- कर्नाटक के वाल्मीकि निगम घोटाले में करीब 90 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी और 600 बैंक खातों का इस्तेमाल हुआ था
- पूर्व मंत्री बी. नागेंद्र, उनके सहयोगी और निगम के अधिकारी इस सुनियोजित घोटाले के मुख्य आरोपित हैं
- फर्जी दस्तावेजों और नकली मुहरों का उपयोग कर करोड़ों रुपये के बैंक लेन-देन किए गए और संपत्ति खरीदी गई
करीब 90 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी, 600 बैंक खातों का इस्तेमाल, फर्जी कंपनियां, बेनामी संपत्तियां और सत्ता के शीर्ष तक पहुंचते आरोप. कर्नाटक के वाल्मीकि निगम घोटाले में सीबीआई की चार्जशीट ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.अब सबकी नजर अदालत की कार्रवाई पर टिकी है. कर्नाटक के चर्चित वाल्मीकि कॉरपोरेशन घोटाले में सीबीआई ने अपनी जांच पूरी कर ली है और पूर्व मंत्री बी. नागेंद्र समेत 30 आरोपियों के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी है. यह मामला कर्नाटक महार्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम यानी KMVSTDCL के करोड़ों रुपये के फंड की कथित हेराफेरी से जुड़ा है. सीबीआई के मुताबिक, यह कोई साधारण घोटाला नहीं था, बल्कि बेहद सुनियोजित तरीके से रची गई एक बड़ी साजिश थी, जिसमें सरकारी अधिकारी, बैंक कर्मचारी, बिचौलिए और निजी कंपनियों के लोग शामिल थे.
सीबीआई जांच के दौरान पता चला कि उस समय के अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री बी. नागेंद्र, उनके करीबी सहयोगी नेक्कांती नागराज और वाल्मीकि निगम के तत्कालीन प्रबंध निदेशक पद्मनाभ जे.जी. इस पूरे नेटवर्क के प्रमुख किरदार थे. हैदराबाद के सत्यानारायण वर्मा नामक व्यक्ति ने इस कथित घोटाले को अंजाम देने में अहम भूमिका निभाई.
ग्राफिक डिजाइनर ने बनाई थी नकली मुहर
सीबीआई के अनुसार, आरोपियों ने फर्जी दस्तावेजों और नकली केवाईसी पेपर्स के आधार पर 18 फर्जी बैंक खाते खुलवाए. इन खातों को काल्पनिक कंपनियों के नाम पर तैयार किया गया था. आरोप है कि निगम के एमडी और अकाउंट ऑफिसर ने अपने सैंपल हस्ताक्षर और बैंकिंग से जुड़ी संवेदनशील जानकारी आरोपियों तक पहुंचाई. जांच में यह भी सामने आया कि हैदराबाद में एक ग्राफिक डिजाइनर की मदद से निगम के अधिकारियों की नकली मुहरें और स्टांप तैयार कराए गए. इन्हीं नकली दस्तावेजों और हस्ताक्षरों का इस्तेमाल कर करोड़ों रुपये के बैंक लेन-देन किए गए.
घोटाले के पैसे से खरीदी लग्जरी गाड़ियां, सोना-चांदी
सीबीआई के मुताबिक, लगभग 187 करोड़ रुपये निगम के बैंक खाते में जमा किए गए थे, जिनमें से करीब 89.63 करोड़ रुपये फर्जी चेक और आरटीजीएस ट्रांजैक्शन के जरिए निकाल लिए गए. इसके बाद इस रकम को करीब 600 बैंक खातों के जरिए घुमाया गया ताकि पैसों के स्रोत को छिपाया जा सके. जांच एजेंसी का कहना है कि बाद में इस रकम को नकदी, सोना-चांदी और लग्जरी गाड़ियों में बदल दिया गया. सीबीआई ने दावा किया है कि पूर्व मंत्री बी. नागेंद्र इस घोटाले से खरीदी गई एक बेनामी लग्जरी गाड़ी के लाभार्थी थे. इसके अलावा उनके करीबी सहयोगी नागराज और उनके रिश्तेदारों तक भी कथित तौर पर यह पैसा पहुंचा.
रिश्तेदारों को दिये टेंडर
जांच के दौरान एक और बड़ा खुलासा अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के टेंडरों को लेकर हुआ. वर्ष 2023-24 में लगभग 13.95 करोड़ रुपये के स्मार्ट कंप्यूटर लैब और रोटी मेकिंग मशीनों के ठेके एक ऐसी कंपनी को दिए गए, जिसके मालिक का संबंध नागराज से बताया गया है. सीबीआई का आरोप है कि इन ठेकों के बदले तत्कालीन मंत्री बी. नागेंद्र को करीब 1.20 करोड़ रुपये की रिश्वत मिली. यह रकम सीधे उनके खातों में नहीं, बल्कि उनकी बहन, बहनोई, निजी सहायक और बेल्लारी स्थित एक फार्महाउस मालिक के खातों में पहुंचाई गई. वहीं नागराज को भी 5.72 करोड़ रुपये मिलने के सबूत मिलने का दावा किया गया है.
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जांच में कर्नाटक जर्मन टेक्निकल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट यानी KGTTI से जुड़ा एक और कथित घोटाला भी सामने आया. करीब 4.90 करोड़ रुपये का स्किल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट बिना उचित टेंडर प्रक्रिया के आगे सब-कॉन्ट्रैक्ट कर दिया गया. इस मामले में भी रिश्वतखोरी के सबूत मिलने का दावा किया गया है. सीबीआई के अनुसार, नागराज के परिवार को लगभग 64 लाख रुपये और एक सरकारी अधिकारी को 15.50 लाख रुपये की रिश्वत दी गई. जांच एजेंसी का कहना है कि इस पूरे षड्यंत्र को साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेजी और डिजिटल सबूत जुटाए गए हैं.
CBI ने फाइल की 3 अलग-अलग चार्जशीट
सीबीआई ने इस पूरे मामले में तीन अलग-अलग चार्जशीट दाखिल की हैं. इनमें पूर्व मंत्री बी. नागेंद्र को तीनों मामलों में आरोपी बनाया गया है. एजेंसी का कहना है कि यह दर्शाता है कि कथित साजिश के हर पहलू में उनकी भूमिका केंद्रीय और व्यापक थी. अब इस मामले में अदालत में सुनवाई होगी और आने वाले दिनों में इस बहुचर्चित घोटाले को लेकर कई और बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं.
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