- याचिका दाखिल की गई है, जो जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए MoP बनाने की मांग करती है
- याचिका में कॉलेजियम की राय से जजों की नियुक्ति और RTI कानून के तहत फैसलों की पारदर्शिता की मांग की गई है
- सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में NJAC कानून को असंवैधानिक घोषित कर कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार के लिए सुझाव मांगे थे
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाते हुए MoP बनाने की मांग की गई है. MoP का अर्थ मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर से है. याचिका में कहा गया कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया इससे पारदर्शी होगी और आम लोगों को भी इसके बारे में जानकारी रहेगी. लोक प्रहरी NGO की ओर से दाखिल याचिका में चीफ जस्टिस और केंद्र सरकार को इस संबंध में जरूरी कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई है. सोमवार को जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के सामने यह मामला सुनवाई के लिए आया.
हालांकि जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने खुद को सुनवाई से अलग कर लिया. उन्होंने कहा कि वह MoP से जुड़े एक ऐसे ही मामले में पहले एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) के रूप में पेश हो चुके हैं. याचिका में मांग की गई है कि संवैधानिक अदालतों में जजों की नियुक्ति कॉलेजियम की सर्वसम्मत राय के आधार पर हो और नियुक्तियों में 2015 के NJAC फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए मानकों को ध्यान में रखा जाए. इसके अलावा कॉलेजियम के फैसलों को सूचना के अधिकार (RTI) कानून के दायरे में लाने की मांग भी की गई है.
याचिकाकर्ता ने CJI से प्रशासनिक स्तर पर MoP में जरूरी बदलाव करने और केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय को CJI से परामर्श के बाद एक महीने के भीतर इसे अंतिम रूप देने का निर्देश देने की मांग की है. दरअसल, MoP पहली बार जून 1999 में सुप्रीम कोर्ट के दूसरे जजों के मामले में दिए गए फैसले के बाद तैयार किया गया था. इसमें कॉलेजियम व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित की गई थी. वर्ष 2015 में संसद ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून पारित कर कॉलेजियम व्यवस्था को समाप्त करने और न्यायपालिका तथा केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों वाली एक नई व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया था.
NJAC कानून को सुप्रीम कोर्ट ने घोषित किया था असंवैधानिक
बता दें कि 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने NJAC कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार और नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सुझाव आमंत्रित किए थे. 16 दिसंबर 2015 को अदालत ने केंद्र सरकार को CJI से परामर्श कर MoP में जरूरी बदलाव करने और इसे अंतिम रूप देने की जिम्मेदारी सौंपी थी. लेकिन कॉलेजियम और केंद्र सरकार के बीच कई मुद्दों पर असहमति के कारण यह प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है.
याचिका में बताया गया जजों के चयन में कौन सी 4 चीजें जरूरी
इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर नियुक्ति के लिए सुझाए गए नामों को खारिज करने की केंद्र की मांग और जजों की नियुक्ति के लिए स्थायी सचिवालय बनाने का प्रस्ताव भी शामिल था. लोक प्रहरी की याचिका में कहा गया है कि मौजूदा MoP में पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठता की कमी है. इसका असर संवैधानिक अदालतों में जजों की नियुक्ति की गुणवत्ता और न्याय पाने के वादी के अधिकार पर पड़ता है. याचिका में दलील दी गई है कि संवैधानिक अदालतों के जजों के चयन में निष्पक्षता, निर्भीकता, पारदर्शिता और शुचिता जैसे चार बुनियादी गुण सुनिश्चित करना जरूरी है. खासकर सुप्रीम कोर्ट के जजों के मामले में यह और महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके फैसले अंतिम होते हैं.
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