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चीन बॉर्डर के पास 16,700 फीट पर लद्दाख को मिला भारत का पहला मॉडल बॉर्डर गांव, रणनीतिक रूप से क्यों है अहम?

चुमुर गांव की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पश्मीना बकरियों के पालन पर निर्भर रही है. सरकार स्थानीय आबादी को रोकने के लिए उनके आजीविका को प्राथमिकता दे रही है.

चीन बॉर्डर के पास 16,700 फीट पर लद्दाख को मिला भारत का पहला मॉडल बॉर्डर गांव, रणनीतिक रूप से क्यों है अहम?
पहले सीमा विकास का मतलब केवल रणनीतिक सड़कें, पुल और सैन्य बुनियादी ढांचा माना जाता था. लेकिन अब सोच बदली है.
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चीन सीमा पर 16,700 फीट की ऊंचाई, 24 परिवार और 91 लोगों का हौसला... भारत के इस आखिरी छोर पर अब विकास की एक नई और ऐतिहासिक इबारत लिखी जा रही है. पूर्वी लद्दाख के चांगथांग क्षेत्र में स्थित बेहद सुदूर गांव 'चुमुर' अब देश का पहला 'मॉडल बॉर्डर विलेज' बनने जा रहा है. केंद्र सरकार के 'वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम' के तहत लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने बुधवार को इस महत्वाकांक्षी परियोजना की आधारशिला रखी. इस कदम का सीधा मकसद चीन सीमा के पास बसे इस रणनीतिक गांव को आत्मनिर्भर, आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है.

यह परियोजना देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने वाले नागरिकों को वहां रोके रखने की एक बड़ी कोशिश है. लद्दाख प्रशासन के मुताबिक, यह अनूठी पहल दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोगों के जीवन को पूरी तरह बदल देगी.
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माइनस डिग्री तापमान में मिलेंगे 'थर्मल इंसुलेटेड' घर

चुमुर गांव समुद्र तल से 16,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहां सर्दियों में हाड़ कंपाने वाली ठंड पड़ती है. इस कठोर मौसम से निपटने के लिए गांव के सभी 24 परिवारों को विशेष रूप से डिजाइन किए गए 'क्लाइमेट-रेजिलिएंट' घर दिए जाएंगे. इन मकानों में थर्मल इंसुलेटेड दीवारें होंगी. ये घर भीषण ठंड में भी अंदर के तापमान को रहने लायक बनाए रखेंगी. सब ठीक रहा तो सितंबर 2026 तक इन घरों को तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है.

सबसे खास बात यह है कि इस योजना के तहत बनने वाले हर घर में एक अतिरिक्त कमरा विशेष रूप से बनाया जाएगा. इस कमरे का इस्तेमाल 'होमस्टे' के रूप में किया जा सकेगा. इससे यहां आने वाले पर्यटकों को रहने की जगह मिलेगी और स्थानीय परिवारों के लिए कमाई का एक नया और स्थायी जरिया खड़ा होगा.

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पर्यटन से बदलेगी गांव की तस्वीर

अब तक चुमुर गांव की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पश्मीना बकरियों के पालन पर निर्भर रही है. इस नई पहल के जरिए न केवल पारंपरिक पश्मीना उत्पादन और स्थानीय हस्तशिल्प को आधुनिक सहयोग दिया जाएगा, बल्कि गांव में पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जाएगा. सरकार का मानना है कि जब तक सीमावर्ती इलाकों में आजीविका के साधन नहीं होंगे, तब तक वहां आबादी को रोकना मुमकिन नहीं है.

यही वजह है कि इस मॉडल विलेज प्रोजेक्ट में सिर्फ सड़कें या पुल बनाने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा, बल्कि इसे पूरी तरह 'टूरिज्म-इनेबल्ड' और आर्थिक रूप से जीवंत गांव के रूप में विकसित किया जा रहा है. बुनियादी ढांचे के साथ-साथ रोजगार के नए अवसर पैदा करना इस पूरी योजना के केंद्र में है.
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पलायन रोकने की दिशा में देश का सबसे बड़ा प्रयोग

केंद्र सरकार ने साल 2023 में 'वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम' की शुरुआत की थी. इसका मुख्य मकसद भारत की उत्तरी सीमाओं पर स्थित गांवों में जीवन स्तर को सुधारना और बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना था. दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, रोजगार की कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण इन सीमावर्ती गांवों से बड़े पैमाने पर पलायन देखा गया है.

नीति निर्माताओं का मानना है कि सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए वहां नागरिक आबादी का बने रहना बेहद जरूरी है. चुमुर गांव इस पूरी सोच का पहला बड़ा टेस्ट केस (पायलट प्रोजेक्ट) है.

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रणनीतिक रूप से क्यों अहम है चुमुर का विकास?

लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) के बिल्कुल करीब होने के कारण चुमुर सामरिक दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण इलाका है. भले ही इस गांव की आबादी 100 से कम हो, लेकिन इस पायलट प्रोजेक्ट की सफलता लद्दाख के अन्य सीमावर्ती गांवों के लिए एक रोल मॉडल का काम करेगी.

लद्दाख प्रशासन के लिए असली चुनौती सिर्फ कंक्रीट के मकान खड़े करना नहीं है, बल्कि एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना है जिससे लोग अपनी जड़ों से जुड़े रहें.

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