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बस में फ्री सफर से लेकर बस से 70 हजार की कमाई तक: कांग्रेस महिलाओं पर मेहरबान या ये उसका बड़ा चुनावी दांव?

क्या चुनावों में महिलाओं का वोट प्रतिशत पुरुषों के बराबर या उनसे अधिक होने की वजह से राजनीतिक दल उन्हें साधने में जुटे हैं? क्या आने वाले वर्षों में राजनीतिक दलों का फोकस महिलाओं के कल्याण पर और बढ़ेगा?

बस में फ्री सफर से लेकर बस से 70 हजार की कमाई तक: कांग्रेस महिलाओं पर मेहरबान या ये उसका बड़ा चुनावी दांव?
तेलंगाना में सेल्फ हेल्प ग्रुप को 553 बसों और 70 हजार रुपये मासिक किराए की सौगात
X @TelanganaCMO
  • कांग्रेस अपनी पार्टी के शासन वाले राज्यों में महिला सशक्तिकरण पर फोकस कर रही है.
  • हाल के चुनावों में देखा गया है कि महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों के बराबर या उससे अधिक हो गया है.
  • कांग्रेस इसे महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक भागीदारी बढ़ाने की रणनीति के तौर पर पेश कर रही है.

केरल सरकार ने महिलाओं और ट्रांसजेंडर्स के लिए मुफ्त बस यात्रा की घोषणा की है, जबकि तेलंगाना में 553 बसें महिला स्वयं सहायता समूहों को देकर हर बस से करीब 70 हजार रुपये मासिक आय का मॉडल तैयार किया गया है. हाल के चुनावों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों के बराबर या उससे ज्यादा रहा है. यही वजह है कि कांग्रेस महिलाओं को साधने के लिए मुफ्त यात्रा, आर्थिक सहायता और रोजगार से जुड़ी योजनाओं पर बड़ा दांव लगा रही है.

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि कांग्रेस महिला सशक्तिकरण का संदेश देने के साथ-साथ अपने पारंपरिक महिला वोट बैंक को फिर से मजबूत करने और भविष्य के चुनावों में निर्णायक बढ़त हासिल करने की रणनीति पर काम कर रही है.

भारत की राजनीति में लंबे समय तक जाति, धर्म और क्षेत्रीय समीकरणों को सबसे निर्णायक माना जाता रहा. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में महिला मतदाताओं के रूप में एक नया वोट बैंक तेजी से उभरा है.

आज स्थिति यह है कि कई राज्यों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों के बराबर या उससे अधिक पहुंच चुका है. राजनीतिक दलों को यह समझ आ गया है कि महिलाओं को साधे बिना सत्ता का रास्ता आसान नहीं है. यही वजह है कि देशभर में लगभग हर बड़ा राजनीतिक दल महिलाओं के लिए अलग-अलग योजनाएं लेकर मैदान में उतर रहा है.

इसी कड़ी में कांग्रेस शासित राज्यों से दो बड़ी खबरें सामने आई हैं.

Photo Credit: X @KSRTC

केरल में महिलाओं के लिए मुफ्त बस सेवा

पहली खबर केरल से है, जहां कांग्रेस नीत सरकार ने महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की घोषणा की है. यह योजना 15 जून से शुरू होगी और शुरुआती चरण में इसे केरल की आम सरकारी बसों में लागू किया जाएगा. सरकार के अनुमान के मुताबिक इस योजना पर सालाना 700 से 800 करोड़ रुपये तक का खर्च आ सकता है. सरकार का कहना है कि राज्य परिवहन की आय बढ़ने और वित्तीय स्थिति बेहतर होने के बाद योजना का और विस्तार किया जा सकता है. 

यह योजना कांग्रेस नेता राहुल गांधी की चुनावी इंदिरा गारंटी का हिस्सा थी. विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, छात्राओं को आर्थिक सहायता, स्वास्थ्य बीमा और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का वादा किया था.

553 Bus for women self help group

तेलंगाना में महिला सेल्फ हेल्प ग्रुप को 553 बसों की सौगात
Photo Credit: X @TelanganaCMO

तेलंगाना में महिलाओं के सेल्फ हेल्प ग्रुप को 70 हजार महीना 

दूसरी खबर तेलंगाना से है. यहां मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने महिला स्वयं सहायता समूहों को 553 बसें सौंपने का फैसला किया है. खास बात ये है कि इन बसों को राज्य परिवहन निगम किराए पर लेगा और हर बस से जुड़े महिला समूह को प्रत्येक महीने इसकी कमाई से करीब 70 हजार रुपये देगा. सरकार अब तक एक हजार बसें महिला समूहों से किराये पर ले चुकी है और अगले दो वर्षों में इस संख्या को बढ़ाकर 3,000 करने की तैयारी है. 

