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Supreme Court: सबरीमाला तो बस शुरुआत है! अब मस्जिद में महिलाओं की एंट्री, पारसी व बोहरा समुदाय में बहिष्कार पर कोर्ट में चल रही है बड़ी तैयारी!

Sabrimala Case Hearing: सबरीमाला पुनर्विचार याचिकाओं ने अब एक बहुत बड़े संवैधानिक विमर्श का रूप ले लिया है. यह मामला अब केवल एक मंदिर में प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई धर्मों की प्रथाओं को शामिल कर लिया गया है. कोर्ट सभी खर्मों की मान्यताओं को सामने रखते हुए इस बात की जांच कर रहा है कि क्या मौलिक अधिकार धार्मिक स्वायत्तता पर भारी पड़ते हैं.

Supreme Court: सबरीमाला तो बस शुरुआत है! अब मस्जिद में महिलाओं की एंट्री, पारसी व बोहरा समुदाय में बहिष्कार पर कोर्ट में चल रही है बड़ी तैयारी!

Supreme Court Hearing on Sabrimala: सबरीमाला मामले से जुड़ी 9 जजों की संवैधानिक पीठ वर्तमान में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और उसके विस्तार पर महत्वपूर्ण सुनवाई कर रही है. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद गंभीर सवाल उठाया है. क्या अंतरजातीय विवाह करने वाली पारसी महिलाओं को समुदाय से बाहर करना (Excommunication) वास्तव में एक धार्मिक मामला है, या यह केवल एक सामाजिक कुप्रथा है?

दरअसल, सबरीमाला पुनर्विचार याचिकाओं ने अब एक बहुत बड़े संवैधानिक विमर्श का रूप ले लिया है. यह मामला अब केवल एक मंदिर में प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई धर्मों की प्रथाओं को शामिल कर लिया गया है. कोर्ट सभी खर्मों की मान्यताओं को सामने रखते हुए इस बात की जांच कर रहा है कि क्या मौलिक अधिकार धार्मिक स्वायत्तता पर भारी पड़ते हैं. इस सुनवाई के दायरे में मुस्लिम महिलाओं का मस्जिदों में प्रवेश और दाऊदी बोहरा समुदाय व पारसी समुदाय में बहिष्कार की प्रथाओं को भी शामिल कर लिया गया है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में यह तय करेगा कि धर्म की आड़ में कौन सी प्रथाएं जारी रह सकती हैं और किन पर संवैधानिक हस्तक्षेप जरूरी है. लिहाजा, यह मामला भारत के न्यायशास्र में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होने वाला है, जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों और प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के बीच संतुलन खोजने की कोशिश कर रहा है.

पारसी महिला के मामले पर ये हुई बहस

मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के नेतृत्व वाली पीठ के समक्ष पारसी महिला का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डेरियस खंबाटा ने दलील दी कि पारसी धर्म मूल रूप से एक प्रगतिशील और दूरदर्शी धर्म है. उन्होंने अदालत को बताया कि महिलाओं को समुदाय से बाहर निकालने की यह प्रथा किसी धार्मिक ग्रंथ पर आधारित नहीं है, बल्कि यह 'मानव निर्मित' नियमों का परिणाम है. खंबाटा के अनुसार, ऐसे कोई भी धार्मिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं, जो इस दावे का समर्थन करते हो कि अंतरधार्मिक विवाह करने वाली महिला को उसकी धार्मिक पहचान से वंचित किया जाना चाहिए.

धार्मिक विश्वास की प्रामाणिकता की जांच करेगा कोर्ट

बहस के दौरान खंबाटा ने स्पष्ट किया कि यदि कोई विश्वास या प्रथा किसी समुदाय का अटूट हिस्सा है, तो अदालत उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य है. हालांकि, इसके लिए पुख्ता सबूत होने चाहिए. उन्होंने 'शिरूर मठ' और 'बिजोय इमैनुएल' जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अदालत को यह तय करना होता है कि क्या कोई विशेष प्रथा वास्तव में धर्म का अभिन्न अंग है या नहीं. उन्होंने भारत भर के विभिन्न पारसी ट्रस्टों के पत्रों और प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि कई जगहों पर महिलाओं को पूर्ण अधिकार दिए जाते हैं, जो यह साबित करता है कि यह कोई सार्वभौमिक धार्मिक नियम नहीं है.

लिंग आधारित भेदभाव और न्यायपालिका का रुख

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने एक तीखा सवाल किया, "क्या महिला का धर्म के बाहर शादी करना वास्तव में धर्म का मामला है?" इसके जवाब में खंबाटा ने स्पष्ट रूप से 'ना' कहा. उन्होंने हाईकोर्ट के पिछले निष्कर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि पारसी धर्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी महिला को अंतरधार्मिक विवाह के बाद बहिष्कृत करता हो. उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बिंदु उठाया "कमरे में मौजूद हाथी" (Elephant in the room) की ओर इशारा करते हुए उन्होंने पूछा कि यदि पुरुषों के अंतरधार्मिक विवाह को स्वीकार किया जाता है, तो महिलाओं के साथ अलग व्यवहार क्यों?

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जस्टिस नागरत्ना ने सुझाव दिया कि यदि यह धर्म का मामला नहीं है, तो इसके खिलाफ सिविल सूट (दीवानी मुकदमा) दायर किया जाना चाहिए. वहीं, सीजेआई सूर्यकांत ने भी इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से इस मामले में किसी विशेष 'सद्भाव अभ्यास' (harmonisation exercise) की आवश्यकता के प्रति आश्वस्त नहीं हैं.

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