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बंगाल के रासबिहारी में TMC-BJP आमने-सामने, ‘बाहरी दखल’ बनाम ‘बदलाव’ बना बड़ा मुद्दा, पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट

कोलकाता की अहम शहरी विधानसभा सीट रासबिहारी में टीएमसी और बीजेपी आमने‑सामने हैं. देबाशीष कुमार और स्वपन दासगुप्ता के बीच मुकाबले में ‘बाहरी दखल’ बनाम ‘बदलाव’ बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है

  • रासबिहारी विधानसभा सीट कोलकाता की महत्वपूर्ण शहरी सीट है जहां तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला
  • तृणमूल कांग्रेस के देबाशीष कुमार और भाजपा के स्वपन दासगुप्ता इस चुनाव में मुख्य उम्मीदवार हैं और मुकाबला रोचक
  • देबाशीष कुमार ने बाहरी ताकतों के दखल को लेकर चिंता जताई और बंगाल के सम्मान की लड़ाई बताया है

कोलकाता की अहम शहरी विधानसभा सीट रासबिहारी में इस बार चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प होता जा रहा है. तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी आमने‑सामने हैं और ‘बाहरी दखल' बनाम ‘बदलाव' का मुद्दा चुनावी बहस के केंद्र में आ गया है. रासबिहारी विधानसभा सीट कोलकाता की सबसे महत्वपूर्ण शहरी सीटों में मानी जाती है. यहां शिक्षित मध्यम वर्ग, व्यापारी, पेशेवर और नौकरीपेशा मतदाताओं की संख्या अधिक है, यही वजह है कि इस सीट का राजनीतिक महत्व भी काफी ज्यादा है. पिछले तीन विधानसभा चुनावों से इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा रहा है, हालांकि पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपने वोट प्रतिशत में तेज़ बढ़ोतरी कर मुकाबले को कड़ा बना दिया था.

2016 से 2021 तक बदला मुकाबले का समीकरण

2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के देबाशीष कुमार ने इस सीट से जीत हासिल की थी, लेकिन बीजेपी को मिले वोटों में बढ़ोतरी के बाद इस बार मुकाबला और भी कड़ा और रोचक माना जा रहा है. साल 2016 में जहां कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी, वहीं 2021 में बीजेपी मुख्य चुनौती बनकर उभरी. अबकी बार राशबिहारी सीट पर सीधा मुकाबला तृणमूल कांग्रेस के देबाशीष कुमार और बीजेपी के स्वपन दासगुप्ता के बीच माना जा रहा है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि शहरी मतदाताओं का रुझान, बीजेपी का बढ़ता आधार और टीएमसी की मजबूत संगठनात्मक पकड़ इस चुनाव को बेहद कांटे का बना सकती है.

‘बंगाल के सम्मान की लड़ाई' — देबाशीष कुमार

रासबिहारी में चुनावी माहौल अब पूरी तरह गरमा चुका है और दोनों दल इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई मानकर पूरी ताकत झोंक रहे हैं. टीएमसी के उम्मीदवार देबाशीष कुमार ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि यह चुनाव सिर्फ एक सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि बंगाल के सम्मान की लड़ाई है. उन्होंने आरोप लगाया कि बाहरी ताकतें राज्य की राजनीति में दखल देने की कोशिश कर रही हैं और जनता को इसके खिलाफ एकजुट होना होगा.

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देबाशीष कुमार ने कहा, “ये लोग बंगाल को सम्मान नहीं दे रहे हैं. कुछ लोग यहां आकर दखलदारी करना चाहते हैं. इसके खिलाफ लड़ना ही सबसे बड़ी चुनौती है. हम यहीं के रहने वाले हैं, हमारा जन्म भी यहीं हुआ और पूरा जीवन इसी क्षेत्र में बीता है। जनता के साथ रहना और जो वादा करें उसे निभाना ही हमारी राजनीति है.”

