- मिडिल ईस्ट में युद्ध के कारण भारत का कच्चे तेल और LPG आयात खर्च पिछले 80 दिनों में 60 प्रतिशत से अधिक बढ़ा
- रिपोर्ट के अनुसार कच्चे तेल की कीमतें फरवरी से मई 2026 के बीच प्रति बैरल 69 से 110 रुपये तक पहुंच गई हैं
- भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत और LPG का 60 प्रतिशत से अधिक आयात करता है
मध्यपूर्व एशिया में पिछले करीब 80 दिनों से जारी युद्ध की वजह से भारत का तेल और गैस आयात पर खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है. पिछले शुक्रवार को पेट्रोल और डीजल की रिटेल कीमतों में करीब तीन रुपये की बढ़ोत्तरी के बाद भी तेल कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. सोमवार को पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा, "तेल कंपनियों के लिए किसी बेलआउट पैकेज पर अभी विचार नहीं हुआ है. उनकी under-recoveries और नुकसान ज़्यादा हैं. अभी सरकारी तेल कंपनियों को हर दिन होने वाला नुकसान करीब 750 करोड़ के आसपास है. इसमें पेट्रोल, डीजल और LPG का आयात खर्च शामिल है."
60.45% बढ़ गई कच्चे तेल की कीमतें
मध्यपूर्व एशिया में जारी संकट और तनाव की वजह से कच्चा तेल महंगा होता जा रहा है. पेट्रोलियम मंत्रालय की Petroleum Planning and Analysis Cell (PPAC) की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक मध्यपूर्व एशिया में युद्ध शुरू होने से फरवरी, 2026 में कच्चे तेल (भारतीय बास्केट) की कीमत 69.01/बैरल थी, जो 80 दिनों से जारी युद्ध और टकराव की वजह से 15 मई, 2026 को बढ़कर 110.73/बैरल तक पहुंच गयी. यानी, मध्यपूर्व युद्ध एशिया में युद्ध की वजह से कच्चा तेल फरवरी, 2026 की औसत कीमत के मुकाबले 15 मई, 2026 तक 41.72 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गयी, कुल 60.45% की बढ़ोतरी!
भारत अपनी ज़रुरत का 85% से ज़्यादा कच्चा तेल और करीब 60% LPG अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से आयात करता है. इसमें से करीब 40% कच्चा तेल और 90% LPG स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ के ज़रिये भारत पहुंचता था, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच टकराव की वजह से स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ के ज़रिये कार्गो जहाज़ों की आवाजाही बुरी तरह से बाधित हो रही है, और कच्चे तेल के आयात पर भारत का कुल खर्च करीब 60% से ज़्यादा बढ़ चुका है.
राज्य सरकारें नहीं दे रहीं राहत
सरकारी तेल कंपनियों पर तेल आयात के बढ़ते बोझ को कम करने के लिए भारत सरकार ने 27 मार्च, 2026 को पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये प्रति लीटर घटाने का फैसला किया था. केंद्र सरकार ने आसमान छूती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के इस दौर में तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे को कम करने के लिए Taxation Revenues छोड़ने का फैसला किया था, लेकिन ये महत्वपूर्ण है कि संकट के इस दौर में राज्यों ने VAT/Sales Tax में कोई कमी नहीं की है. राज्य सरकारों को पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले VAT/Sales Tax से हर साल लाखों करोड़ रुपये की कमाई होती है. इसीलिए, संकट के इस दौर में भी राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल पर VAT/Sales Tax घटाने के लिए तैयार नहीं हैं.
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