड़े पैमाने पर बढ़ावा मिलता है, तो यह रोजगार का एक नया अध्याय लिख सकता है.
यानी आने वाले समय में किसी युवा को नौकरी, किसी महिला को स्वरोजगार और किसी छोटे उद्यमी को नया कारोबार भी कपड़ा के कचरा प्रबंधन से मिल सकता है. यही वजह है कि आज टेक्सटाइल के कचरे को भारत की ग्रीन इकोनॉमी और रोजगार क्रांति के एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है.
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