- संबित पात्रा ने चुनाव आयोग के बीच हुई चर्चा को तानाशाही नहीं बल्कि स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया बताया है
- पात्रा के अनुसार चुनाव आयोग के तीनों आयुक्तों ने SIR प्रक्रिया पर सर्वसम्मति से निर्णय लिया था
- उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह चुनाव आयोग और सरकार पर तानाशाही का झूठा आरोप लगा रहा है
SIR प्रक्रिया को लेकर सामने आई रिपोर्ट और विपक्ष के आरोपों पर बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि चुनाव आयुक्तों के बीच हुई आधिकारिक चर्चा और पत्राचार को तानाशाही नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए.
संबित पात्रा ने कहा कि विपक्ष पहले आरोप लगाता था कि चुनाव आयोग के सभी सदस्य बिना चर्चा के एक ही फैसले पर मुहर लगा देते हैं और सरकार के इशारे पर काम करते हैं. लेकिन अब जब यह सामने आया है कि चुनाव आयुक्तों के बीच कई दौर की आधिकारिक बातचीत और पत्राचार हुआ, तब भी विपक्ष सवाल उठा रहा है.
'यह स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी'
उन्होंने कहा, 'अगर तीनों चुनाव आयुक्त आपस में बातचीत नहीं करते, विचार-विमर्श नहीं करते और हर बात पर सहमत हो जाते, तो विपक्ष इसे तानाशाही कहता. अब मीडिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि आयुक्तों के बीच कई बार पत्र-व्यवहार और आधिकारिक चर्चा हुई. यह एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है.'
बीजेपी सांसद ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी चुनाव आयोग के आंतरिक दस्तावेज नहीं पढ़ती, बल्कि मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर ही जानकारी सामने आई है. उनके मुताबिक, चुनाव आयोग के दस्तावेज में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सभी लोकतांत्रिक विचार-विमर्श के बाद SIR प्रक्रिया पर सर्वसम्मति बनी थी. पात्रा ने कहा, "अंतिम निष्कर्ष यह है कि तीनों चुनाव आयुक्त एकमत थे. उनके बीच कोई असहमति या मतभेद नहीं था. सभी ने मिलकर निर्णय लिया."
विपक्ष पर साधा निशाना
उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्ष इस दावे के जाल में फंस गया है कि चुनाव आयोग और केंद्र सरकार तानाशाही तरीके से काम कर रहे हैं. जबकि वास्तविकता यह है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में लोकतांत्रिक तरीके से कार्य कर रहा है.
संबित पात्रा ने कहा कि भारत की संवैधानिक संस्थाएं लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत काम कर रही हैं और देश के लोकतंत्र को मजबूत बनाए हुए हैं. उनके अनुसार, विचार-विमर्श, पत्राचार और सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहचान हैं.
संबित पात्रा ने कहा कि 2014 से लेकर 2024 तक चुनावी प्रक्रिया सुचारू रूप से चली है और चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष का रवैया दोहरा है. संबित पात्रा ने कहा कि अगर चुनाव आयुक्तों के बीच चर्चा और असहमति सामने आती है, तो यह लोकतंत्र की निशानी है, न कि किसी संकट का संकेत. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के इतिहास में चुनाव आयोग को लेकर कहीं अधिक विवादास्पद उदाहरण मिलते हैं.
नवीन चावला का उदाहरण दिया
पात्रा ने पूर्व चुनाव आयुक्त नवीन चावला का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस के दौर में चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठे थे. उन्होंने दावा किया कि 2005 में नवीन चावला की नियुक्ति को लेकर भी विवाद हुआ था और बाद में उनके कार्यकाल के दौरान कांग्रेस को फायदा पहुंचने के आरोप लगे थे. उन्होंने कहा कि उस समय भी चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की खबरें सामने आई थीं, लेकिन उन पर उतनी चर्चा नहीं हुई जितनी आज हो रही है.
'आज नियुक्ति प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी'
बीजेपी सांसद ने कहा कि आज की स्थिति पहले से अलग है. उनके मुताबिक, आजादी से लेकर 2023 तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में प्रधानमंत्री की प्रमुख भूमिका होती थी, लेकिन अब एक चयन समिति बनाई गई है, जिसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता भी शामिल होते हैं. उन्होंने कहा कि इससे नियुक्ति प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सहभागी बनी है.
'असहमति लोकतंत्र का हिस्सा'
संबित पात्रा ने कहा कि अगर चुनाव आयोग के भीतर चर्चा, बहस या पत्राचार हुआ है तो इसे लोकतंत्र की मजबूती के रूप में देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा, 'लोकतंत्र के लिए इससे बेहतर समय नहीं हो सकता। यदि किसी मुद्दे पर चर्चा होती है, अलग-अलग विचार सामने आते हैं और अंत में सहमति बनती है, तो यही लोकतांत्रिक प्रक्रिया है.'
SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट का हवाला
पात्रा ने कहा कि SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मामला गया था और अदालत ने 27 मई 2026 के अपने फैसले में इसकी वैधता को बरकरार रखा. उन्होंने कहा कि यदि किसी को चुनाव आयोग, EVM या किसी अन्य संस्था पर भरोसा नहीं है तो कम से कम जनता के फैसले पर भरोसा होना चाहिए.
'जनता ही अंतिम निर्णायक'
बीजेपी सांसद ने कहा कि लोकतंत्र में जीत और हार का फैसला जनता करती है. उन्होंने कहा, 'जनता ही वोट देती है, जनता ही सरकार बनाती है और जनता ही सरकार बदलती है। इसलिए हम इस पूरी बहस को आखिरकार जनता की अदालत पर छोड़ते हैं.' SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच बीजेपी का कहना है कि आयोग के भीतर हुई चर्चा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, जबकि विपक्ष इसे संस्थागत पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया से जुड़ा गंभीर मुद्दा बता रहा है.
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