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FGM महिलाओं की हेल्थ पर डालती है असर, इसकी तुलना खतना से नहीं कर सकते.. सबरीमाला केस में बोला सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित FGM प्रथा की वैधता पर सुनवाई कर रही है, जहां अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवीय गरिमा के अधीन है.

FGM महिलाओं की हेल्थ पर डालती है असर, इसकी तुलना खतना से नहीं कर सकते.. सबरीमाला केस में बोला सुप्रीम कोर्ट
  • सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला जननांग विकृति की प्रथा पर गंभीर सवाल उठाए हैं
  • अदालत अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता व महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता के बीच संतुलन तलाश रही है
  • कोर्ट ने धार्मिक प्रथा के नाम पर नाबालिगों की सहमति और सामाजिक दबावों पर भी विचार करने की जरूरत जताई है
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सबरीमाला से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी मान्यताओं और प्रथाओं को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ के सामने सबरीमाला संदर्भ की सुनवाई के दौरान दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित 'महिला जननांग विकृति' (FGM) की प्रथा पर तीखी बहस छिड़ गई है. अदालत इस समय एक कानूनी संतुलन साधने की कोशिश कर रही है. एक तरफ अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता है, तो दूसरी तरफ मानवीय गरिमा, स्वास्थ्य और महिलाओं की यौन स्वायत्तता. सुनवाई के दौरान कोर्ट में FGM प्रथा के मेडिकल तथ्यों को लेकर दलीलें दी गईं.

स्वास्थ्य और शारीरिक अखंडता पर प्रभाव

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की कि FGM को अनुच्छेद 25 के तहत केवल हेल्थ और पब्लिक हेल्थ के आधार पर ही प्रतिबंधित किया जा सकता है, क्योंकि यह मौलिक अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है. सीनियर वकील सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि यह प्रथा 7 वर्ष की छोटी बच्चियों पर की जाती है. उन्होंने बताया कि क्लिटोरिस के पास की त्वचा हटाने से लगभग 10,000 नर्व एंडिंग हमेशा के लिए नष्ट हो जाती हैं, जिसका प्रजनन, फिजिकल और मेंटल हेल्थ पर नकारात्मक असर पड़ता है. जस्टिस बागची ने जोड़ा कि यह प्रथा महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता में दखल देती है और इसका उद्देश्य उनकी यौनिकता को कंट्रोल करना है.

धार्मिक अधिकार बनाम मानवीय गरिमा

लूथरा ने तर्क दिया कि FGM को 'अनिवार्य धार्मिक प्रथा' के रूप में अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता. उन्होंने यह भी बताया कि दुनिया के 59 देशों ने पहले ही इस पर प्रतिबंध लगा दिया है. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह प्रथा अनुच्छेद 25 के तहत नैतिकता के आधार पर भी संदिग्ध है. कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि समुदाय के भीतर कार्य कर रही सामाजिक मजबूरियों और नाबालिगों की सहमति की कमी पर विचार करना आवश्यक है.

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खतना से तुलना पर कोर्ट का क्या रुख?

वकील निजाम पाशा ने समुदाय का पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि यह 'अंग-भंग' नहीं बल्कि प्रतीकात्मक खतना है, जिसे पश्चिम में 'हुडेक्टॉमी कहा जाता है. उन्होंने दावा किया कि इसका उद्देश्य महिलाओं के यौन सुख को बढ़ाना है. इस पर कोर्ट ने तीकी प्रतिक्रिया की. जस्टिस अमनुल्लाह ने पाशा के दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इसकी तुलना पुरुषों के खतना से करना पूरी तरह गलत है. उन्होंने कहा कि यह उससे तो बिल्कुल उल्टा है. अपने तथ्य ठीक कर लें.

हालांकि पाशा ने दावा किया कि इस प्रथा का पालन न करने पर समाज से बहिष्कृत करने जैसा कोई सांसारिक दंड नहीं मिलता, जस्टिस बागची ने साफ किया कि पब्लिक हेल्थ के नजरिए से पुरुषों के खतना और महिला जननांगों को नुकसान पहुंचाने (FGM) में बहुत बड़ा अंतर है.

इस मामले में अगली सुनवाई 18 मई को होगी. अगली सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि क्या कोई धार्मिक प्रथा किसी व्यक्ति के अन्य मौलिक अधिकारों और शारीरिक अखंडता का उल्लंघन कर सकती है.

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