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सबरीमला से लेकर राम मंदिर तक, क्या वक्त आ गया है कि देश में मंदिरों के लिए एक समान नीति हो?

भारत में मंदिरों का प्रबंधन एक समान सरकार के हाथों में होना चाहिए या नहीं? इसके पक्ष में क्या तर्क हैं? तो विरोधियों को आपत्तियां क्या हैं? किस बड़े मंदिर में क्या हैं नियम? और संविधान क्या कहता है? पढ़ें ये विस्तृत रिपोर्ट...

सबरीमला से लेकर राम मंदिर तक, क्या वक्त आ गया है कि देश में मंदिरों के लिए एक समान नीति हो?
  • भारत में मंदिरों का प्रबंधन मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधीन है.
  • संविधान की 7वीं अनुसूची के मुताबिक धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन राज्य सूची का विषय माना जाता है.
  • समान कानून बनाना तो नहीं, पर वित्तीय पारदर्शिता, भीड़ मैनेजमेंट, सिक्युरिटी को लेकर एक मानक बनाए जा सकते हैं.

पिछले कुछ वर्षों में सबरीमला मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम, जगन्नाथ मंदिर और कई अन्य मंदिरों को लेकर उठे विवादों के बाद अब राम मंदिर में दान के पैसों की कथित हेराफेरी की जांच के दौरान लाखों रुपये की बरामदगी ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश में मंदिरों के लिए एक समान नीति होनी चाहिए? सवाल उन पर राज्यों के अधिकार, श्रद्धालुओं की आस्था और मंदिर प्रबंधन की पारदर्शिता का भी है.

दरअसल समय-समय पर किसी न किसी वजह से देश भर के मंदिरों के प्रबंधन को लेकर सवाल उठते रहे हैं. चाहे वो सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को लेकर हो, या हाल ही में अयोध्या के नवनिर्मित राम मंदिर के चढ़ावे और दान के पैसों में कथित हेराफेरी (चोरी) का मामला हो. राम मंदिर के मामले की सघन जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करनी पड़ी, जिसने बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ियों की आशंका जताते हुए ट्रस्ट के हर लेन-देन की बारीकी से जांच करने का फैसला किया है. 

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मंदिरों के कुप्रबंधन को लेकर उठने वाले सवालों की शुरुआत 2018 में सुप्रीम कोर्ट के सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटाने के फैसले से हुई. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना समानता के अधिकार के खिलाफ है. इसके बावजूद केरल में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. कई श्रद्धालुओं का कहना था कि यह मंदिर की परंपरा और धार्मिक मान्यता से जुड़ा मामला है, जबकि दूसरे पक्ष ने इसे महिलाओं के अधिकारों की जीत बताया. यह मामला आज भी संवेदनशील बना हुआ है और समीक्षा याचिकाएं लंबित हैं.

तो क्या देश भर की मंदिरों का प्रबंधन सरकार के पास होना चाहिए या नहीं?

सुब्रमण्यम स्वामी ने हाल ही में भारत में धार्मिक संस्थानों के कामकाज को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि, "इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि क्या सभी पूजा-स्थलों का संचालन एक जैसे ढांचे के तहत किया जाना चाहिए. उनका कहना है कि "धर्म की परवाह किए बगैर धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन और निगरानी के लिए एक समान नीति होनी चाहिए."

दरअसल, राम मंदिर के दान में चोरी की घटना से इस बात की चर्चा एक बार फिर शुरू हो गई है. यह जितना जटिल विषय है उतना ही बहुचर्चित भी और इस पर कोई एक राय नहीं है. जितने मजबूत तर्क इसके पक्ष में दिए जाते है उतने ही इसके विरोध में भी. 

मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के पक्ष में ये तर्क दिया जाता है कि इससे कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी. साथ ही सरकारी नियंत्रण या बोर्ड के गठन से मंदिर के चढ़ावे और संपत्तियों के दुरुपयोग, घोटाले, चोरी जैसी अनियमितता को रोकने में मदद मिलेगी. 

इतना ही नहीं, इससे सभी जातियों और वर्गों के श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति भी मिल सकेगी. वहीं सरकारी बोर्डों की उपस्थिति से बड़े मंदिरों के राजस्व का एक हिस्सा अस्पतालों, स्कूलों और अन्य लोक हितकारी कार्यों में उपयोग किया जा सकेगा.

वहीं जो लोग मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के खिलाफ हैं उनका सबसे बड़ा तर्क ये है कि संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत उन्हें अपने धार्मिक समूह के मामले के प्रबंधन की आजादी है. सरकारी दखल होने से यह अधिकार सीमित हो सकती है. उनका ये भी तर्क है कि भारत में अन्य धर्मों के पूजा स्थलों पर कोई सरकारी नियंत्रण नहीं है, तो देश भर के मंदिरों को लेकर किसी भी तरह के सरकारी बोर्ड का गठन करना यानी केवल एक धर्म तक इसे सीमित रखना भेदभावपूर्ण होगा.  