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने महिला समूहों को 20.34 करोड़ रुपये का चेक भी सौंपा, जो 553 बसों के किराए के रूप में दिया गया. रेवंत रेड्डी ने कहा कि उनकी सरकार तब तक नहीं रुकेगी जब तक तेलंगाना की एक करोड़ महिलाओं को करोड़पति बनाने का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता.

सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ महिला सशक्तिकरण है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक गणित भी काम कर रहा है?

कांग्रेस
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कांग्रेस का महिलाओं पर इतना फोकस क्यों?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय चुनावों में महिलाओं की भूमिका पिछले एक दशक में पूरी तरह बदल चुकी है. एक समय था जब माना जाता था कि परिवार का पुरुष सदस्य जिस पार्टी को वोट देगा, महिलाएं भी उसी के साथ जाएंगी. लेकिन अब इस धारणा में बहुत तेजी से बदलाव आ रहा है.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के थिंक टैंक कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के दक्षिण एशिया कार्यक्रम से जुड़ी राजनीतिक विश्लेषक और शोधकर्ता रितिका कुमार ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर अपने शोध में बताया है कि भारत में महिला मतदान में लगातार इजाफा हो रहा है और बीते चुनावों में कई राज्यों में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया है, इससे राजनीतिक दलों की रणनीति में बड़ा बदलाव आया है.

अंतरराष्ट्रीय मीडिया और शोध संस्थानों की रिपोर्ट्स भी बताती हैं कि महिलाएं अब साइलेंट वोटर नहीं रहीं, बल्कि चुनावी नतीजे तय करने वाली सबसे महत्वपूर्ण घटक हो चुकी हैं.

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महिलाओं को लेकर कांग्रेस का ये नया मॉडल क्या है?

अगर कांग्रेस शासित राज्यों की योजनाओं को गौर से देखें तो एक पैटर्न दिखाई देता है. पहला मॉडल है- महिलाओं को प्रत्यक्ष राहत देने का.

केरल में कामकाजी महिलाओं की बड़ी संख्या है. ऐसे में बस का सफर मुफ्त किए जाने का सीधा असर उनके रोजमर्रा के खर्चे पर पड़ेगा. सरकार का तर्क है कि इससे महिलाओं की आवाजाही सुलभ और सुगम होगी. उनकी रोजगार और शिक्षा तक पहुंच आसान होगी और साथ ही इन सब पर बस में ट्रैवल का खर्चा शून्य होगा. यानी इससे घरेलू खर्च में बचत होगी. 

इस पैटर्न का दूसरा मॉडल महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन का है. तेलंगाना के मामले को देखें तो वहां स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को सीधे तौर पर लाभार्थी न बनाकर उन्हें इनकम करने वाली यूनिट बनाने का प्रयास किया गया है. बसों का मालिकाना हक कांग्रेस की इसी रणनीति का हिस्सा है.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस केवल मुफ्त सुविधाएं देने की राजनीति नहीं दिखाना चाहती, बल्कि यह संदेश भी देना चाहती है कि वह महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने पर जोर दे रही है.

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दक्षिण भारत में महिला वोट क्यों अहम है?

दक्षिण भारत में महिलाओं की शिक्षा दर अपेक्षाकृत अधिक है. स्वयं सहायता समूहों का नेटवर्क भी काफी मजबूत है. तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में महिला समूहों का चुनावी प्रभाव लगातार बढ़ा है.

यही वजह है कि महिलाओं को लेकर योजनाएं अब केवल सामाजिक कल्याण का विषय नहीं रह गई हैं, बल्कि वे चुनावी रणनीति का केंद्र बन चुकी हैं.

राजनीतिक दलों को यह भी समझ आ गया है कि महिला मतदाता अक्सर जातीय या वैचारिक निष्ठा से ज्यादा रोजमर्रा के जीवन से जुड़े मुद्दों पर मतदान करती हैं. महंगाई, गैस सिलेंडर, राशन, स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन और नकद सहायता जैसे मुद्दे उनके फैसले को प्रभावित करते हैं.

क्या यह सिर्फ कांग्रेस की रणनीति है?

बिलकुल नहीं. दरअसल महिलाओं को लेकर राजनीतिक दलों में प्रतिस्पर्धा पूरे देश में दिखाई दे रही है. हाल के वर्षों में विभिन्न राज्यों में महिलाओं के लिए नकद सहायता, मुफ्त बस यात्रा, गैस सब्सिडी और अन्य योजनाओं पर जोर बढ़ा है. 

राष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस तेज हुई है. हाल ही में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं. और जब चुनावी नतीजे आते हैं तब उसमें महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में अधिक देखी जा रही है. ऐसे में महिला मतदाता अब भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा स्विंग वोट बनती जा रही हैं.

