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पंजाब, बिहार से लेकर तेलंगाना और कर्नाटक तक... कांग्रेस आलाकमान की सरदर्दी कम नहीं

कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, अपनी ही गुटबाजी? बिहार से पंजाब तक असंतोष की कहानी

कांग्रेस के सामने एकजुटता की बड़ी चुनौती
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दिल्ली में कांग्रेस के नए दफ्तर के बाहर एक दिलचस्प धरना हुआ. आमतौर पर ऐसा होता है कि किसी मुद्दे पर विरोधी पार्टी दूसरे पार्टी के दफ्तर पर धरना प्रदर्शन करती है. लेकिन यहां मामला अंदरूनी था. दरअसल बिहार कांग्रेस के करीब 40 नेताओं ने अपने ही राज्य के प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी को हटाने के लिए धरना प्रदर्शन किया. धरना में शामिल खगड़िया से कांग्रेस के पूर्व विधायक छत्रपति यादव ने एनडीटीवी से कहा कि बिहार में प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी दोनों नाकाम हैं और इन्होंने पार्टी को बहुत पीछे धकेल दिया है. इसलिए इन दोनों को पद से हटाया जाना चाहिए.

छत्रपति यादव ने यह भी मांग की कि बिहार कांग्रेस के 43 नेताओं को जारी कारण बताओ नोटिस वापस लिया जाए. बिहार से आए कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि उन्होंने अपना धरना इस शर्त पर वापस लिया है कि उनकी मांगों से जुड़ा ज्ञापन राहुल गांधी तक पहुंचाया जाएगा. उनका आरोप है कि पटना में उनकी बात नहीं सुनी गई, इसलिए वे अपनी शिकायत लेकर दिल्ली पहुंचे हैं.

बिहार कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं का कहना है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद कांग्रेस सिर्फ छह सीटें जीत सकी और उसे 13 सीटों का नुकसान हुआ. उनके मुताबिक इस प्रदर्शन की जिम्मेदारी तय करते हुए प्रदेश नेतृत्व और प्रभारी पर कार्रवाई होनी चाहिए.

पंजाब में भी कांग्रेस के सामने एकजुटता की चुनौती

कांग्रेस के लिए फिलहाल बिहार बड़ी चुनावी प्राथमिकता नहीं है, क्योंकि वहां निकट भविष्य में कोई चुनाव नहीं है. लेकिन जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, वहां भी पार्टी आंतरिक कलह से जूझ रही है. इनमें सबसे प्रमुख नाम पंजाब का है. यही वजह है कि कांग्रेस आलाकमान ने पंजाब में प्रभारी ही बदल दिया है.

पंजाब में अगले साल फरवरी में विधानसभा चुनाव होने हैं. लेकिन यहां कांग्रेस में जबरदस्त घमासान मचा हुआ है. चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा एक तरफ हैं तो प्रदेश अध्यक्ष राजा वाडिंग दूसरे तरफ. वहीं पंजाब में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा भी दिल्ली के चक्कर लगा रहे हैं. सब की अपनी अपनी इच्छाएं हैं और सबका सपना मुख्यमंत्री की कुर्सी है. अब इन्हीं को एकजुट करने के लिए सचिन पायलट को लाया गया है. अब सचिन पायलट के राजनीतिक कौशल का इम्तिहान होगा कि वे सभी नेताओं के इगो को शांत करके एकजुट कर पाते हैं या नहीं और उन्हें भी यह पता है कि वक्त निकला जा रहा है.

राजस्थान में भी भविष्य की लड़ाई की आहट

पंजाब के बगल में है राजस्थान, जहां अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट के बीच राजनीतिक खींचतान की तो मिसालें दी जाती हैं. इन दोनों के बीच मनमुटाव की वजह से कांग्रेस का क्या हाल हुआ वो सबको मालूम है. राजस्थान में 2028 में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसमें अभी काफी वक्त है. लेकिन कांग्रेस आलाकमान को उसके पहले यह तय करना पड़ेगा कि राज्य की कमान किसके हाथ में दी जाए. वैसे कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बना कर यह संकेत तो दे दिया है कि उनका कद पार्टी में अब बढ़ेगा ही. पंजाब का प्रभारी किसी और को भी बनाया जा सकता है, लेकिन सचिन को ही इसका जिम्मा सौंप कर आलाकमान ने अपनी मंशा जाहिर कर दी है.

तेलंगाना में मंत्री को गंवानी पड़ी कुर्सी

अब बात करते हैं तेलंगाना की, जहां एक विवाद के बाद एक मंत्री को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी. तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने अपने कैबिनेट से कोंडा सुरेखा को हटा दिया है. कोंडा सुरेखा की बेटी सुष्मिता पटेल ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री पर कुछ ऐसी टिप्पणी की थी जिसे पार्टी विरोधी और उससे भी ज्यादा मुख्यमंत्री की कुर्सी या उसके अधिकार को चुनौती देने वाला माना गया. जिसकी कीमत कोंडा सुरेखा को कुर्सी गंवा कर चुकानी पड़ी. 

इस मामले को कांग्रेस में पुराने बनाम नए नेता के विवाद की तरह देखा जा रहा है. साथ ही यह भी कहा गया कि रेवंत रेड्डी ने पिछड़ी जाति का अपमान किया है जिसके एवज में रेवंत रेड्डी को पिछड़ी जाति की दो महिलाओं को सरकारी पद पर नियुक्ति करनी पड़ी.

कर्नाटक में भी नहीं थम रही राजनीतिक खींचतान

चौथा किस्सा कनार्टक का है, जहां मंत्रिमंडल बनाने फिर विभागों के बंटवारे को लेकर मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार को कई बार दिल्ली के चक्कर लगाने पड़े. फिर मंत्रिमंडल गठन के बाद विभागों का बंटवारा हुआ तो रामलिंगा रेड्डी ने इस्तीफा दे दिया. उनका कहना था कि उन्हें बेंगलुरु विकास मंत्रालय क्यों नहीं दिया गया. बाद में नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्हें मनचाहा विभाग सौंपा गया.

डी के शिवकुमार कैबिनेट के एक और मंत्री बी नागेंद्र पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा और उन्हें भी पद छोड़ना पड़ा.शिवकुमार को समय-समय पर पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बयानों से भी राजनीतिक असहजता का सामना करना पड़ता है.

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