- कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की स्टडी के अनुसार भारत की सैटेलाइट लॉन्चिंग लागत अमेरिका से लगभग चार गुना अधिक है.
- 2025 में भारत की प्रति किलोग्राम पेलोड लॉन्चिंग लागत तक़रीबन 13,302 डॉलर रही जबकि अमेरिका में यह 3,225 डॉलर थी.
- स्टडी में भारत की कम पेलोड क्षमता और कम लॉन्च संख्या को उच्च प्रति किलोग्राम लागत का मुख्य कारण बताया गया है.
23 अगस्त... भारत का नेशनल स्पेस डे. आज जब भारत अपना तीसरा नेशनल स्पेस डे मना रहा है, तभी यूरोप की दो प्रतिष्ठित संस्थाओं की स्टडी में ISRO को लेकर एक चौंकाने वाला दावा किया गया है. इस स्टडी ने भारत के उस दावे पर गंभीर सवाल उठा दिए, जिसमें कहा जाता है कि भारत का स्पेस मिशन 'दुनिया में सबसे सस्ता' है. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के अनुसार भारत की प्रति किलोग्राम सैटेलाइट लॉन्चिंग की लागत अमेरिका की तुलना में लगभग चार गुना अधिक है. स्टडी यह भी दावा करती है कि भारत की सैटेलाइट लॉन्चिंग लागत स्पेस मिशन वाले देशों में सबसे अधिक है.
प्रतिष्ठित एल्सेवियर जर्नल Economics Letters में प्रकाशित इस पीयर-रिव्यू रिसर्च पेपर को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री अलेसियो टर्जी और इटली के सबसे पुराने तकनीकी विश्वविद्यालय पोलिटेक्निको दी टोरिनो के फ्रांसेस्को निकोली ने लिखा है.
Heritage – From Thumba to India's First Launches
— ISRO (@isro) August 22, 2026
A bicycle carried rocket parts. A church became a laboratory. A beginning with the launch of Nike Apache and the journey began with modest means, audacious purpose and an unshakeable belief in possibility.
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स्टडी में 1960 से 2025 के बीच लॉन्च हुए 6740 रॉकेट का डेटाबेस आधार
रिसर्च पेपर में 1960 से 2025 के बीच हुए 6,740 से अधिक रॉकेट लॉचिंग के डेटाबेस को आधार बताया गया है. इसके आधार पर यह दावा किया गया है कि 2025 में पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में एक किलोग्राम पेलोड पहुंचाने की भारत की औसत लागत 13,302 डॉलर प्रति किलोग्राम रही, जो अंतरिक्ष शक्ति संपन्न सभी प्रमुख देशों में सबसे अधिक है. इसके मुकाबले अमेरिका में यह लागत 3,225 डॉलर प्रति किलोग्राम रही.
स्टडी का यह दावा चौंकाने वाला है क्योंकि यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़ी उस चर्चित धारणा को चुनौती देता है कि ISRO दुनिया में 'फ्रुगल इंजीनियरिंग' यानी कम लागत में बड़े काम करने का सबसे सफल उदाहरण है. उल्लेखनीय है कि मंगलयान से लेकर अन्य मिशनों तक भारत की उपलब्धियों की तुलना अक्सर पश्चिमी देशों के मुकाबले बेहद कम खर्च में किए गए अभियानों से की जाती रही है.

PM मोदी ने कहा था- 7 रुपए प्रति किलोमीटर की लागत से मंगल पहुंचा यान
2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलयान की सफलता पर कहा था, 'अहमदाबाद में ऑटो रिक्शा का एक किलोमीटर का किराया 10 रुपए है, जबकि भारत ने मंगलयान को लगभग 7 रुपए प्रति किलोमीटर की लागत से मंगल तक पहुंचाया.' हालांकि ऐसे प्रतीकात्मक उदाहरण कभी-कभी वास्तविक आर्थिक स्थिति को अधिक सरल बनाकर पेश करते हैं.
इसी साल 21 अगस्त को PM मोदी ने 20 भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप्स के CEO और संस्थापकों से बातचीत में कहा था कि ऐसा वातावरण तैयार किया जाए कि जब दुनिया अंतरिक्ष के बारे में सोचे तो उसकी नजर भारत की ओर जाए. उन्होंने यह भी कहा कि भारत का स्पेस सेक्टर वैश्विक प्रतिभा, निवेश और कंपनियों को आकर्षित करने का माध्यम बन सकता है.

