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This Article is From Sep 19, 2025

हाई-परफॉरमेंस करप्शन इंजन... ED ने 5वें आरोप-पत्र में बताया कौन छत्तीसगढ़ का ‘बिग बॉस’, कैसे मची लूट

शराब घोटाले की जड़ें फरवरी 2019 तक जाती हैं, जब अनवर ढेबर ने रायपुर के एक होटल में बैठक बुलाई. इसमें छत्तीसगढ़ डिस्टिलरी के नवीन केडिया, भाटिया वाइंस के प्रिंस भाटिया और वेलकम डिस्टिलरी के राजेंद्र जायसवाल सहित कई डिस्टिलर मौजूद थे.

हाई-परफॉरमेंस करप्शन इंजन... ED ने 5वें आरोप-पत्र में बताया कौन छत्तीसगढ़ का ‘बिग बॉस’, कैसे मची लूट
  • जांच में एक व्हाट्सऐप ग्रुप "बिग बॉस" का खुलासा हुआ, जिसमें चैतन्य बघेल समेत कई अधिकारी और नेता शामिल थे.
  • शराब घोटाले का पैसा रियल एस्टेट में लगाया गया और मनी लॉन्ड्रिंग के कई उदाहरण भी सामने आए हैं.
  • चैतन्य बघेल के वकील ने गिरफ्तारी को राजनीति से प्रेरित बताया जबकि एजेंसी ने घोटाले को बड़े पैमाने पर बताया है.

छत्तीसगढ़ में “बिग बॉस” चकाचौंध भरा टीवी शो नहीं , जिसे बॉलीवुड स्टार सलमान खान होस्ट करते हों, बल्कि यहां का “बिग बॉस” कथित तौर पर एक विशाल शराब सिंडिकेट था और इसका सूत्रधार कोई और नहीं बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल थे. अगर प्रवर्तन निदेशालय की मानें तो जो कुछ सामने आया वह रियलिटी शो नहीं, बल्कि राजनीतिक अंधेरे में बुना गया हजारों करोड़ रुपये का घोटाला था.

EOW भी लेगी कस्टडी में

चैतन्य बघेल इस समय प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की हिरासत में हैं और आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (ईओडब्ल्यू) भी उन्हें अपनी कस्टडी में लेने की तैयारी कर रही है. 15 सितंबर को ईडी ने विशेष अदालत में पांचवां पूरक आरोप-पत्र दाख़िल किया. इस चार्जशीट में खुलासा हुआ कि चैतन्य ने अकेले ही हज़ार करोड़ रुपये से अधिक की रकम संभाली.

ये अधिकारी और नेता शामिल

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जांच में कथित तौर पर एक व्हाट्सऐप ग्रुप का खुलासा हुआ, जिसका नाम ही “बिग बॉस” था. पूरा सिंडिकेट इसी ग्रुप से चलता था. इस ग्रुप के ज़रिये सैकड़ों करोड़ के वित्तीय लेन-देन कथित तौर पर तय किए जाते थे. इसमें चैतन्य बघेल, जिन्हें “बिट्टू” नाम से सेव किया गया था, कांग्रेस नेता अनवर ढेबर, रिटायर्ड आईएएस अनिल टुटेजा, आबकारी अधिकारी सौम्या चौरसिया और व्यापारी पुष्पक शामिल थे. आरोप-पत्र में इन चैट्स के स्क्रीनशॉट भी जोड़े गए हैं, जिसमें पूरे तफसील से दर्ज है कि “बिट्टू” ने कब किसे फोन किया, कितनी देर बात हुई और किसे कितना पैसा कहां भेजना है. यह ग्रुप राज्य की शराब व्यवस्था का समानांतर कमांड सेंटर बन गया था, जहां नकद के रास्ते, नकली होलोग्राम और कमीशन बांटने की रणनीति तय होती थी. इसके ग्रुप के कई चैट्स एनडीटीवी के पास मौजूद हैं.

साक्ष्यों ने केस को पुख़्ता किया

अनवर ढेबर, अनिल टुटेजा और सौम्या चौरसिया के मोबाइल फोन से मिले साक्ष्यों ने केस को और पुख़्ता किया. अनवर के फोन में चैतन्य का नंबर “बिट्टू” के नाम से सेव था. चैट्स में भारी नकद लेन-देन, नकली होलोग्राम बनाने और काले धन के बंटवारे की बातें दर्ज थीं. ईडी का कहना है कि चैतन्य ने अकेले कम से कम 200 करोड़ रुपये कमाए, जबकि 850 करोड़ रुपये तत्कालीन कांग्रेस कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल को भेजे गए. एजेंसी का दावा है कि यह पूरा ऑपरेशन एक सैन्य अनुशासन की तरह चलता था, जिसमें तय होता था कि किसे पैसा मिलेगा, कौन-सा ठेकेदार भुगतान पाएगा और कितनी रकम सफेद की जाएगी.

पप्पू बंसल का बयान बना फंदा

सबसे सनसनीखेज़ बयान शराब कारोबारी लक्ष्मीनारायण उर्फ़ पप्पू बंसल का आया, जो भूपेश बघेल के करीबी माने जाते हैं. पूछताछ में बंसल ने माना कि उन्होंने और चैतन्य ने मिलकर एक हज़ार करोड़ रुपये से अधिक नकद को संभाला. बंसल ने खुलासा किया कि यह पैसा अनवर ढेबर से दीपेन चावड़ा और फिर कांग्रेस नेताओं रामगोपाल अग्रवाल और के.के. श्रीवास्तव तक पहुंचाया गया. सिर्फ़ तीन महीने में ही बंसल ने 136 करोड़ रुपये को इधर से उधर किया. ईडी अधिकारियों का कहना है कि बंसल की गवाही बताती है कि सिंडिकेट किस तरह राजनीतिक ढांचे में गहराई से पैठ बना चुका था.

