- राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सदर बाजार में पिछले 64 साल से 'फ्लैग अंकल' का परिवार तिरंगा बना रहा है.
- तिरंगा बनाने का काम अब्दुल गफ्फार नाम के शख्स ने शुरू किया था.
- आज परिवार की तीसरी पीढ़ी तिरंगा बनाती है. वे 15 अगस्त के मौके पर चौबीसों घंटे काम करते हैं.
साल 1962 में चीन के साथ जंग से लेकर 1975 की इमरजेंसी, वाजपेयी की 13 दिन की सरकार, अन्ना हजारे का आंदोलन, Gen Z के विरोध-प्रदर्शन और अब 'हर घर तिरंगा' अभियान तक... तिरंगा हमेशा जीत, ताकत और गर्व का प्रतीक रहा है. और हिंदुस्तान के सियासी सफर में हर आंदोलन, हर विरोध और हर बदलाव के बीच, एक चीज जो हमेशा एक जैसी रही, वह है सदर बाजार में अब्दुल गफ्फार का परिवार, जो साल 1962 से तिरंगा बना रहा है. जैसे-जैसे 'हर घर तिरंगा' कैंपेन के तहत देश भर के घरों में राष्ट्रीय ध्वज पहुंच रहा है, इस परिवार की तीसरी पीढ़ी यह पक्का कर रही है कि दशकों पहले शुरू हुई यह विरासत हर भारतीय घर तक पहुंचती रहे.

यह कहानी है अब्दुल गफ्फार की, जिन्हें लोग भारत के 'फ्लैग अंकल' के नाम से जानते हैं. यह कहानी उस विरासत की भी है, जो अब तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें 'फ्लैग अंकल' का नाम दिया था और इस पहचान ने उन्हें बहुत प्रेरित किया. हालांकि, 81 साल की उम्र में 2025 में गफ्फार का इंतकाल हो गया और तब से उनका परिवार उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहा है.

परिवार का कहना है कि जब से प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने 'हर घर तिरंगा' की अपील की है, तब से मांग अचानक बढ़ गई है और उन्हें इस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बनने पर बहुत गर्व है. उनके झंडे न केवल सिर्फ भारत में खरीदे जाते हैं, बल्कि कनाडा, यूएई, अमेरिका, न्यूजीलैंड और अन्य देशों सहित दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी पहुंचते हैं.

अब्दुल रहमान से कहानी की शुरुआत...
यह कहानी अब्दुल रहमान से शुरू होती है, जिन्होंने 1962 में तिरंगा बनाना शुरू किया था. उस वक्त जब खादी का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता था, वे बंगाल से कपड़ा मंगवाते थे. आजादी की लड़ाई लड़ने वाले लोग तिरंगा और खादी का कपड़ा खरीदने के लिए उनकी दुकान पर आते थे. बाद में उनके बेटे अब्दुल गफ्फार ने इस काम को आगे बढ़ाया.
कई साल तक, परिवार ने भारत के इतिहास के अलग-अलग दौर में झंडे बनाने का काम जारी रखा. गफ्फार का 2025 में 81 साल की उम्र में निधन हो गया. आज, उनके बेटे अब्दुल मलिक और परिवार की तीसरी पीढ़ी उसी विरासत को आगे बढ़ा रही है.
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वे आगे बताते हैं कि अभी तिरंगा बनाने के काम में करीब 300 लोग लगे हुए हैं. 'हर घर तिरंगा अभियान' को लेकर लोगों में ऐसी भावना उन्होंने पहले कभी नहीं देखी. मांग इतनी ज्यादा है कि ऑर्डर पूरे करने के लिए हम चौबीसों घंटे (24x7) काम कर रहे हैं.
परिवार का कहना है कि सरकारी सप्लाई के लिए करीब 25-30 लाख झंडे तैयार किए गए हैं, जबकि स्थानीय बाजार के लिए 4-5 लाख और झंडे बनाए जा रहे हैं. यहां छोटे झंडों से लेकर बड़े राष्ट्रीय झंडों तक, हर साइज के झंडे सिले जा रहे हैं.
सदर बाजार तिरंगे वाले बैज, रिस्टबैंड, डैशबोर्ड पर लगने वाले झंडे और आजादी के दिन से जुड़ी दूसरी चीजों से भरा हुआ है. तो, 1962 से 2026 तक, पीढ़ियां बदली हैं, भारत बदला है और तिरंगा बनाने का तरीका भी बदला है. लेकिन एक चीज वैसी ही रही है, वो है तिरंगा.
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