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फर्जी कागज, असली गौ मांस... फिर FIR क्यों नहीं? भोपाल का जिंसी स्लॉटर हाउस चलाने में कौन दे रहा था साथ?

Bhopal Slauther House: जांच में अब साफ़ होता जा रहा है कि यह मामला सिर्फ गोकशी या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है. सवाल अब ये है कि अगर सबको सच पता था, तो FIR क्यों नहीं हुई? और क्या इस पूरे नेटवर्क के पीछे संरक्षण देने वालों तक जांच पहुंचेगी.

फर्जी कागज, असली गौ मांस... फिर FIR क्यों नहीं? भोपाल का जिंसी स्लॉटर हाउस चलाने में कौन दे रहा था साथ?
भोपाल जिंसी स्लॉटर हाउस मामले में बड़ा खुलासा.
  • भोपाल के जिंसी स्लॉटर हाउस के असलम चमड़ा के बूचड़खाने के दस्तावेज़ पूरी तरह फर्जी पाए गए
  • नगर निगम की पशु चिकित्सा शाखा ने फर्जी दस्तावेजों की पुष्टि के बाद FIR दर्ज करने की सिफारिश की थी
  • आरोप है कि अधिकारियों की मिलीभगत के कारण न तो FIR हुई और न ही इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई
भोपाल:

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के जिंसी स्लॉटर हाउस से जुड़ा मामला अब सिर्फ गोकशी का नहीं रह गया है. कथित गौ मांस मामले में अब तक जो सामने आया था, वो पूरी तस्वीर नहीं थी. अब एक नए और बड़े खुलासे ने इस पूरे खेल की नींव पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं. नगर निगम की पशु चिकित्सा शाखा के पत्र से साफ हुआ है कि असलम चमड़ा के बूचड़खाने के दस्तावेज पूरी तरह फर्जी थे और इसके बावजूद न FIR हुई, न कार्रवाई. सवाल अब सिर्फ असलम चमड़ा पर नहीं, बल्कि नगर निगम और वन विहार के उन अधिकारियों पर है, जिन्होंने सब जानते हुए भी आंखें मूंदे रखीं हैं.

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असलम चमड़ा के बूचड़खाने के सभी दस्तावेज फर्जी

 गौ मांस मामले में अब तक जो सामने आया था, वो सिर्फ शुरुआत थी. अब जो दस्तावेज़ सामने आए हैं, उन्होंने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है. नगर निगम की पशु चिकित्सा शाखा का आधिकारिक पत्र बताता है कि 5 मई 2025 को असलम चमड़ा के बूचड़खाने के सभी दस्तावेज पूरी तरह फर्जी पाए गए. यानी जिस स्लॉटर हाउस के सहारे भोपाल के बीचों-बीच वन विहार में जानवरों को खाना दिया जाता रहा वो भी सब फर्जी दस्तावेजों के सहारे. इस फर्जीवाड़े की पुष्टि के बाद, पशु चिकित्सा शाखा ने नगर निगम और वन विहार प्रबंधन को पत्र लिखकर सीधे FIR दर्ज करने की सिफारिश की थी. लेकिन आरोप है कि अधिकारियों की मिलीभगत के चलते ना FIR हुई, ना कोई ठोस कार्रवाई.

वन विहार का दावा है कि अब भीतर ही वैकल्पिक व्यवस्था के तहत प्राइवेट वेंडर से स्लॉटिंग कराई जा रही है, और इस पूरे बदलाव की सूचना नगर निगम और पुलिस को भी दे दी गई है. लेकिन सवाल अब भी कायम हैं. जब दस्तावेज़ फर्जी थे, तो अनुबंध हुआ कैसे? जांच की सिफारिश के बावजूद FIR क्यों नहीं हुई? 

बूचड़खाने पर विपक्ष ने उठाए सवाल

पुरानी चिठ्ठी सामने आने के बाद अब वन विभाग ने 3 दिन में वन विहार से जांच कर रिपोर्ट सौंपने को कहा है, लेकिन विपक्ष हमलावर है. कांग्रेस के पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने कहा कि हिंदुत्व सनातन की बात करने वाली बीजेपी की ट्रिपल इंजन की सरकार में सरेआम गौ माता को काटा गया, पकड़ा गया और कोई कार्रवाई नहीं हुई. हमने राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की लेकिन यह नहीं किया जा रहा है. इस मामले में मध्यप्रदेश की सरकार को सख्त एक्शन लेना चाहिए.

भैंस के नाम पर गौ मांस की तस्करी का आरोप

भोपाल का जिंसी स्लॉटर हाउस, जो गोकशी के आरोपों में सील किया गया, अब एक ऐसे संगठित घोटाले की तस्वीर पेश करता है जिसमें धर्म, धन, दहशत और सिस्टम गहराई से उलझे नज़र आते हैं. आरोप है कि वहां से भैंस के मांस के नाम पर गौ मांस की तस्करी होती रही और इस पूरे नेटवर्क का केंद्र असलम कुरैशी उर्फ़ चमड़ा रहा, जिसने 1988 में गांव-गांव भैंसों की खाल खरीदने से कारोबार शुरू किया और मृत मवेशी उठाने का ठेका मिलने के बाद नगर निगम में इतनी पकड़ बना ली कि उसके सिवा कोई टेंडर भरने की हिम्मत नहीं करता था.

किसके संरक्षण में हो रही थी तस्करी?

 उसकी गिरफ्तारी के बाद जांच नगर निगम अधिकारियों तक पहुंची है, टेंडर फाइलों में वरिष्ठ अफसरों के साइन मिले हैं, लेकिन पूछताछ अब तक क्यों नहीं हुई, यह बड़ा सवाल है. राजनीतिक स्तर पर सत्ता और विपक्ष दोनों सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं. वहीं 17 दिसंबर को 26 टन गोमांस की बरामदगी, विदेशी सप्लाई नेटवर्क और PPP मॉडल के तहत सौंपे गए स्लॉटर हाउस से कुछ ही हफ्तों में हुई संदिग्ध खेप ने निगरानी, दस्तावेज़ों और प्रशासनिक जानकारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. मामले में रोहिंग्या बसाने, फर्जी दस्तावेज़ बनाने और स्थानीय लोगों की रोज़ी छीनने जैसे गंभीर आरोप सामने आए, जिन पर पुलिस की शुरुआती जांच सवालों के घेरे में रही. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी पुलिस रिपोर्ट को खारिज करते हुए जांच में भारी लापरवाही की बात कही.

जांच में अब साफ़ होता जा रहा है कि यह मामला सिर्फ गोकशी या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है. सवाल अब ये है कि अगर सबको सच पता था, तो FIR क्यों नहीं हुई? और क्या इस पूरे नेटवर्क के पीछे संरक्षण देने वालों तक जांच पहुंचेगी.

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