पश्चिम बंगाल की सियासत में वही पटकथा दोहराई जा रही है, जो महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने लिखी थी. तृणमूल कांग्रेस के भीतर बगावत, विधायकों का खिसकना और अब मेयर का इस्तीफा. इन घटनाओं ने साफ कर दिया है कि ममता बनर्जी की पार्टी पर अब ‘शिंदे मॉडल' का खतरा मंडरा रहा है. हालात ऐसे हैं कि न सिर्फ विधायक, बल्कि सांसद और बड़े चेहरे भी पाला बदलने के मूड में बताए जा रहे हैं.
विधायक बिखरे, ऋतब्रत ने संभाला मोर्चा
टीएमसी में संकट की शुरुआत विधायकों के असंतोष से हुई, जो अब खुली बगावत में बदलती दिख रही है. निष्कासित विधायक ऋतब्रत बंदोपाध्याय ने दावा किया है कि उनके साथ करीब 58–60 विधायक हैं, जबकि कुछ विधायक बाहर होने के कारण सामने नहीं आए हैं. उन्होंने खुद को नेता विपक्ष घोषित किया और स्पीकर से मंजूरी भी हासिल कर ली. यह घटनाक्रम सीधे तौर पर पार्टी नेतृत्व को चुनौती माना जा रहा है. अगर यह संख्या सही साबित होती है, तो यह टीएमसी के भीतर दो-तिहाई के आंकड़े के करीब है, यानी एक ऐसा मोड़ जहां पार्टी का विभाजन कानूनी रूप से भी संभव हो सकता है.
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मेयर का इस्तीफा, संकट और गहरा गया
इस राजनीतिक उथल-पुथल के बीच कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम का इस्तीफा टीएमसी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. हकीम ने पहले ही पद छोड़ने की इच्छा जताई थी और पार्टी नेतृत्व ने भी इसे मंजूरी दे दी. लेकिन यह इस्तीफा ऐसे समय आया है, जब पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक, प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव, साथ ही बदलते शक्ति समीकरणों ने इस फैसले को प्रभावित किया. हकीम का जाना इस बात का संकेत है कि संकट सिर्फ विधायकों तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठनात्मक ढांचे तक पहुंच चुका है.
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'TMC खत्म हो सकती है'
बता दें कि बीजेपी नेता और बांकुड़ा सांसद सौमित्र खान ने बड़ा दावा करते हुए कहा था कि करीब 50 विधायक टीएमसी से नाराज हैं. 20 सांसद बीजेपी में आने के लिए तैयार हैं. ये सभी नेता संपर्क में हैं और सिर्फ उच्च नेतृत्व के संकेत का इंतजार कर रहे हैं. सौमित्र खान ने यहां तक कह दिया कि अगर बीजेपी नेतृत्व हरी झंडी दे दे, तो टीएमसी नाम की कोई पार्टी नहीं बचेगी. उन्होंने अभिषेक बनर्जी पर भी तीखा हमला बोलते हुए उन्हें पार्टी की गिरती हालत के लिए जिम्मेदार ठहराया.
‘दोहराया जा सकता है महाराष्ट्र मॉडल'
पूर्व टीएमसी नेता और अब भाजपा विधायक तापस रॉय ने भी साफ कहा है कि पार्टी के भीतर असंतोष गहराता जा रहा है और यह स्थिति महाराष्ट्र जैसी राजनीतिक उथल-पुथल पैदा कर सकती है. रॉय के मुताबिक, 'पार्टी के अंदर विरोधाभास बढ़ गए हैं, कई नेता और विधायक नाराज हैं और यही फूट का संकेत है.' यह बयान इस बात को और मजबूत करता है कि टीएमसी के भीतर संकट अब सतही नहीं, बल्कि गहराई तक पहुंच चुका है.
सांसदों का खेल, 20 का आंकड़ा क्यों अहम?
पश्चिम बंगाल में लोकसभा की कुल 42 सीटें हैं. 2024 चुनाव में टीएमसी के पास 29 सांसद हैं. अब अगर सौमित्र खान के दावे के मुताबिक 20 सांसद पाला बदलते हैं, तो यह संख्या दो-तिहाई के करीब पहुंचेगी. दल-बदल कानून से बचने की गुंजाइश बनेगी. पार्टी की संसदीय ताकत अचानक कमजोर हो सकती है. सूत्रों के मुताबिक, फिलहाल 5 सांसद ऋतब्रत खेमे के संपर्क में बताए जा रहे हैं, लेकिन यह संख्या आगे बढ़ सकती है.
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‘शिंदे मॉडल' का डर क्यों बढ़ रहा?
पूरे घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो तस्वीर साफ नजर आती है कि विधायक खुले तौर पर बगावत कर चुके हैं. नेता विपक्ष पर पार्टी में टकराव साफ है ही. बड़े नेताओं और मेयर का इस्तीफा भी इस बेचैनी को साफ उजागर कर रहा है.
यह सब ठीक वैसा ही है, जो पहले महाराष्ट्र में दिखा था. जहां अंदरूनी बगावत ने पूरी पार्टी की संरचना बदल दी थी.
ममता के सामने सबसे बड़ी चुनौती
अब ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. पार्टी को एकजुट रखना, असंतुष्ट नेताओं को मनाना, ‘असली TMC' की लड़ाई से बचना ममता बनर्जी के लिए चुनौती है. अगर हालात काबू में नहीं आए, तो आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में एक बड़ा सत्ता समीकरण बदल सकता है.
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