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Explainer: हर साल कपड़े का 78 लाख टन कचरा तैयार होता है, पर पुराने कपड़ों से भारत कैसे बना रहा नई इकोनॉमी?

पुराने कपड़ों का क्या होता होगा? क्या वह सीधे कूड़े के ढेर में चले जाते हैं? भारत में अब इस सवाल का जवाब तेजी से बदल रहा है. आइए समझते हैं कि कैसे भारत अपने 78 लाख टन कपड़े के कचरे को मैनेज करता है, जिससे लाखों की संख्या में रोजगार भी पैदा हो रहा है.

Explainer: हर साल कपड़े का 78 लाख टन कचरा तैयार होता है, पर पुराने कपड़ों से भारत कैसे बना रहा नई इकोनॉमी?
  • वस्त्र मंत्रालय का कहना है कि भारत हर साल करीब 78 लाख टन टेक्सटाइल कचरे का प्रबंधन करता है.
  • 70 फीसद से ज्यादा कपड़ा कचरा दोबारा इस्तेमाल या रीसाइक्लिंग के जरिए वैल्यू चेन में लौट आता है.
  • इस पूरी व्यवस्था से लाखों जरूरतमंद लोगों की आजीविका जुड़ी है.

केंद्र सरकार के वस्त्र मंत्रालय के मुताबिक, देश हर साल करीब 7.8 मिलियन टन यानी लगभग 78 लाख टन टेक्सटाइल कचरे का प्रबंधन करता है. खास बात यह है कि इसका बड़ा हिस्सा सीधे लैंडफिल (कूड़े के ढेर) में नहीं जाता, बल्कि दोबारा किसी न किसी रूप में इस्तेमाल के लिए वापस अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन जाता है. यही वजह है कि अब टेक्सटाइल सेक्टर केवल कपड़े बनाने वाला उद्योग ही नहीं, बल्कि सर्कुलर इकोनॉमी का एक बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है.

आता कहां से है कपड़े का इतना कचरा?

टेक्सटाइल का कचरा केवल पुराने कपड़ों से ही नहीं बनता. इसका एक बड़ा हिस्सा फैक्ट्रियों से निकलने वाले कपड़े के टुकड़ों, बची हुई सामग्री और उत्पादन के दौरान बनने वाले स्क्रैप से आता है. इसके अलावा लोग जब पुराने कपड़े इस्तेमाल करना बंद कर देते हैं, तब वे भी इस कचरे का हिस्सा बन जाते हैं. सरकार के मुताबिक, देश में पैदा होने वाले टेक्सटाइल कचरे का 90 फीसद से ज्यादा हिस्सा इन्हीं दो स्रोतों से आता है.

70 फीसद से ज्यादा कचरे का दोबारा इस्तेमाल

सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत में बनने वाले कुल टेक्सटाइल कचरे का 70 फीसद से ज्यादा हिस्सा रिकवर कर लिया जाता है. यानी उसे फिर से उपयोग, अपसाइक्लिंग, डाउनसाइक्लिंग या रीसाइक्लिंग के जरिए दोबारा अर्थव्यवस्था में शामिल किया जाता है. इस तीनों ही तरह की साइक्लिंग का मतलब यह है कि कपड़े का एक बड़ा हिस्सा कूड़े में जाने के बजाय फिर किसी नए उत्पाद का रूप ले लेता है.

फैक्ट्रियों में लगभग पूरा कचरा वापस उत्पादन में

रिपोर्ट के मुताबिक, उत्पादन के दौरान बनने वाले कपड़े के कचरे का लगभग 95 फीसद हिस्सा पहले ही चरण में इकट्ठा कर लिया जाता है और दोबारा इस्तेमाल कर लिया जाता है. यानी फैक्ट्री से निकलने वाला बहुत कम कपड़ा वास्तव में बेकार जाता है. कताई यानी स्पिनिंग सेक्टर इसका एक बड़ा उदाहरण है. यहां उत्पादन के दौरान निकलने वाले लगभग सभी कपड़ा अवशेष फिर से उत्पादन प्रक्रिया में इस्तेमाल कर लिए जाते हैं.

पुराने कपड़ों का भी हो रहा है बेहतर इस्तेमाल

सिर्फ फैक्ट्री का कचरा ही नहीं, बल्कि लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जा चुके कपड़ों का भी बड़ा हिस्सा दोबारा उपयोग में लाया जा रहा है. सरकार के अनुसार, भारत के संग्रहण और छंटाई नेटवर्क की मदद से करीब 55 फीसद इस्तेमाल किए गए कपड़ों को लैंडफिल में जाने से बचा लिया जाता है. पहले इन कपड़ों का बड़ा हिस्सा कूड़े में चला जाता था, लेकिन अब इन्हें अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर दोबारा इस्तेमाल या रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जा रहा है.

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लाखों लोगों की आजीविका भी जुड़ी

सबसे अहम पहलू यह है कि कपड़े का दोबारा इस्तेमाल केवल पर्यावरण के लिए ही सहायक नहीं है बल्कि इससे रोजगार भी जुड़ा है.

आज दुनिया भर में ऐसे उत्पादों की मांग बढ़ रही है जो पर्यावरण पर कम असर डालती हैं. यही वजह है कि रीसाइक्लिंग, अपसाइक्लिंग आज कपड़ा कारोबार की नई जरूरत बन चुके हैं. भारत भी इसी दिशा में अपनी पारंपरिक संसाधन-संरक्षण की संस्कृति और आधुनिक रीसाइक्लिंग मॉडल को मजबूत करने की कोशिश में जुटा है.

सरकार के मुताबिक, टेक्सटाइल कचरे के संग्रहण, छंटाई, पुनर्वितरण और रीसाइक्लिंग से जुड़े पूरे इकोसिस्टम से करीब 40 से 45 लाख लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है. इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और समाज के वंचित और जरूरतमंद वर्ग शामिल हैं. ये कपड़ों को इकट्ठा करने, उनकी छंटाई करने और आगे भेजने के काम में जुटी हैं.

सरकार का मानना है कि टेक्सटाइल कचरे को बोझ नहीं बल्कि संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए. यदि कपड़े का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा दोबारा इस्तेमाल होता है, तो नए कच्चे माल की जरूरत कम होगी, ऊर्जा और पानी की बचत होगी और पर्यावरण पर दबाव भी घटेगा.

तो कभी कचरा समझे जाने वाले फटे पुराने कपड़े नई अर्थव्यवस्था, नए रोजगार और सतत विकास की मजबूत नींव बनते दिखाई दे रहे हैं. कुल मिलाकर भारत का टेक्सटाइल सेक्टर कचरे के सही प्रबंधन से उसे एक नई आर्थिक ताकत में बदलने का काम कर रहा है.

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