रियल एस्टेट में लगाया पैसा

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चार्जशीट यह भी दिखाती है कि घोटाले का पैसा किस तरह रियल एस्टेट में लगाया गया. चैतन्य की परियोजनाएं विठ्ठल ग्रीन और बघेल डेवलपर्स एंड एसोसिएट्स कथित तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग का अड्डा थीं. आधिकारिक रिकॉर्ड में 7.14 करोड़ रुपये खर्च दिखाए गए, जबकि जांचकर्ताओं के अनुसार असली लागत 13 से 15 करोड़ थी, जिसमें से 4.2 करोड़ नकद ठेकेदारों को दिए गए. 2020 में एक ही दिन में शराब कारोबारी त्रिलोक सिंह ढिल्लों के कर्मचारियों ने विठ्ठल ग्रीन में 19 फ्लैट ख़रीदे ईडी के मुताबिक़ यह काले धन को छिपाने की रणनीति थी.

भिलाई के नामी ज्वैलर्स के नाम भी सामने आए. आरोप है कि उन्होंने बघेल की कंपनियों को 5 करोड़ रुपये “ऋण” दिया और बाद में मात्र 80 लाख रुपये में छह ज़मीनें ख़रीदी गई . ईडी ने इसे क्लासिक मनी लॉन्ड्रिंग का उदाहरण बताया. नगद अंदर, ज़मीन बाहर, सब कुछ वैध व्यापार के नाम पर.

चैतन्य बघेल के वकील की दलील

हालांकि, चैतन्य के वकील फै़सल रिज़वी ने इस केस को राजनीति से प्रेरित बताया है. उनका कहना है कि गिरफ्तारी अवैध है और केवल पप्पू बंसल के बयान पर आधारित है, जो ख़ुद फ़रार है और जिसके खिलाफ़ गैर-जमानती वारंट जारी है. रिज़वी ने कहा कि चैतन्य ने हमेशा जांच में सहयोग किया, सभी दस्तावेज़ सौंपे, फिर भी उन्हें कभी पूछताछ के लिए तलब नहीं किया गया और अचानक गिरफ्तार कर लिया गया. उनके अनुसार यह सब पूर्व मुख्यमंत्री को निशाना बनाने के लिए किया गया है.

शराब घोटाले में किसे कितना मिला

शराब घोटाले की जड़ें फरवरी 2019 तक जाती हैं, जब अनवर ढेबर ने रायपुर के एक होटल में बैठक बुलाई. इसमें छत्तीसगढ़ डिस्टिलरी के नवीन केडिया, भाटिया वाइंस के प्रिंस भाटिया और वेलकम डिस्टिलरी के राजेंद्र जायसवाल सहित कई डिस्टिलर मौजूद थे. साथ ही ए.पी. त्रिपाठी और अरविंद सिंह जैसे अफसर भी शामिल थे. बैठक में तय हुआ कि हर शराब केस पर कमीशन लिया जाएगा और बदले में डिस्टिलरी ऑपरेटरों को रेट बढ़ाकर दिए जाएंगे. जल्द ही सिंडिकेट का काम तीन हिस्सों में बंट गया पहला, हर केस पर 75 रुपये का कमीशन, जिससे 300 करोड़ से अधिक जुटाए गए. दूसरा, एक समानांतर शराब बाज़ार, जिसमें डुप्लीकेट होलोग्राम से हज़ारों केस सरकारी गोदामों से बाहर बेचे गए. 2022–23 में ही 400 ट्रक अवैध शराब हर महीने चली और प्रति केस 3000 रुपये का मुनाफ़ा कमाया गया. तीसरा हिस्सा था फ़ॉरेन लिकर लाइसेंस FL-10A, जिसे चुनिंदा कंपनियों को बांटकर प्रीमियम ब्रांड ऊंचे दाम पर बेचने का अधिकार मिला और इससे 211 करोड़ रुपये की कमाई हुई.

ईडी भी जांच के बाद हैरान

एजेंसी के मुताबिक़ तत्कालीन मुख्य सचिव रहे रिटायर्ड आईएएस विवेक ढांड भी सिर्फ़ मूक दर्शक नहीं, बल्कि सीधे लाभार्थी थे. ईडी के शब्दों में, आबकारी विभाग को “हाई-परफॉरमेंस करप्शन इंजन” में बदल दिया गया, जिसे डर, फ़ायदे और अरबों की दौलत से चलाया जाता था. घोटाले का पैमाना चौंकाने वाला है. ईडी का दावा है कि 2019 से 2022 के बीच ही कम से कम 1392 करोड़ रुपये कांग्रेस नेताओं और उनके सहयोगियों तक पहुंचे. चैतन्य की कथित भूमिका बतौर “बिग बॉस” ही इस गिरफ्तारी को विस्फोटक बनाती है. उनकी रियल एस्टेट परियोजनाएं, व्हाट्सऐप चैट्स, कैश हैंडलर्स की गवाही और नकली होलोग्राम की कड़ियां मिलकर एक भयावह तस्वीर पेश करती हैं. एजेंसी का कहना है कि उनके समन्वय के बिना यह सिंडिकेट इतने बड़े स्तर पर चल ही नहीं सकता था.

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