- टाटा संस के आर्टिकल 121 के अनुसार बोर्ड के फैसलों के लिए टाटा ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स की बहुमत जरूरी
- 17 सितंबर की बैठक में नोएल टाटा ने एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का विरोध किया
- टाटा ट्रस्ट्स का तर्क है कि कास्टिंग वोट का इस्तेमाल केवल वोट बराबर होने पर हो सकता है, बहुमत का विकल्प नहीं
हाल ही में टाटा संस, टाटा ट्रस्ट्स और नोएल टाटा के बीच बोर्डरूम की लड़ाई के चरम पर पहुंचने के बाद से टाटा संस के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' यानी नियम-कानून, खासकर आर्टिकल 121, चर्चा का विषय बने हुए हैं. आर्टिकल 121 के तहत, बोर्ड के बहुमत से लिए गए कुछ फैसलों के लिए टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामित डायरेक्टर्स के बहुमत की मंजूरी भी जरूरी होती है. फिलहाल टाटा संस बोर्ड में टाटा ट्रस्ट्स के दो नॉमिनी हैं, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और वाइस चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन.
17 सितंबर की बोर्ड बैठक के दौरान वेणु श्रीनिवासन ने टाटा संस बोर्ड के तीन अन्य डायरेक्टर्स के साथ मिलकर टाटा ग्रुप के चेयरमैन के तौर पर एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का समर्थन किया, जबकि नोएल टाटा ने इसका विरोध किया. इसके बाद चेयरमैन के 'कास्टिंग वोट' यानी निर्णायक मत का इस्तेमाल किया गया.
क्या है टाटा ट्रस्ट्स का तर्क?
टाटा ट्रस्ट्स का तर्क है कि उसके नॉमिनी डायरेक्टर्स के बहुमत का मतलब नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन, दोनों के वोट से है. ट्रस्ट्स का यह भी कहना है कि चेयरमैन के कास्टिंग वोट का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब टाटा संस बोर्ड में वोट बराबर बंट जाएं और यह ट्रस्ट्स के नॉमिनी डायरेक्टर्स के बहुमत की आवश्यकता का विकल्प नहीं हो सकता. टाटा ट्रस्ट्स ने कहा, 'दो लोगों में बहुमत का मतलब दो होता है, एक नहीं' और नोएल टाटा के प्रस्ताव के खिलाफ मतदान का जिक्र किया.
17 सितंबर को पारित प्रस्ताव की कानूनी वैधता पर सवाल उठाने वाले नोएल टाटा के ईमेल के जवाब में टाटा संस ने कानूनी विशेषज्ञों की राय साझा की. इनमें भारत के पूर्व चीफ जस्टिस यू.यू. ललित और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी.एन. श्रीकृष्ण शामिल हैं. दोनों का मानना है कि चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर हुई वोटिंग के दौरान आर्टिकल 121 की शर्तों का पालन किया गया था.
जस्टिस बी.एन. श्रीकृष्ण, जिन्होंने 2002 से 2006 के बीच सुप्रीम कोर्ट में सेवा दी थी और उससे पहले केरल हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे थे, ने कहा, "मेरी राय में जो कुछ भी किया गया है, वह आर्टिकल 121 के शब्दों और भावना के पूरी तरह अनुरूप है। बोर्ड के समक्ष कार्यवाही का उद्देश्य किसी भी स्थिति में गतिरोध पैदा करना नहीं था। इसलिए इस आर्टिकल की ऐसी व्याख्या की जानी चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो कि बोर्ड की कार्यवाही और उसका कामकाज सुचारू रूप से आगे बढ़े और संतोषजनक तरीके से पूरा हो।"
उन्होंने आगे कहा, "मेरा मानना है कि हर डायरेक्टर की दो जिम्मेदारियां होती हैं। पहली, कंपनी अधिनियम के तहत कंपनी के प्रति उसकी फिड्यूशियरी ड्यूटी (भरोसे की कानूनी जिम्मेदारी), और दूसरी, उसे नामित करने वाली संस्था के प्रति जिम्मेदारी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि टकराव की स्थिति में पहली जिम्मेदारी को दूसरी पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि पहली जिम्मेदारी कानूनी है, जबकि दूसरी केवल अनुबंध आधारित है। ऐसे हालात में वेणु श्रीनिवासन ने अपनी कानूनी जिम्मेदारी के अनुरूप सही निर्णय लिया।"
1992-93 के मुंबई दंगों की जांच करने वाले आयोग की अध्यक्षता कर चुके जस्टिस श्रीकृष्ण की इस राय से पूर्व चीफ जस्टिस यू.यू. ललित ने भी सहमति जताई. भारत के 49वें चीफ जस्टिस रहे यू.यू.ने कहा, 'इस मामले में बोर्ड के जिन पांच सदस्यों ने प्रस्ताव पर मतदान किया, उनमें नोएल एन. टाटा को छोड़कर बाकी चार सदस्यों ने एन. चंद्रशेखरन को चेयरमैन बनाए जाने के पक्ष में वोट दिया. चूंकि आर्टिकल 104(B) के तहत नियुक्त डायरेक्टर्स के वोट बराबर थे, इसलिए पीठासीन या कार्यवाहक चेयरमैन ने अपना कास्टिंग वोट डालकर आर्टिकल 121 की आवश्यकता को पूरा किया.'
उन्होंने आगे कहा, 'आर्टिकल 104(B) के तहत नियुक्त डायरेक्टर्स के बीच वोट बराबर होने की स्थिति में चेयरमैन के लिए कास्टिंग वोट का इस्तेमाल करने का अवसर उपलब्ध था. इसलिए मेरी राय में, एजेंडा को मंजूरी देने वाला 17 सितंबर 2026 का प्रस्ताव विधिवत रूप से पारित किया गया था.'
'स्थिति में कोई बदलाव नहीं'
सीनियर एडवोकेट सुदीप्तो सरकार, जो जेएसडब्ल्यू स्टील लिमिटेड, त्रिवेणी इंजीनियरिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज लिमिटेड जैसी कई प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों के बोर्ड में रह चुके हैं, ने उन परिस्थितियों पर प्रकाश डाला जिनमें कास्टिंग वोट का इस्तेमाल किया जा सकता है.
उन्होंने कहा कि आर्टिकल 121 को सीधे तौर पर पढ़ने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि चेयरमैन का कास्टिंग वोट दो परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है.
(i) जब आर्टिकल 104(B) के तहत नियुक्त डायरेक्टर्स के वोट बराबर हों.
(ii) जब सभी डायरेक्टर्स के वोटों को ध्यान में रखने के बाद पूरे बोर्ड में मत बराबर बंट जाएं. इसलिए 'वोट बराबर होने की स्थिति' का अर्थ इन दोनों परिस्थितियों पर लागू माना जा सकता है.
सुदीप्तो सरकार ने आगे कहा, 'आर्टिकल 118 चेयरमैन (चंद्रशेखरन) की प्रस्तावित पुनर्नियुक्ति पर लागू नहीं होगा. आर्टिकल 118 विशेष रूप से 'नए चेयरमैन' के चयन से संबंधित है. चेयरमैन द्वारा यह घोषणा करना कि वे अगले कार्यकाल के लिए स्वयं को उपलब्ध नहीं कराएंगे, उनकी वर्तमान स्थिति में कोई बदलाव नहीं लाता. वे फरवरी 2027 में अपने मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति तक चेयरमैन पद पर बने रहेंगे.
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