कालीघाट को लेकर आरोपों पर पलटवार

कालीघाट और आसपास के इलाके को लेकर विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे आरोपों पर देबाशीष कुमार ने पलटवार किया. उन्होंने कहा कि इलाके में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है और जो बातें कही जा रही हैं, वे पूरी तरह झूठी हैं. उन्होंने कहा, “कालीघाट में किसे परेशानी है? ये सब बेबुनियाद बातें हैं। जो लोग काम करते हैं, उन्हें सच्चाई पता है। झूठ बोलकर राजनीति करने से कुछ नहीं होगा.”

‘चार मई का इंतज़ार'

देबाशीष कुमार ने भरोसा जताया कि राज्य में एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनेगी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता में लौटेंगी. उन्होंने कहा, “हम लोग चार मई का इंतज़ार कर रहे हैं. जनता ने हमेशा काम को देखा है। अच्छा काम करने वालों को अच्छा फल मिलता है. ऊपर वाला सब देख रहा है.”

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‘घरेलू मैदान' में उतरे स्वपन दासगुप्ता

स्वपन दासगुप्ता, जो अब तक कलम के लिए पहचाने जाते रहे हैं, इस बार हाथ में झंडा लेकर चुनावी मैदान में हैं. रासबिहारी विधानसभा से बीजेपी उम्मीदवार स्वपन दासगुप्ता ने कहा, “चुनौती तो ज़रूर है, लेकिन ये हमारा घरेलू मैदान है. हमारा परिवार सौ साल से यहां रह रहा है, तो एक मायने में ये होम ग्राउंड है. दूसरा यह कि 15 साल पुराने शासन के बाद लोग बदलाव चाहते हैं. पश्चिम बंगाल धीरे‑धीरे अप्रासंगिक होता जा रहा है और लोग इससे बाहर निकलना चाहते हैं.”

मां काली से क्या मांगा आशीर्वाद?

इस सवाल पर स्वपन दासगुप्ता ने कहा, “हम मां काली के भक्त हैं, शक्ति परंपरा में हैं. मां काली से कुछ मांगते नहीं, सिर्फ उनका आशीर्वाद चाहिए.”
हिंदुत्व या विकास? हिंदुत्व के आधार पर वोट मांगने के सवाल पर उन्होंने कहा, “नहीं, हिंदुत्व परमानेंट है. इस बार हम विकास, गवर्नेंस, प्रशासनिक स्थिरता और सबसे बड़ा, तोलाबाज़ी और क्राइम सिंडिकेट के खिलाफ लड़ रहे हैं.”

जीत को लेकर आत्मविश्वास

अपनी जीत को लेकर पूछे गए सवाल पर स्वपन दासगुप्ता ने कहा, “हर चुनाव एक मुकाबला होता है और यह बहुत कठिन मुकाबला है. असल में यह इलाका पारंपरिक रूप से तृणमूल कांग्रेस का गढ़ रहा है, लेकिन पूरे पश्चिम बंगाल में बदलाव की हवा चल रही है, जो रासबिहारी को भी प्रभावित कर रही है. भवानीपुर जैसे इलाकों में जो माहौल बन रहा है, वह साफ दिखता है. मुझे लोगों से बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है. अगर पहले हम 15 हजार पीछे थे, तो भी फर्क नहीं पड़ता. हम उसे पूरा करेंगे और एक बड़ी छलांग लगाएंगे. मुझे विश्वास है कि इस बार यह चुनाव बीजेपी का है.”

टी-स्टॉल बना राजनीति का अड्डा

कोलकाता के रासबिहारी इलाके में अगर आप आएंगे तो मेनका सिनेमा के पास स्थित शर्मा टी स्टॉल ज़रूर दिखेगा. यह जगह सिर्फ चाय के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक चर्चाओं का भी बड़ा अड्डा बन चुकी है. सुबह से लेकर रात तक यहां भीड़ लगी रहती है और हर कप चाय के साथ चुनावी बहस चलती रहती है. बीजेपी उम्मीदवार स्वपन दासगुप्ता भी यहां पहुंचते हैं. अपने ही क्षेत्र में एक उम्मीदवार के तौर पर प्रचार करना उन्हें कैसा लग रहा है, इसे लेकर माहौल पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंगा हुआ है.