बता दें कि देश के कई बड़े मंदिरों जैसे- तिरुपति, सोमनाथ और वैष्णो देवी का प्रबंधन सरकारी बोर्ड के माध्यम से होता है. वहीं कई मंदिरों का प्रबंधन निजी ट्रस्ट या पुजारियों के जरिए होता है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के मंदिरों के सरकारी नियंत्रण से जुड़े कानूनी और संवैधानिक मुद्दों पर संज्ञान लेते हुए कई राज्य सरकारों से जवाब मांगे हैं.

देश के बड़े मंदिरों और राज्यों में नियम अलग-अलग हैं

सबरीमला मंदिर  का प्रबंधन त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) करता है. यह केरल सरकार के अधीन एक वैधानिक निकाय है, जो मंदिर के दैनिक संचालन, वित्तीय मामलों और सुविधाओं की देखरेख करता है.

जगन्नाथ मंदिरः श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) और एक प्रबंध समिति इसका प्रबंधन देखता है, जो ओडिशा सरकार के श्री जगन्नाथ मंदिर अधिनियम के तहत कार्य करती है.

पद्मनाभस्वामी मंदिरः त्रावणकोर के पूर्व शाही परिवार (शीत के रूप में) और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित प्रशासनिक समिति देखती है.

काशी विश्वनाथ मंदिरः श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास इसका प्रबंधन देखता है. इस न्यास समिति में वाराणसी के जिलाधिकारी, पुलिस आयुक्त समेत उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारी और प्रतिष्ठित विद्वान पदेन सदस्य के रूप में शामिल होते हैं. 

तिरुपति बालाजी मंदिर का प्रबंधन तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम करता है. यह आंध्र प्रदेश सरकार के नियंत्रण में एक स्वतंत्र ट्रस्ट (स्वायत्त निकाय) है, जो मंदिर के दैनिक संचालन, वित्त, और भक्तों की सुविधाओं का प्रबंधन करता है.

Tirupati Balaji Temple

तिरुपति बालाजी मंदिर
Photo Credit: AFP

दरअसल, भारत में मंदिरों का प्रबंधन मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधीन है. संविधान की 7वीं अनुसूची के मुताबिक धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन राज्य सूची का विषय माना जाता है.

उत्तर प्रदेश में मंदिरों का प्रबंधन आमतौर पर विशिष्ट ट्रस्ट, मंदिर बोर्ड, या पारंपरिक महंत द्वारा किया जाता है. राज्य सरकार सीधे तौर पर छोटे मंदिरों का प्रबंधन नहीं करती, लेकिन बड़े और ऐतिहासिक मंदिरों के लिए विशेष कानून या ट्रस्ट बनाकर प्रशासन और वित्तीय व्यवस्था की देखरेख करती है. जैसे- अयोध्या के राम मंदिर का प्रबंधन श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट करता है. तो वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रशासन और संचालन की देखरेख काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट बोर्ड करता है. वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर के लिए राज्य सरकार ने विशेष न्यास का गठन किया है जो मंदिर की संपत्ति और व्यवस्था संभालता है.

बिहार में मंदिरों का प्रबंधन बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद (BSBRT) (बिहार हिंदू धार्मिक न्यास अधिनियम, 1950) के तहत किया जाता है. 

तमिलनाडु में हजारों मंदिर हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के अधीन हैं.

केरल में देवस्वम बोर्ड कई प्रमुख मंदिर चलाते हैं.

कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में अलग व्यवस्थाएं हैं.

कई निजी और ट्रस्ट आधारित मंदिर पूरी तरह स्वतंत्र भी हैं.

Golden Temple

गुरुद्वारों का प्रबंधन मुख्य रूप से स्थानीय समितियां, राज्य स्तरीय निकाय और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति करती हैं
Photo Credit: PTI

क्या मंदिरों पर सरकार का नियंत्रण होना चाहिए?

यह बहस नई नहीं है. भारत में कई बड़े हिंदू मंदिर राज्य सरकारों के अधीन बने ट्रस्टों द्वारा संचालित होते हैं. जबकि चर्च और मस्जिदों के प्रबंधन की व्यवस्था अलग है.

कुछ हिंदू संगठनों का तर्क है कि सिर्फ हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण असमानता पैदा करता है. वहीं सरकारें कहती हैं कि बड़े मंदिरों में आने वाले धन और संपत्ति के पारदर्शी प्रबंधन के लिए यह व्यवस्था जरूरी है.

क्या संविधान इसकी अनुमति देता है?

भारतीय संविधान दो महत्वपूर्ण बातें साथ-साथ कहता है. अनुच्छेद 25 देश के सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता देता है. वहीं अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है.

यही वजह है कि कानून के जानकार भी मानते हैं कि पूरे देश में एक समान कानून बनाना आसान नहीं होगा, क्योंकि मंदिरों की परंपराएं और राज्य के कानून अलग-अलग हैं. पर यह भी माना जाता है कि  वित्तीय पारदर्शिता, भीड़ के प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था और श्रद्धालुओं को दी जाने वाली सुविधाएं को लेकर कुछ एक समान मानक बनाए जा सकते हैं.

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