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क्या महिलाओं पर राजनीतिक दलों का फोकस और बढ़ेगा?

चुनावी मामलों के जानकारों का मानना है कि महिलाओं को लेकर चल रही यह प्रतिस्पर्धा आने वाले वर्षों में और तेज होगी. 

अंतरराष्ट्रीय मामलों के थिंक टैंक कार्नेगी एंडोमेंट की रिसर्च बताती है कि महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी ने राजनीतिक दलों को मजबूर किया है कि वे अपने घोषणापत्र और चुनावी अभियान में महिलाओं को केंद्र में रखें.

ओआरएफ की हाल की एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि महिलाएं अब चुनावी नतीजे प्रभावित करने वाली सबसे अहम कारकों में शामिल हो चुकी हैं. हालांकि इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि महिलाएं प्रतिनिधित्व के मामले में बड़ा अंतर आज भी मौजूद है.

कुछ एक्सपर्ट यह भी कहते हैं कि केवल मुफ्त योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी. यदि महिलाओं की आय, रोजगार, सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी में वास्तविक सुधार नहीं होता तो ऐसे कार्यक्रमों का असर सीमित रह सकता है.

इन योजनाओं के आलोचक अक्सर दो सवाल उठाते हैं. पहला, क्या राज्यों की वित्तीय स्थिति ऐसे बड़े खर्च की अनुमति देती है? केरल में मुफ्त बस यात्रा योजना पर सालाना 712 करोड़ से 800 करोड़ रुपये तक का खर्च आने का अनुमान लगाया गया है. सरकार ने आश्वासन दिया है कि वह परिवहन निगम को इसकी भरपाई करेगी.

दूसरा, सवाल यह है कि क्या ऐसी दीर्घकालिक योजनाएं आर्थिक सुधारों का विकल्प बन सकती हैं? इस पर आलोचकों का कहना है कि सरकारें बेशक मुफ्त सुविधाएं दे रही हैं पर दीर्घकालिक आर्थिक लाभ के लिए उन्हें इसके समानांतर महिलाओं के लिए रोजगार सृजन और उनकी आय बढ़ाने वाली योजनाएं भी चलाने आवश्यकता है.

2029 और आगे की राजनीति का संकेत?

राजनीतिक जानकारों के अनुसार कांग्रेस की यह रणनीति केवल केरल और तेलंगाना तक सीमित नहीं है. महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा, नकद सहायता, स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक ताकत और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाएं आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में प्रमुख मुद्दे बन सकती हैं.

दिलचस्प बात यह है कि अब लगभग सभी बड़े दल महिलाओं को अपने चुनावी अभियान के केंद्र में रख रहे हैं. इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति में सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा जाति या धर्म नहीं, बल्कि महिला मतदाताओं का भरोसा जीतने को लेकर भी हो सकती है.

केरल की मुफ्त बस यात्रा योजना और तेलंगाना की 553 बसों वाली योजना देश में हो रहे उस बड़े राजनीतिक बदलाव की झलक हैं, जिसमें महिला मतदाता भारतीय लोकतंत्र की सबसे प्रभावशाली ताकत बनती जा रही हैं.

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Photo Credit: AFP

कांग्रेस ने महिलाओं के लिए क्या किया?

कांग्रेस पहले ही दावा करती है कि उसने महिलाओं को हिंदू कोड बिल 1955-56 के जरिए संपत्ति, तलाक और शादी में कानूनी अधिकार दिया है. दहेज प्रथा को अपराध घोषित किया है. कामकाजी महिलाओं को मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1961 के तहत मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) का अधिकार दिया जिसमें गर्भवती महिला को 26 हफ्ते (करीब 6 महीने) की छुट्टी मिलती है और उस दौरान उन्हें वेतन भी दिया जाता है. पुरुषों के बराबर महिलाओं को वेतन का अधिकार भी दिया गया. राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया. पंचायत में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया. घरेलू हिंसा से महिलाओं के बचाव के लिए कानून लाई. हिंदू बेटियों को पैतृक संपत्ति बराबरी का अधिकार दिया. कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए यौन उत्पीड़न कानून लेकर आई. 

अब कांग्रेस देश में महिला मतदाताओं को लेकर आ रहे ताजा बदलाव को जल्दी पहचानकर महिलाओं के कल्याण और आर्थिक सशक्तिकरण का मिलाजुला मॉडल पेश कर रही है. अब यह मॉडल चुनावी तौर पर कितना सफल होता है, इसका जवाब तो आने वाले चुनावों में ही मिलेगा. फिलहाल यह तो तय है कि भारत की राजनीति में महिला मतदाता को अब कोई भी पार्टी नजरअंदाज नहीं कर सकेगी.

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