कैम्ब्रिज की स्टडी में भारत सबसे महंगा कैसे?
कैम्ब्रिज और टोरिनो के शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि लॉन्चिंग की लागत को प्रति किलोग्राम पेलोड के आधार पर देखा जाए तो भारत सबसे महंगा लॉन्च प्रदाता बनकर उभरता है. स्टडी के अनुसार 2025 में सैटेलाइट लॉन्चिंग की इंटरनेशनल औसत लागत 3,868 डॉलर प्रति किलोग्राम थी. अलग-अलग देशों में इसकी लागत कुछ इस तरह थी.
- अमेरिका: 3,225 डॉलर/किलोग्राम
- जापान: 5,287 डॉलर/किलोग्राम
- चीन: 5,809 डॉलर/किलोग्राम
- रूस: 6,682 डॉलर/किलोग्राम
- यूरोप: 9,897 डॉलर/किलोग्राम
- भारत: 13,302 डॉलर/किलोग्राम
एक किलो पेलोड वाले स्पेस को
स्टडी में रिसर्च पेपर ने खुद यह भी स्वीकार किया है कि भारत के बारे में उनके दावे पहली नजर में आश्चर्यजनक लग सकता है. उनका कहना है कि इसका मुख्य कारण भारत के लॉन्च व्हीकल की कम पेलोड क्षमता है. चूंकि लागत कम वजन वाले पेलोड पर विभाजित होती है, इसलिए प्रति किलोग्राम लागत अधिक दिखाई देती है, भले ही मिशन पर खर्च हुआ कुल लागत कम हो.
स्टडी के अनुसार केवल अमेरिका और यूरोप में ही समय के साथ लॉन्च लागत में महत्वपूर्ण गिरावट दिखाई देती है. भारत, चीन, रूस और जापान में ऐसा स्पष्ट रुझान नहीं मिला.
शोधकर्ताओं का मानना है कि भारत के अपेक्षाकृत कम लॉन्च संख्या भी इसका एक कारण हो सकती है. अधिक लॉन्च करने वाले देश तेजी से सीखते हैं, प्रोडक्शन को औद्योगिक पैमाने पर ले जाते हैं और बुनियादी ढांचे की लागत को अधिक मिशनों में बांट पाते हैं. अमेरिका को इसमें विशेष रूप से स्पेसएक्स का लाभ मिला है.

ISRO ने खारिज किया दावा
यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब ISRO के लिए बीता साल चुनौतियों भरा रहा है. PSLV जैसे भरोसेमंद रॉकेट से जुड़ी समस्याएं सामने आई हैं और 2026 में अभी तक कोई सफल रॉकेट प्रक्षेपण नहीं हुआ है. वैज्ञानिकों के इसरो छोड़ने की घटनाएं भी चर्चा में रही हैं.
हालांकि ISRO अध्यक्ष डॉ. वी. नारायणन ने NDTV से बातचीत में इस स्टडी को खारिज करते हुए कहा कि इसमें “गलत आंकड़ों” का इस्तेमाल किया गया है. हालांकि उन्होंने विस्तार से यह नहीं बताया कि स्टडी की किन आंकड़ों में त्रुटि है.
वहीं पूर्व ISRO अध्यक्ष और वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक के बोर्ड सदस्य डॉ. एस. सोमनाथ ने भी इस स्टडी की व्याख्या पर सवाल उठाया है. उनके अनुसार केवल “प्रति किलोग्राम लागत” के आधार पर तुलना करना उचित नहीं है. उन्होंने कहा कि 4.5 टन के अंतरिक्ष यान के लिए भारत ने जिस कीमत पर अमेरिकी प्रदाता की सेवा ली, वह लगभग उतनी ही थी जितनी LVM-3 मिशन की लागत होती.
डॉ. सोमनाथ का कहना है कि फाल्कन-9 की कम प्रति किलोग्राम लागत का बड़ा कारण उसका लार्ज स्केल और इंटरनल यूज है. हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारतीय लॉन्चर दुनिया के सबसे सस्ते नहीं हैं, लेकिन वे अत्यधिक महंगे भी नहीं हैं.

लागत का वास्तविक आकलन मुश्किल
इस स्टडी के दावे के बीच स्पेस मिशन के लागत की अंतरराष्ट्रीय तुलना बेहद जटिल है. इसका सबसे बड़ा कारण पारदर्शिता की कमी है. ISRO अपने मिशनों की डिटेल लागत रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से साझा नहीं करता.
- 2018 में संसद में दिए गए सरकारी जवाब के अनुसार
- PSLV मिशन लागत: लगभग 204 करोड़ रुपये
- GSLV Mk III (अब LVM-3) मिशन लागत: लगभग 434 करोड़ रुपये
हालांकि ये आंकड़े कई वर्ष पुराने हैं और इनमें बुनियादी ढांचे, कर्मचारियों तथा अनुसंधान व्यय जैसी लागतें पूरी तरह शामिल नहीं हो सकतीं.
आम तौर पर भारत सरकारी प्रक्षेपणों का बीमा नहीं कराता. ऐसे में जो मिशन असफल हो जाते हैं, उनकी लागत भी सरकारी खजाने पर आती है. इसके अलावा वैज्ञानिक और इंजीनियर कई परियोजनाओं पर एक साथ काम करते हैं, जिससे किसी एक मिशन पर वास्तविक खर्च निकालना कठिन हो जाता है.
स्पेसएक्स ने बदल दिया खेल
इस स्टडी का सबसे स्पष्ट निष्कर्ष यह है कि स्पेसएक्स ने वैश्विक स्पेस मिशन की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है. कंपनी के पुन: उपयोग योग्य (Reusable) फाल्कन-9 रॉकेट बार-बार इस्तेमाल किए जा सकते हैं. इसके कारण लागत नाटकीय रूप से कम हुई है. स्पेसएक्स अब सैकड़ों प्रक्षेपण कर चुका है और उसकी लॉन्च दर दुनिया में सबसे अधिक है.
स्टडी के अनुसार हाल के सालों में पृथ्वी की कक्षा में भेजे गए कुल पेलोड का 75 से 80 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका से गया, जिसमें स्पेसएक्स की सबसे अहम भूमिका रही.

