NEET exam Reservation Senior Citizens: 71 वर्ष की उम्र में डॉक्टर बनने का सपना लेकर NEET UG परीक्षा देने वाले लखनऊ के अशोक बहार एक बार फिर चर्चा में हैं. इस बार वजह उनकी परीक्षा नहीं, बल्कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में दाखिल की गई याचिका है. अशोक बहार ने मेडिकल शिक्षा में वरिष्ठ नागरिकों के लिए 1 प्रतिशत आरक्षण की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है. याचिका में उन्होंने NEET UG में अधिकतम आयु सीमा नहीं होने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया है. उनकी यह पहल मेडिकल शिक्षा में उम्र, अवसर और वरिष्ठ नागरिकों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर नई बहस छेड़ रही है.
हाईकोर्ट पहुंचे अशोक बहार
NEET UG के उम्रदराज अभ्यर्थी अशोक बहार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में रिट याचिका दाखिल कर मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया में वरिष्ठ नागरिकों के लिए 1 प्रतिशत आरक्षण की मांग की है. याचिका में कहा गया है कि जब NEET UG में आयु सीमा निर्धारित नहीं है, तब वरिष्ठ नागरिकों को भी मेडिकल शिक्षा में अवसर देने के लिए विशेष प्रावधानों पर विचार किया जाना चाहिए. अशोक बहार ने सुप्रीम कोर्ट के उन दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया है, जिनके तहत NEET UG परीक्षा में अधिकतम आयु सीमा लागू नहीं है.

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मां का सपना पूरा करने की जिद
अशोक बहार का कहना है कि डॉक्टर बनने का सपना केवल उनका नहीं, बल्कि उनकी मां सावित्री बहार की भी इच्छा थी. उन्होंने बताया कि उनके पिता डॉ. राम लाल बहार लखनऊ के प्रतिष्ठित चिकित्सक थे. परिवार चाहता था कि वह भी चिकित्सा क्षेत्र में जाएं, लेकिन छात्र जीवन में कई प्रयासों के बावजूद मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल सका. अब उम्र के इस पड़ाव पर भी उन्होंने अपने सपने को छोड़ने के बजाय फिर से उसे पूरा करने का संकल्प लिया है.
पत्नी से मिली नई प्रेरणा
अशोक बहार बताते हैं कि उन्हें मेडिकल प्रवेश परीक्षा दोबारा देने की प्रेरणा उनकी पत्नी मंजू बहार से मिली. मंजू बहार स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनेकोलॉजिस्ट) हैं और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) में चीफ कंसल्टेंट के पद पर सेवाएं दे चुकी हैं. उनके अनुसार वर्षों तक पत्नी के साथ रहते हुए उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र को करीब से समझा और फिर डॉक्टर बनने की इच्छा दोबारा मजबूत हुई.
डॉक्टरों का बड़ा परिवार
अशोक बहार के मुताबिक उनका पूरा परिवार चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ा हुआ है. उन्होंने बताया कि परिवार में लगभग 20 डॉक्टर हैं, जिनमें से 5-6 चिकित्सक विदेशों में सेवाएं दे रहे हैं. पिता चिकित्सक थे, पत्नी चिकित्सक हैं और परिवार के कई सदस्य मेडिकल प्रोफेशन में हैं. इसके बावजूद उनका खुद डॉक्टर न बन पाना हमेशा एक अधूरा सपना बना रहा.
हेपेटोलॉजी के क्षेत्र में करना चाहते हैं काम
अशोक बहार का कहना है कि यदि उन्हें मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता है तो वह हेपेटोलॉजी यानी लिवर रोगों के क्षेत्र में काम करना चाहेंगे. उनके अनुसार फैटी लिवर और लिवर संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं और भविष्य में यह एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन सकती हैं. वह इस क्षेत्र में शोध और चिकित्सा सेवा के माध्यम से योगदान देना चाहते हैं.
विदेश मंत्रालय और सार्वजनिक क्षेत्र में दे चुके हैं सेवाएं
अशोक बहार का पेशेवर जीवन भी काफी सक्रिय रहा है. वे इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड (IDPL) में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मार्केटिंग हेड रह चुके हैं. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के बाद उन्होंने विदेश मंत्रालय से जुड़े कार्यों में कंसल्टेंट के रूप में भी सेवाएं दी हैं.
अब हाईकोर्ट के फैसले पर नजर
अशोक बहार की याचिका ने मेडिकल शिक्षा में वरिष्ठ नागरिकों की भागीदारी और अवसरों को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है. अब सभी की निगाहें इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच पर टिकी हैं. अदालत इस याचिका पर क्या रुख अपनाती है और संबंधित पक्षों से क्या जवाब मांगती है, यह आगामी सुनवाई में स्पष्ट होगा. फिलहाल 71 वर्षीय अशोक बहार की कहानी यह बताती है कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती और इच्छाशक्ति उम्र से कहीं बड़ी हो सकती है.
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