स्थानीय लोगों से बातचीत एक शख्स कहते हैं, “रासबिहारी से जो स्वपन दासगुप्ता जी खड़े हुए हैं, आप मानेंगे नहीं लेकिन दादा दिन‑रात लगे हुए हैं. सुबह और शाम दोनों समय रैली कर रहे हैं. लोग खुद निकल‑निकलकर उनके समर्थन में आ रहे हैं. इस बार सिस्टम को खत्म किया जाना चाहिए, इसलिए लोग खुलकर सामने आ रहे हैं.”

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इस बार के बड़े मुद्दे

मुद्दों के सवाल पर एक अन्य स्थानीय निवासी कहते हैं, “बंगाल में कई मुद्दे हैं. 15 साल की सरकार ने नौकरी चोरी की, तमाशाबाज़ी की, गुंडाराज बनाया और राज्य को बर्बाद किया. सिर्फ उच्च वर्ग ही नहीं, बल्कि इस इलाके में रहने वाला निम्न वर्ग भी परेशान है. लोग इस परेशानी से मुक्ति चाहते हैं. इसलिए इस बार बंगाल में बीजेपी सरकार आएगी और स्वपन दासगुप्ता बहुत बड़े अंतर से जीतेंगे.”

‘परिवर्तन की मांग'

एक और स्थानीय नागरिक चाय पीते हुए कहते हैं, “इस बार परिवर्तन होना चाहिए. बंगाल में बदलाव की मांग हो रही है. हमने 34 साल की सीपीएम सरकार देखी और 15 साल की तृणमूल सरकार भी देख रहे हैं. ऐसा कोई विभाग नहीं बचा जहां चोरी के आरोप न हों. ममता बनर्जी के शासन में शिक्षा विभाग पूरी तरह सवालों में है। 26 हजार स्कूल शिक्षकों की भर्ती में जो हुआ, वे बच्चों को क्या सिखाएंगे? राशन में केंद्र से आने वाला चावल और मील तक बाहर चला जाता है. कृषि की हालत खराब है और अपराध भी बढ़ा है.”

‘बंगाल के लोग बाहर क्यों जाते हैं?'

जब यह सवाल उठता है कि बंगाल के लोग बाहर जाकर परेशान होते हैं, तो एक स्थानीय निवासी पलटकर कहते हैं, “पहली बात तो यह है कि बंगाल का आदमी बाहर क्यों जा रहा है? 15 साल में रोजगार का इंतज़ाम क्यों नहीं किया गया? अगर नौकरी मिलती, तो कोई बाहर नहीं जाता. बांग्ला पोक्खो के नाम पर गैर‑बंगालियों को परेशान किया जाता है. पश्चिम बंगाल कोई अलग देश नहीं है. देश की आबादी 140 करोड़ है, जिसमें 10 करोड़ बंगाल में रहते हैं. अगर बाहर से लोग आते हैं तो उन्हें परेशान किया जाएगा, यह कौन‑सा समाधान है?”

‘मैं बंगाली हूं'

दीपांकर लाल, स्थानीय निवासी बताते हैं, “मेरा नाम दीपांकर लेक है मैं बिज़नेस करता हूं और मैं बंगाली हूं.” जब उनसे पूछा जाता है कि नाम देखकर लोग बाहरी न समझ लें, तो वे कहते हैं, “नहीं‑नहीं, मैं बंगाली हूं. मेरा असली उपनाम घोष है. लाल या लाला हमें मिली हुई उपाधि है. नाम देखकर कोई सोच सकता है कि मैं बाहरी हूं, लेकिन ऐसा नहीं है.”

दीदी को कितने नंबर?

मुख्यमंत्री को 10 में से नंबर देने के सवाल पर दीपांकर लाल कहते हैं, “नंबर देने का मन नहीं है. चोर को माइनस नंबर दिया जाता है. बंगाल को इतना पीछे डाल दिया गया है कि नंबर देना ही गलत हो जाएगा. माइनस में आप कुछ भी महसूस कर सकते हैं.”

लेखक के बारे में
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मनोज्ञा लोईवाल
Anchor and Senior Editor NDTV
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