- कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम समीकरण को पुनः स्थापित करने के लिए नई रणनीति अपनाई है
- आराधना मिश्रा मोना को विधायक बनाकर कांग्रेस ने ब्राह्मण वर्ग को फिर से अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया है
- इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष और आलोक निषाद को उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने यूपी में अपनी पकड़ मजबूत की है
यूपी और बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस का समीकरण दशकों तक ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम पर टिका हुआ था. बीते करीब तीन दशकों में उसके हाथ से दलित छिटका, फिर मुस्लिमों के नाम पर आरजेडी और सपा जैसे नए दल उभर आए. इसके अलावा ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा में चला गया. अब कांग्रेस ने यूपी में फिर उस समीकरण को आराधना मिश्रा मोना के जरिए साधा है. इसके अलावा इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है. पिछड़े समाज के आलोक निषाद भी उपाध्यक्ष बन गए हैं तो वहीं दलित वर्ग के आलोक प्रसाद भी वाइस प्रेसिडेंट हैं. दलित समाज से ही यूपी के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम भी आते हैं. यही कारण है कि इसे कांग्रेस की अपना पुराना BDM समीकरण साधने की कोशिश माना जा रहा है.
उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस ने 1989 तक सत्ता का स्वाद चखा था. फिर मंडल और कमंडल की राजनीति का उभार हुआ तो कांग्रेस का पूरा ताना-बाना बिखर गया. ब्राह्मणों समेत सवर्णों का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर मुड़ गया तो वहीं पिछड़ों की राजनीति के नाम पर उभरे सपा, आरजेडी जैसे दलों ने अलग गोलबंदी की. वहीं दलितों का बड़ा हिस्सा बसपा, लोजपा जैसे दलों में चला गया. ऐसी स्थिति में कांग्रेस के पास कोई ऐसा सामाजिक वर्ग नहीं बचा, जिसे उसका समर्पित वोट बैंक कहा जा सके. मुस्लिमों का बड़ा हिस्सा उसके साथ काफी बाद तक बना रहा, लेकिन जब मुलायम सिंह यादव, लालू यादव और मायावती जैसे नेताओं की ताकत इतनी बढ़ी कि भाजपा को हरा सकें तो मुसलमान समय-समय पर इन लोगों का साथ देता रहा. इस तरह कांग्रेस से मुसलमान भी दूर होते गए.
अब कांग्रेस को फिर से मुसलमानों, दलितों और सवर्णों से उम्मीद दिख रही है. इनमें भी ब्राह्मणों पर कांग्रेस फोकस कर रही है, जिनके बारे में लगातार प्रचारित किया जा रहा है कि वे भाजपा से नाराज हैं. ऐसे मौके पर कांग्रेस ने आराधना मिश्रा मोना को चांस दिया है. एक तरफ वह मुश्किल वक्त में जीतने वाली विधायक हैं तो वहीं महिला भी हैं और ब्राह्मण भी. पहले भी 2017 में कांग्रेस ने शीला दीक्षित को आगे बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी पहचान दिल्ली से ज्यादा थी. अब यूपी की रहने वाली और यहीं पर विधायक तथा लंबी विरासत का हिस्सा आराधना मिश्रा को आगे बढ़ाकर कांग्रेस ने कई समीकरणों को साधने की कोशिश की है.
अब बात करते हैं क्षेत्रीय समीकरण की. रायबरेली, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और प्रयागराज जैसे जिलों में कांग्रेस कभी मजबूत हुआ करती थी. बुरे वक्त में भी कांग्रेस को रायबरेली और अमेठी से सहारा मिला है. यहां के सामाजिक समीकरण में ब्राह्मण और क्षत्रियों की आबादी काफी अधिक है. ऐसे में आराधना मिश्रा को चांस देकर कांग्रेस ने वह गणित भी मजबूत करने की कोशिश की है. इसके अलावा इमरान मसूद को प्रमोशन देकर कांग्रेस पश्चिम यूपी के जिलों में खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है. इस बेल्ट में यादवों की आबादी कम है. ऐसे में सपा का MY समीकरण उतना मजबूत नहीं बन पाता. इसलिए कांग्रेस को लगता है कि मुस्लिम वोटरों को लुभाकर वह पश्चिम में अपनी दावेदारी बढ़ा सकती है.
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