- रामविलास पासवान के निधन से चिराग को मिल सकता है सहानुभूति की लहर का लाभ
- नीतीश कुमार के खिलाफ चिराग पासवान ने खोल रखा है मोर्चा
- 2005 के फरवरी में हुए चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा चुनाव के थे परिणाम
बिहार के कद्दावर नेता और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) के निधन के बाद इस बात की पूरी संभावना है कि बिहार चुनावों (Bihar Assembly Elections) में उनके बेटे और राजनीतिक उत्तराधिकारी चिराग पासवान के पक्ष में सहानुभूति की लहर हो. अगर चिराग पासवान उस लहर को वोटों के रूप में भुनाने में कामयाब रहे तो उनकी पार्टी लोजपा नि:संदेह बिहार चुनावों में बेहतर प्रदर्शन कर सकती है और अगर ऐसा हुआ तो यह चिराग पासवान के लिए न केवल राज्य में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर खुद को स्थापित करने का इससे बेहतर मौका नहीं हो सकता है.
2015 के चुनावों में बीजेपी के साथ रहते हुए लोजपा मात्र दो सीटें ही जीत पाई थी और 36 सीटों पर नंबर दो रही थी. इनमें से 20 सीटें ऐसी थीं, जहां उसने जेडीयू उम्मीदवारों को सीधे टक्कर दी थी. उस वक्त जेडीयू के साथ राजद का भी वोट बैंक था. हालांकि, इस बार राजद की जगह भाजपा का वोटबैंक जेडीयू के साथ है. लेकिन जेडीयू के खिलाफ सभी सीटों पर लोजपा के उम्मीदवार उतारने से न केवल उन 36 सीटों पर जोरदार मुकाबला देखने को मिल सकता है बल्कि उन सीटों पर जहां पार्टी नंबर दो रही थी, वहां त्रिकोणीय संघर्ष हो सकता है.
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रामविलास पासवान ने नीतीश को सत्ता से बेदखल करने के लिए तीन चुनाव (2005 अक्टूबर, 2010 और 2015) लड़े लेकिन वो कामयाब नहीं हो सके, जबकि 2005 के फरवरी में हुए विधान सभा चुनावों में पासवान ने जब पहली बार अपने दम पर अपनी नई पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ा था, तब उन्हें 243 सदस्यों वाली बिहार विधान सभा में 29 सीटें मिली थीं. विधान सभा त्रिशंकु हो गई थी. 75 सीटों के साथ सत्तारूढ़ राजद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, दूसरे नंबर पर नीतीश की अगुवाई में जेडीयू थी, जिसे 55 सीटें मिली थीं. 37 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर बीजेपी थी. कांग्रेस को मात्र 10 सीटें मिली थीं.
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उस वक्त सत्ता की चाभी रामविलास पासवान के पास थी लेकिन पासवान मुस्लिम नेता को सीएम बनाने की रट लगाते रहे और अंतत: राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. पंजाब के दलित नेता बूटा सिंह राज्य के गवर्नर थे, सत्ता सीधे उनके हाथों में चली गई. छह महीने तक सरकार बनने की जब सारी संभावनाएं खत्म हो गईं तब तत्कालीन रेल मंत्री लालू यादव ने केंद्र सरकार पर दबाव डालकर विधानसभा भंग करवा दिया. आठ महीने बाद अक्टूबर-नवंबर में राज्य में दोबारा विधान सभा चुनाव हुए लेकिन इसके परिणाम से लालू यादव और रामविलास पासवान दोनों को गहरा झटका लगा.
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आठ महीने पहले 75 सीट जीतने वाली राजद 54 पर सिमट गई, जबकि रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा को सिर्फ 10 सीटें मिलीं. नीतीश की अगुवाई वाली जेडीयू को 88 और बीजेपी को 55 सीटें मिली. कांग्रेस को सिर्फ एक सीट का नुकसान हुआ. साल 2000 के मार्च में सिर्फ सात दिनों के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार की भव्य वापसी और भव्य ताजपोशी हुई. लोजपा का ग्राफ लगातार गिरने लगा. पार्टी बिहार में 15 वर्षों में 29 से 2 सीटों पर सिमट गई लेकिन डेढ़ दशक बाद पिता रामविलास पासवान की तरह ही चिराग पासवान ने एकला चलो रे की नीति के सहारे नीतीश को ललकारा है. उन्हें हराने को मिशन बना लिया है.
अगर विधान सभा चुनाव के नतीजे त्रिशंकु रहे तो न सिर्फ नीतीश कुमार की कुर्सी और सियासी भविष्य दांव पर होगी बल्कि चिराग पासवान का राजनीतिक भविष्य भी दांव पर होगा, उन्हें सीटों की संख्या को देखते हुए बीजेपी या राजद किसी एक के हमसफर बनने का रास्ता चुनना होगा, वरना बीच मंझधार में चिराग की कश्ती हिचकोले खा सकती है.
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