क्या स्पेसएक्स नया "ईस्ट इंडिया कंपनी" बन सकता है?
अपने एक अन्य रिसर्च पेपर “Outsourcing the Final Frontier: SpaceX, the East India Company and the Political Economy of Space” में अलेसियो टर्जी ने चेतावनी दी है कि यदि दुनिया एक ही निजी कंपनी पर बहुत अधिक निर्भर हो जाती है, तो इससे रणनीतिक जोखिम पैदा हो सकते हैं.
उनके अनुसार यदि वैश्विक अंतरिक्ष पहुंच का बड़ा हिस्सा एक अमेरिकी कंपनी के कंट्रोल में है, तो भविष्य में कोई अमेरिकी प्रशासन इस निर्भरता को भू-राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकता है.
भारत के सामने दोहरी चुनौती
इस बीच स्पेस मिशन के लिहाज से इस समय भारत के सामने चुनौती दोहरी है. एक ओर उसे राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए स्वतंत्र लॉन्च क्षमता बनाए रखनी है. दूसरी ओर वैश्विक बाजार अब बड़े पैमाने, अधिक लॉन्चिंग और पुन: उपयोग योग्य प्रणालियों की ओर बढ़ रहा है.
उल्लेखनीय हो कि स्पेसएक्स की स्थापना 2002 में हुई थी. 2025 में एलन मस्क की कंपनी ने अकेले लगभग 165 फाल्कन-9 की लॉन्चिंग की. इस कंपनी में करीब 22,000 कर्मचारी हैं. इसके मुकाबले 1969 में स्थापित ISRO ने अपने 57 वर्षों के इतिहास में कुल लगभग 105 प्रक्षेपण किए हैं जबकि उसके लगभग 16,000 कर्मचारी हैं.
इस बीच भारत भी खुद दो बार फाल्कन-9 सेवाओं का उपयोग कर चुका है, जो यह दर्शाता है कि अंतरिक्ष शक्ति होने के बावजूद कभी-कभी अन्य देशों को भी अमेरिकी कंपनी की सेवाएं लेनी पड़ती हैं.
रियूजेबल रॉकेट होगा स्पेस मिशन के अगला पड़ाव
शोधकर्ताओं का मानना है कि अमेरिका की लागत बढ़त का सबसे बड़ा कारण रॉकेट पुन: उपयोग तकनीक है. भारत ने RLV (Reusable Launch Vehicle) तकनीकों के परीक्षण सफलतापूर्वक किए हैं, लेकिन अभी तक किसी पुन: उपयोग योग्य ऑर्बिटल रॉकेट को सेवा में नहीं उतारा है. ISRO का प्रस्तावित नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) रियूजेबल पर आधारित होगा, लेकिन यह अभी विकासाधीन है.

कैम्ब्रिज और टोरिनो का अध्ययन ISRO की उपलब्धियों को नकारता नहीं है, लेकिन वह भारत के 'सबसे सस्ते स्पेस मिशन' वाले लोकप्रिय दावे पर फिर से विचार करने की जरूरत को जरूर बताता है. स्टडी का संदेश साफ है कि भविष्य के स्पेस मार्केट में सफलता केवल कम लागत से नहीं, बल्कि बड़ी क्षमता, अधिक लॉन्च आवृत्ति और रियूजेबल तकनीक से तय होगी.
भारत अभी भी सीमित संसाधनों में असाधारण इंजीनियरिंग करने की क्षमता रखता है, लेकिन यदि वैश्विक लॉन्च बाजार का भविष्य रियूजेबल रॉकेटों और औद्योगिक पैमाने के संचालन में है, तो भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को अगले चरण में पहुंचने के लिए अपनी रणनीति और तकनीक दोनों पर नए सिरे से विचार करना होगा. ISRO फिलहाल इस साल के अपने पहले सफल रॉकेट मिशन का इंतजार कर रहा है.
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