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दिल्ली में प्रॉपर्टी मालिकों पर सीलिंग का खतरा! 300 बड़े प्रोजेक्ट्स की जांच में 70% में IFC भुगतान नहीं मिला

दिल्ली में 300 बड़े प्रोजेक्ट्स की जांच में सामने आया है कि करीब 70% मामलों में इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चार्ज (IFC) जमा नहीं किया गया. बकाया भुगतान नहीं करने पर प्रॉपर्टी मालिकों को नोटिस और सीलिंग कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है.

दिल्ली में प्रॉपर्टी मालिकों पर सीलिंग का खतरा! 300 बड़े प्रोजेक्ट्स की जांच में 70% में IFC भुगतान नहीं मिला
दिल्ली में प्रॉपर्टी मालिकों की बढ़ सकती हैं मुश्किलें! 300 प्रोजेक्ट्स जांच के घेरे में, बकाया IFC नहीं चुकाया तो हो सकती है सीलिंग
फाइल फोटो
दिल्ली:

Delhi IFC Charges: दिल्ली में सैकड़ों प्रॉपर्टी मालिकों को नोटिस मिल सकता है और बकाया रकम नहीं चुकाने पर उनकी इमारतें सील भी हो सकती हैं. सरकार की शुरुआती जांच में सामने आया है कि 300 बड़े प्रोजेक्ट्स में से करीब 70 फीसदी को कथित तौर पर अनिवार्य इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चार्ज (Infrastructure Development Charge) यानी IFC जमा किए बिना ही बिल्डिंग प्लान की मंजूरी मिल गई.दिल्ली जल बोर्ड के मंत्री प्रवेश वर्मा ने बताया कि जांच के पहले चरण में 3,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल वाली संपत्तियों को शामिल किया गया है. इनमें आवासीय, कमर्शियल और ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट्स शामिल हैं. प्रवेश वर्मा ने कहा, “अब तक करीब 300 ऐसी संपत्तियों की पहचान हुई है. शुरुआती जांच में पाया गया कि इनमें से करीब 70 फीसदी ने IFC जमा किए बिना अपने बिल्डिंग प्लान मंजूर करा लिए.”

DJB के लेटर पर कैसे मिल गई MCD की मंजूरी?

जांच में आरोप सामने आया है कि कई आवेदकों ने दिल्ली जल बोर्ड से जारी पत्रों का इस्तेमाल कर नगर निगम से बिल्डिंग प्लान और लेआउट की मंजूरी हासिल कर ली. नियमों के मुताबिक, आवेदक के पास IFC जमा करने की पुष्टि करने वाली वैध नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट यानी NOC होनी चाहिए थी. आरोप है कि इसकी जगह DJB के लेटरहेड पर जारी पत्रों के आधार पर ही MCD से मंजूरी ले ली गई. मंत्री प्रवेश वर्मा के मुताबिक, दिल्ली जल बोर्ड के रिकॉर्ड में कई संपत्तियों के सामने भुगतान की रकम “जीरो” थी. इसके बावजूद उनके बिल्डिंग प्लान और लेआउट मंजूर हो गए.

MCD

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Photo Credit: Wikimedia Commons

इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चार्ज क्यों लिया जाता है?

इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चार्ज दिल्ली जल बोर्ड नए निर्माण और प्रॉपर्टी के पुनर्विकास पर लगाता है. इस रकम का इस्तेमाल दिल्ली में पानी की सप्लाई और सीवर नेटवर्क को विकसित करने के लिए किया जाता है. आवासीय, कमर्शियल और ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के लिए IFC जमा करना अनिवार्य है.

रिटायरमेंट के करीब थे इंजीनियर, MCD स्टाफ पर भी शक

प्रवेश वर्मा ने कहा कि सरकार को पूरे मामले में दिल्ली जल बोर्ड के कुछ इंजीनियरों और MCD कर्मचारियों की भूमिका पर शक है. उन्होंने दावा किया कि संदेह के घेरे में आए कुछ इंजीनियर रिटायरमेंट के करीब थे. मंत्री के मुताबिक, इस कथित गड़बड़ी के कारण सरकार को हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होने की आशंका है. सरकार ने पिछले पांच साल के दौरान मंजूर किए गए बिल्डिंग प्लान और लेआउट की जांच के आदेश दिए हैं. इस दौरान बनाई गई दूसरी संपत्तियों का सत्यापन भी किया जा रहा है.

अधिकारियों से पिछले 10 साल, पांच साल और एक साल के दौरान MCD से मंजूर हुए बिल्डिंग प्लान का डेटा मांगा गया है. यह भी पूछा गया है कि इनमें से कितने आवेदकों ने मंजूरी लेने से पहले IFC जमा किया था.

अब MCD के अप्रूवल रिकॉर्ड का मिलान दिल्ली जल बोर्ड के पेमेंट डेटा से किया जाएगा. इससे उन प्रोजेक्ट्स की पहचान होगी, जिनमें पैसे जमा किए बिना मंजूरी मिलने का आरोप है.

पहले नोटिस, बकाया नहीं चुकाया तो सीलिंग

प्रवेश वर्मा ने कहा कि जांच में ऐसे प्रॉपर्टी मालिकों को नोटिस जारी किए जाएंगे, जिन्होंने IFC जमा किए बिना बिल्डिंग प्लान की मंजूरी हासिल की. जांच पूरी होने के बाद उनसे बकाया इन्फ्रास्ट्रक्चर चार्ज वसूला जाएगा. मंत्री के मुताबिक, NOC से जुड़े नियमों का उल्लंघन करने वाली इमारतों के खिलाफ सीलिंग की कार्रवाई की जा सकती है. नोटिस मिलने के बाद भी बकाया नहीं चुकाने पर प्रॉपर्टी सील हो सकती है.

सरकार ने मई में 70% तक घटाया था चार्ज

यह जांच ऐसे समय में शुरू हुई है, जब दिल्ली सरकार ने मई में प्रॉपर्टी मालिकों को राहत देने के लिए IFC की दरों में 70 फीसदी तक कटौती की थी. कैटेगरी A और B कॉलोनियों में चार्ज 59 फीसदी घटाकर 13.18 लाख रुपये से 5.40 लाख रुपये कर दिया गया. कैटेगरी E और F कॉलोनियों में इसे 3.29 लाख रुपये से घटाकर 2.70 लाख रुपये किया गया. वहीं, कैटेगरी G और H कॉलोनियों में 70 फीसदी कटौती के बाद चार्ज 3.29 लाख रुपये से घटकर 1.62 लाख रुपये हो गया.

सरकार का कहना है कि दरें घटाने का मकसद प्रॉपर्टी मालिकों पर वित्तीय बोझ कम करना था. इसके बाद भी IFC की वसूली में कथित गड़बड़ी की शिकायतें सामने आती रहीं, जिसके बाद बड़े स्तर पर जांच शुरू की गई.

जांच में उन मामलों की पहचान की जाएगी, जिनमें कथित तौर पर अनियमित दस्तावेजों के आधार पर अनिवार्य चार्ज जमा किए बिना बिल्डिंग प्लान और लेआउट मंजूर कराए गए.

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